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काव्यकण्ठ वासिष्ठ श्री गणपति मुनि विरचितम्

इन्द्राणी सप्तसती

प्रथमं गायत्रं शतकम् - प्रथमः शशिवदना स्तबकः

Indrani Saptasati - The 700 Verses Mystical work of Kavyakantha Sri Ganapati Muni

पवित्र *इन्द्राणी सप्तशती* का यह प्रारम्भिक स्तबक, महेन्द्र की दिव्य सहधर्मचारिणी तथा उनकी शक्तिस्वरूपिणी शचीदेवी—इन्द्राणी—के प्रभावशाली आवाहन से आरम्भ होता है। यहाँ श्री गणपति मुनि ने इन्द्राणी की स्तुति केवल देवलोक की एक देवी के रूप में नहीं की है। उन्होंने उन्हें परम दिव्यमाता, शिवा, दुर्गा तथा समस्त लोकों को धारण और पोषित करने वाली विश्वशक्ति के अभिन्न स्वरूप के रूप में देखा है।


कवि प्रार्थना करते हैं कि देवी की चन्द्रमा के समान उज्ज्वल मुस्कान उनके मार्ग के अन्धकार को दूर कर दे। वे देवी से अपनी उस पुण्य जन्मभूमि की रक्षा करने की याचना करते हैं, जो साहस खो चुकी है, दिशाहीन हो गई है और दुर्बल अवस्था को प्राप्त हो चुकी है। इस प्रकार यह स्तबक केवल व्यक्तिगत भक्ति से युक्त स्तोत्र नहीं है, बल्कि भारतवर्ष की रक्षा, उन्नति और आध्यात्मिक जागरण के लिए अर्पित एक महान प्रार्थना भी है।


इन श्लोकों में एक गम्भीर दार्शनिक दृष्टि प्रकट होती है। परमसत्य को तीनों लोकों से परे, अणु से भी सूक्ष्म, नित्य और सत्यस्वरूप बताया गया है। शचीदेवी को महेन्द्र की उस महान शक्ति के रूप में देखा गया है, जो समस्त दैवी कार्यों में गतिशील और सक्रिय रहती है। मुनि संकेत करते हैं कि वैदिक दृष्टि का अनुसरण करने वाले उस परम तत्त्व को महेन्द्र कहते हैं, जबकि तान्त्रिक दृष्टि का अनुसरण करने वाले उसे महेश कहते हैं। इन दोनों दर्शनों का समन्वय करते हुए वे घोषित करते हैं कि शची और शिवा भिन्न देवियाँ नहीं हैं, बल्कि विभिन्न परम्पराओं के माध्यम से अनुभूत होने वाला एक ही परमसत्य हैं।


इसके अतिरिक्त, यह स्तबक दिव्यमाता को उस विश्वगर्भ के रूप में प्रकट करता है, जो अपने भीतर तीनों लोकों को धारण करती हैं; उस पराशक्ति के रूप में, जो देश और काल से परे प्रकाशित होती हैं; उस सत्ता के रूप में, जिनका शरीर स्वयं आकाश है; और उस विराट् स्वरूप के रूप में, जो समस्त जीवों में अभिव्यक्त हो रहा है। वे इस सम्पूर्ण विश्व की आधारभूत, सूक्ष्म, अनन्त और शून्यता से रहित परम सत्ता हैं। जिस प्रकार आकाश को कोई पूर्णतः माप नहीं सकता, उसी प्रकार उनकी महिमा का भी कोई सम्पूर्ण वर्णन नहीं कर सकता—यह बात कवि अत्यन्त विनम्रता से स्वीकार करते हैं।


अन्तिम श्लोकों में श्री गणपति मुनि की गहन भक्ति स्पष्ट रूप से प्रकट होती है। वे कहते हैं कि देवी प्रसन्न हों अथवा न हों, उनकी इच्छाएँ पूर्ण हों अथवा न हों—जिस प्रकार एक प्रेममयी पत्नी अपने प्रिय पति की सेवा करती है, उसी प्रकार उनकी वाणी स्वभावतः देवी के चरणों की सेवा करते हुए उनकी स्तुति करती रहेगी। वे बताते हैं कि देवी के दिव्य गुणों का कीर्तन ही ऐसा महान और शक्तिशाली साधन है, जो पापों को दूर कर सकता है और शुभ-मंगल प्रदान कर सकता है।


इस प्रकार यह प्रथम स्तबक *इन्द्राणी सप्तशती* का एक दिव्य और तेजोमय आरम्भ है। यह एक ही समय में रक्षा, शक्ति, वेदान्तीय तत्त्वदर्शन, राष्ट्रीय जागरण और दिव्यमाता के चरणों में पूर्ण शरणागति को अभिव्यक्त करने वाली पवित्र स्तुति है।


## इस स्तबक के मुख्य विषय


• अन्धकार और दुःख को दूर करने के लिए शचीदेवी से प्रार्थना

• भारतवर्ष की रक्षा और पुनरुत्थान के लिए आवाहन

• इन्द्राणी को शिवा और दुर्गादेवी के अभिन्न स्वरूप के रूप में देखना

• दैवी स्वरूप के सम्बन्ध में वैदिक और तान्त्रिक दृष्टियों का समन्वय

• देवी को महेन्द्र अथवा महेश के पीछे सक्रिय विश्वशक्ति के रूप में प्रकट करना

• दिव्यमाता को सूक्ष्म, अनन्त तथा देश और आकाश से परे परम सत्ता के रूप में वर्णित करना

• समस्त जीवों में विराट् स्वरूप से प्रकाशित देवी का दर्शन

• वाणी का स्वयं दिव्यमाता के चरणों की सेवा बन जाना—ऐसी परम भक्ति

• देवी की महिमा का कीर्तन पापों को दूर कर मंगल प्रदान करता है—यह आश्वासन


॥ इन्द्रो विश्वस्य राजति ॥

काव्यकण्ठ वासिष्ठ श्री गणपति मुनि विरचितम्

॥ इन्द्राणीसप्तशती ॥


॥ प्रथमं गायत्रं शतकम् ॥

॥ प्रथमः शशिवदना स्तबकः ॥


हरिललने मे पथि तिमिराणि ।

हरदरहासद्युतिभिरिमानि ।।१।।


अगतिमवीर्यामपगतधैर्याम् ।

अवतु शची मे जनिभुवमार्याम् ।। २ ।।


शृणु करुणावत्यलघुमखर्वे ।

स्तवमहमार्यस्तव शचि कुर्वे ।। ३ ।।


त्रिजगदतीतो विलसति नित्यः ।

अणुरणुतो यो भगवति सत्यः ।। ४ ।।


त्वमखिलकार्येष्वयि धृतसक्तिः ।

उरुगतिरस्य प्रभुतमशक्तिः ।।५।।


विदुरिममेके जगति महेन्द्रम् ।

जगुरयि केचिज्जननि महेशम् ।। ६ ।।


अवगतवेदो वदति महेन्द्रम् ।

परिचिततन्त्रो भणति महेशम् ।। ७।।


जननि शचि त्वं प्रथमदलस्य ।

भगवति दुर्गास्यपरदलस्य ।।८।।


न शचि शिवातस्त्वमितरदैवम् ।

बहुमुनिवाणीसमरसतैवम् ।।९।।


दिवि च सिताद्रौ शचिवपुषोर्वाम् ।

पृथगुपलम्भादयि भिदयोक्तिः ।। १० ।।


तनुयुगमूलं वपुरतिमायम् ।

करचरणाद्यैर्वियुतममेयम् ।। ११ ।।


त्वमुदरवर्तित्रिभुवनजीवा ।

भवसि शची सा जननि शिवा वा ।। १२ ।।


विभुशुचिकीलाततिरयि धूमम् ।

त्वममरमार्गं बत वमसीमम् ।। १३ ।।


जयसि नभस्थो जननि परस्तात् ।

नभसि च भान्ती भवसि पुरस्तात् ।। १४ ।।


त्वमतनुरम्ब ज्वलसि परस्तात् ।

इह खशरीरा लससि पुरस्तात् ।। १५ ।।


जननि परस्तान्मतिरसि भर्तुः ।

असि खशरीरा पृथगवगन्त्री ।। १६ ।।


अणुचयरूपं भगवति शान्तम् ।

न भवति शून्यम् तदिदमनन्तम् ।। १७ ।।


दिवि दधतीशे पुरुषशरीरम् ।

जननि पुरन्ध्री तनुरभवस्त्वम् ।। १८ ।।


दृशि विलसन्तं प्रभुमुपयान्ती ।

भवसि विराट् त्वं नृतनुषु भान्ती ।। १९ ।।


तव गुणगानं जननि विधातुम् ।

भवति पटुः को वियदिव मातुम् ।। २० ।।


भगवति तृप्तिर्भवतु न वा ते ।

अभिलषिताप्तिर्भवतु न वा मे ।। २१ ।।


भजति तवाङ्घ्रिं मम खलु भाषा ।

पति मनुरागात् प्रियमिव योषा ।। २२ ।।


अघमपहर्तुं शुभमपि कर्तुम् ।

अलमजरे ते गुणगणगानम् ।। २३ ।।


अवसि जगत्त्वं कुलिशिभुजस्था ।

अव मुनिभूमिं गणपतिधीस्था ।। २४ ।।


शशिवदनाभिर्गणपतिजाभिः ।

शशिवदनाद्या परिचरिताऽस्तु ।। २५ ।।


॥ इति प्रथमः स्तबकः ॥

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