काव्यकण्ठ वासिष्ठ श्री गणपति मुनि विरचितम्
इन्द्र शतकम्
चतुर्थः करुणास्तबकः - जागतः

इन्द्र शतकम् – परिचय
इन्द्र शतकम् देवताओं के सार्वभौम अधिपति, वज्रायुधधारी, लोकों के रक्षक और दिव्य बल प्रदान करने वाले भगवान् इन्द्र की स्तुति में काव्यकण्ठ वासिष्ठ श्री गणपति मुनि द्वारा रचित एक शक्तिशाली भक्तिपूर्ण स्तोत्र है। व्यक्तिगत साधक और समस्त जगत् को ज्ञान-प्रकाश, रक्षा, नियम-पालन और उत्थान प्रदान करने वाली परम दिव्य शक्ति के रूप में इन्द्र की वैदिक दृष्टि को पुनर्जीवित करने के मुनि के विशाल संकल्प में यह रचना एक महत्त्वपूर्ण भाग है।
श्री गणपति मुनि ने, जैसे *उमा सहस्रम्* में उमा देवी पर एक हजार श्लोकों की रचना की, वैसे ही भगवान् इन्द्र पर भी एक हजार श्लोक रचने का संकल्प किया था। परंतु किसी कारण से यह महान् कृति पूर्ण न हो सकी और १२५ श्लोकों तक ही पूर्ण हुई। इनमें पहले १०० श्लोक *इन्द्र शतकम्* के रूप में प्रसिद्ध हैं, जबकि शेष २५ श्लोक भगवान् इन्द्र के कृपाकटाक्ष की स्तुति करने वाले *इन्द्र कटाक्ष स्तबकम्* के रूप में अलग से प्रसिद्ध हैं।
*इन्द्र शतकम्* पच्चीस-पच्चीस श्लोकों के चार स्तबकों में विभाजित है। पहला *प्रारम्भ स्तबकम्* एक मंगलमय आरम्भ है। इसमें कवि इन्द्र को मघवान्, वृत्रहन्, पुरन्दर, वासव और ऋतपति जैसे नामों से स्तुति करता है। यह स्तबक इन्द्रोपासना की नींव के रूप में स्मरण, शरणागति, दिव्य-प्रेरित वाणी और भक्ति को स्थापित करता है।
दूसरा *स्वरूप स्तबकम्* इन्द्र के गहन तात्त्विक स्वरूप को प्रकट करता है। यहाँ इन्द्र को केवल स्वर्ग के अधिपति के रूप में नहीं, बल्कि लोकों से परे ब्रह्मस्वरूप, लोकों के भीतर अन्तर्यामी और लोकों के माध्यम से प्रकट होने वाली विश्वशक्ति के रूप में देखा गया है। यह स्तबक इन्द्र को सत्-चित्-आनन्द स्वरूप, तथा सृष्टि के पीछे स्थित प्रकाश, चेतना, आनन्द और शक्ति के रूप में प्रस्तुत करता है।
तीसरे *दैव स्तबकम्* में कवि इन्द्र को अपने आराध्य देवता के रूप में घोषित करता है। मुनि बार-बार कहते हैं, “वृषा मेरा दैव है।” इस भाग में इन्द्र की स्तुति सगुण ब्रह्म के रूप में की गई है — वे प्राचीन होते हुए भी सदा युवा हैं, अधर्मशक्तियों के लिए भयंकर होते हुए भी भक्त के लिए सुन्दर हैं, विश्व को भीतर और बाहर से व्याप्त किए हुए हैं, और सूर्य, विद्युत्, अग्नि, प्राण तथा अन्तरंग साक्षी के रूप में प्रकाशित होने वाले परमदेव हैं।
चौथा *करुणा स्तबकम्* इन्द्र को करुणासागर के रूप में की गई एक गम्भीर प्रार्थना है। यह सिखाता है कि मानव-प्रयत्न, तपस्या, पूजा, योग, यज्ञ, सद्गुण और उच्च वंश — ये सब वास्तव में दिव्य कृपा से ही फलदायी होते हैं। इन्द्र की करुणा हृदय को पवित्र करती है, अहंकार को दूर करती है, मन को दृढ़ता, वाणी को बल, बुद्धि को स्थिर स्मृति, और धर्म तथा अपने देश की रक्षा करने की शक्ति प्रदान करती है।
समग्र रूप से, *इन्द्र शतकम्* भगवान् इन्द्र को ज्ञान-प्रकाश, बल, रक्षा, सार्वभौमत्व, करुणा और अन्तरंग जागरण की परम दिव्य शक्ति के रूप में प्रस्तुत करता है। यह केवल एक स्तोत्र मात्र नहीं है; यह नमस्कार और शरणागति से आरम्भ होकर तात्त्विक साक्षात्कार, दृढ़ भक्ति, और अन्ततः साधक के हृदय तथा जीवन में दिव्य कृपा के अवतरण तक ले जाने वाली एक पूर्ण आध्यात्मिक यात्रा है।
॥ काव्यकण्ठ वासिष्ठ श्रीगणपतिमुनि विरचितम् इन्द्र शतकम् ॥
चतुर्थः करुणास्तबकः - जागतः
प्रदुष्टजनता मदोद्धतिहृते विनम्रजनता गुणोन्नतिकृते ।
अशेषजगतो नृपाय वशिने कृपाजलधये नमः कुलिशिने ।। ७६।।
व्रतैर् न विविधैर् न पूजनशतैर् न योगविधिभिर् न शुद्धचरितैः ।
न शक्रतपसा न यज्ञविधिना नरस्य महिमा कृपां तव विना ।। ७७ ।।
ऋतज्ञकृतिभिः सदापि विनुता रजोविरहितप्रजासु वितता ।
सुधामपि महः किरन्त्यजर ते न तेषु विनता कृपा विजयते ।। ७८ ।।
न कोऽपि मनसो गुणः सुजनपा महेन्द्रमनसो झरी तव कृपा ।
भवन्तमयि तद्विभो रुचिनिधि भणन्ति विबुधाः कृपाजलनिधिम् ।। ७९ ।।
अनुग्रहकृते सदाप्यभिमुखी विभो तव विभा कृपानतसखी ।
रसार्द्रशिरसं सुपक्वमनसं पुनाति विमदं नरं भुवि विदम् ।। ८०।।
अतीव सरला प्रकाशबहुला धुताखिलमलाकृताजरकला ।
पदाहतभया तवाक्षरदया विनम्रवदने सरत्विह जने ।। ८१।।
गृणत्सदवनप्रकारनिपुणा मुनिस्तुतगुणा महावितरणा ।
विचित्रकरणा तवेन्द्रकरुणा स्तवेन मुखरे सरत्विह नरे ॥८२॥
अरुद्धगमना विशालनयना विशुद्धपतना विचित्रचलना ।
तपस्विजनपा तवेश्वरकृपा हृदा विकसिते सरत्विह नते ।। ८३॥
तव स्मरणतो विशुद्धमनसि प्रभो सुमनसां वितीर्णशिरसि ।
कृपारसझरी विपापसख ते पतत्वयि मयि स्वभावविनते ।। ८४ ।।
चिरादविजयं सदापि सभयं विकुण्ठितशयं विलोक्य विषयम् ।
विषण्णमिह मां वृषन्नरुणया त्वमावृणु दिवो विभो करुणया ।। ८ ५।।
सतां मतिमतां यदिन्द्रनयनं यदुग्रविधया द्विषां प्रदमनम् ।
सदापि हृदये स्थितिर्यदचला नरस्य सकला क्रिया यदमला ।।८६।।
अकुण्ठितगतिर्यदच्छधिषणा समस्तविषयावगाहनगुणा ।
तदेतदखिलं महद्विलसितं तवैव करुणाझरस्य फलितम् ।।८७।।
न पश्यति तपो न पश्यति गुणं न पश्यति शुभक्रियां च निपुणम् ।
न पश्यति कृतं यथाविधि मखं न पश्यति रमाविलासि च मुखम् ।। ८८ ।।
न पश्यति गिरां विलासमतुलं न पश्यति महत्कुलं च विमलम् ।
कवाटरहिते गृहे प्रवहति श्रियामधिपते कृपेन्द्र महति ।। ८९॥
अहङकृतिमहाकवाटरहितं मनो मम गृहं महेन्द्रविहितम् ।
अनन्तविभवा निरन्तरजया न वा प्रवहताज्जवात्तव दया ।। ९०।।
अहङकृतिविकृत्ययो विरचितं तमस्ततमहागुहास्थलगतम् ।
कवाटकमिदं हृदो विघटितं तवास्त्वविहतं कृपाझरगतम् ।। ९१ ।।
असावपि मनस्यपारयशसा तनौ च परितस्ततेन महसा ।
इमं सुरपतेर्विशोध्य निपुणा नरं भुविसुरं करोतु करुणा ।। ९२।।
स्मरत्सु विकसत्स्वमोघचलितं विलक्षणतमप्रभावकलितम् ।
इतोऽस्तु सुरराट्कृपाविलसितं मनोऽभिलषितं ममास्तु फलितम् ।। ९३ ।।
अतीव दृढतां वितीर्य मनसे प्रकाशबहुलं बलं च वचसे ।
ध्रुवस् मृतिमिमां विधाय च धियं प्रभो दिशतु ते दया मम जयम् ।। ९४ ।।
ध्रुवस्मृतिधरे मयि स्तुतिकरे पदाब्जसुहृदि प्रकाशितहृदि ।
जगत् त्रयधरः शचीसहचरः प्रपूर्णभरणां करोतु करुणाम् ।। ९५।।
ममाभिलषितं प्रसिध्यतु न वा मनः शममितं प्रतृप्यतु न वा ।
जहामि न बहु प्रकृष्टकरणं दयाजलनिधेस्तवेन्द्र चरणम् ।। ९६ ।।
प्रसिद्धयति न चेत्तदिन्द्र विगुणं प्रतृप्यति न चेत्तदक्षमगुणम् ।
नमत्सु न दया नते धुतभया क्रियेत हसनं कदापि न मया ।। ९७ ।।
स्वकीयहृदयं समर्पयति ते नतः कविरयं सुपर्वनृपते ।
महस्तव विशत्विदं च भवनं चरत्यनुदिनं यदिन्द्र भुवनम् ।। ९८ ।।
मनुं तव दिवो महीश जपतां स्तवं तव सतां सहाय पठताम् ।
कृपेन्द्र तव नः प्रमादरहितां स्वदेशमवितुं ददातु पटुताम् ।। ९९।।
कृपाझरगतिप्रभावमतुलं वदन्नुपहरन् हृदेव कमल म् ।
जलोद्धतगतिस्तवस्त्रिजगतः प्रशासितुरसौ भवत्वभिमतः ।। १००।।
।। इति श्रीभगवन्महर्षिरमणान्तेवासिनो वासिष्ठस्य
नरसिंहसूनोर्गणपतेः कृतिः इन्द्र शतकम् समाप्तम् ।।
