काव्यकण्ठ वासिष्ठ श्री गणपति मुनि विरचितम्
इन्द्राणी सप्तसती
चतुर्थस्तामरस स्तबकः

इस अन्तिम **तामरस स्तबक** के साथ सात सौ श्लोकों से युक्त पवित्र *इन्द्राणी सप्तशती* पूर्ण होती है। शचीदेवी की आराधना, स्तुति और पारायण से प्राप्त होने वाले फलों का समग्र रूप से प्रतिपादन करने के कारण इसे फलश्रुति-स्वरूप समापन स्तुति माना जा सकता है। अन्धकार की निवृत्ति, साधनामार्ग में बाधा डालने वाले पापों का नाश, मन की शुद्धि, योग की प्राप्ति, अन्तःशक्ति का जागरण, शुभ संकल्पों की पूर्णता और भारतवर्ष की रक्षा—ये सभी इस स्तबक में प्रमुख फलों के रूप में प्रकट होते हैं।
श्री गणपति मुनि इन्द्राणीदेवी का आवाहन प्रकृति, माया, पराशक्ति तथा प्रत्येक अनुभूति और ज्ञान में प्रकाशित होने वाली शुद्ध प्रज्ञा के रूप में करते हैं। प्रत्येक शरीर में प्रवाहित होने वाली जीवनशक्ति वे ही हैं। उनका दर्शन कुलकुण्ड में सुप्त शक्ति, अन्तःअग्नि के रूप में प्रज्वलित होने वाली शक्ति, हृदय में प्रकाशित होने वाली सत्ता, द्विदलचक्र और सहस्रदल कमल के माध्यम से प्रवाहित होने वाली योगशक्ति तथा मस्तक के चन्द्रतत्त्व को पिघलाकर अमृतधाराओं के रूप में बहाने वाली पराशक्ति के रूप में किया गया है।
691वें श्लोक में एक अत्यन्त गम्भीर प्रार्थना व्यक्त होती है। मुनि प्रार्थना करते हैं कि आकाश में प्रकाशित विश्वशक्ति हृदय में प्रकाशित अन्तःशक्ति के साथ एक हो जाए और बल, आनन्द तथा पवित्र कार्यों की सिद्धि प्रदान करे। इसके पश्चात् वे दिव्यमाता से विनती करते हैं कि वे सत्कामनाओं का पोषण करें, दुर्भाग्य को सुखाकर नष्ट कर दें, अन्तःकरण में विद्यमान विषैले प्रभावों का विनाश करें और शुभ समृद्धि प्रदान करें।
अन्तिम श्लोकों में प्रार्थना की गई है कि हृदयकमल विकसित हो, उसके मध्य शचीदेवी का स्तुतिगान प्रकाशित हो और सभी श्रेष्ठ संकल्प सफल हों। अन्ततः श्री गणपति मुनि दिव्यमाता से विनती करते हैं कि वे उन्हें भारतभूमि की रक्षा करने के लिए आवश्यक शक्ति और सामर्थ्य प्रदान करें।
इस प्रकार यह तामरस स्तबक पूर्ण शरणागति, योगशक्ति-जागरण, आन्तरिक शुद्धि, शुभ संकल्पों की सिद्धि, राष्ट्रसेवा और भक्त की परम आकांक्षा की पूर्णता के साथ *इन्द्राणी सप्तशती* का महिमामय समापन करता है।
## इस स्तबक के मुख्य विषय
• सात सौ श्लोकों वाली *इन्द्राणी सप्तशती* का समापन
• फलश्रुति-स्वरूप समापन स्तुति
• शचीदेवी को प्रकृति, माया और पराशक्ति के रूप में देखना
• प्रत्येक अनुभूति में प्रकाशित होने वाली शुद्ध प्रज्ञा के रूप में उनकी स्तुति
• कुलकुण्ड में सुप्त अन्तःशक्ति का जागरण
• द्विदलचक्र, सहस्रदल कमल और अमृतप्रवाह से सम्बन्धित योगदर्शन
• आकाशस्थ विश्वशक्ति और हृदयस्थ अन्तःशक्ति का एकत्व
• पाप, मोह, मानसिक पीड़ा, दुर्भाग्य और आन्तरिक विषों का विनाश
• श्रेष्ठ संकल्पों और धार्मिक कार्यों की सिद्धि के लिए प्रार्थना
• हृदयकमल के विकसित होकर उसमें शचीदेवी की स्तुति प्रकाशित होने का आवाहन
• भारतभूमि की रक्षा के लिए श्री गणपति मुनि को शक्ति प्रदान करने की प्रार्थना
**इन्द्रो विश्वस्य राजति — इन्द्र सम्पूर्ण विश्व पर शासन करते हैं।**
॥ चतुर्थस्तामरस स्तबकः ॥
दिशतु शिवं मम चन्द्रवलक्षस्तिमिरसमूहनिवारणदक्षः ।
कृतगतिरोधकपातकनाशः सुरधरणीशवधूस्मितलेशः ।। ६७६ ।
अविदितमार्गतयातिविषण्णां गतिमपहाय चिराय निषण्णाम् ।
भरतधरामनिमेषधरत्री पतिगृहिणी परिपातु सवित्री ।। ६७७ ।।
भुवनमिदं भवतः किल पूर्वं यदमलरूपमनाकृतिसर्वम् ।
प्रकृतिरियं कुरुताददरिद्रामतिमतिशाततरां मम भद्रा ।। ६७८।।
सृजति जगन्ति विभौ परमे या सुबहुलशक्तिरराजत माया ।
प्रदिशतु सा मम कञ्चन योगं झटिति निराकृतमानसरोगम् ।।
प्रतिविषयं विकृतीतर सत्ता विलसति या मतिमद्भिरुपात्ता ।
इयमनघा परिपालितजातिं वितरतु मे विविधां च विभूतिम् ।।
प्रतिविषयग्रहणं परिपूतामतिरखिलस्य जनस्य च माता ।
मम विदधातु शुभं शुभनामा त्रिदिवनिवासिनरेश्वररामा ।। ६८१
गगनतनुर्जगतो विपुलस्य प्रभुपदमग्र्यमिता सकलस्य ।
प्रतिजनदेहमजा प्रवहन्ती मम हृदि नन्दतु सा विहरन्ती ।। ६८२
पटुकुलकुण्डधनञ्जयकीला समुदितहार्दविभाकरलीला ।
द्रुतशिर इन्दुकलामृतधारा जनमवतान्निजभक्तमुदारा ।। ६८३
विषयसमाकृतिरत्र पुरस्ताद्विमलतमा किल तत्र परस्तात् ।
भुवनमयी भुवनाच्च विभक्तामतिरनघाऽवतु मामतिशक्ता ।।
विषयपरिग्रहणेष्वतिसक्ता विषयविभूतिषु कापि विविक्ता ।
अखिलपतेर्मयि दीव्यतु शक्तिर्विमलतमा विधुतेतरशक्तिः ।।
दृशिदृशि भाति यदीयमपापं दिशि दिशि गन्तृ च वेत्तृ च रूपम् ।
भवतु शिवाय ममेयमनिन्द्या भुवनपतेर्गृहिणी मुनिवन्द्या ।। ६८६
जडकुलकुण्डदरीषु शयाना बुधकुलवह्निषु भूरिविभाना ।
हरिहयशक्तिरमेयचरित्रा मम कुशलं विदधातु पवित्रा ।। ६८७ ।
दहरगताखिलमाकलयन्ती द्विदलगता सकलं विनयन्ती ।
दशशतपत्रगता मदयन्ती भवतु मयीन्द्रवधूर्विलसन्ती ।। ६८८।।
गृहयुगलीश्रिय आश्रितगम्या पदकमलद्वितयी बहुरम् या ।
मम हृदि भात्वविकुण्ठितयाना हरिसुदृशस्तरुणारुणभाना ।।
उपरि तताकुलकुण्डनिशान्ताज्ज्वलितधनञ्जयदीधितिकान्तात्
हरिहयशक्तिरियं मम पुष्टा द्रवयतु मस्तकचन्द्रमदुष्टा ।। ६९० ।।
नभसि विराजति या परशक्तिर्मम हृदि राजति या वरशक्तिः ।
उभयमिदं मिलितं बहुवीर्यं भवतु सुखं मम साधितकार्यम् ।।६९१
त्रिभुवनभूमिपतेः प्रि ययोषा त्रिमलहरी सुरविष्टपभूषा ।
मम वितनोतु मनोरथपोषं दुरितविपत्तिततेरपि शोषम् ।। ६९२ ।
पवनजगत्प्रभुपावनमूर्तिर्जलधरचालनविश्रुतकीर्तिः ।
मम कुशलाय भवत्वरिभीमा जननवतां जननी बहुधामा ।। ६९३
मम सुरराजवधूकलयोग्रा खलजनधूननशक्तनखाग्रा ।
दमयतु कृत्तशिराः कलुषाणि प्रकटबला हृदयस्य विषाणि ।।६९४
कुलिशिवधूकलया परिपुष ्टा बुधनुतसद्गुणजालविशिष्टा ।
मम परितो विलसद्विभवानि द्रुपदसुता विदधातु शिवानि ।। ६९५
सुरजनराड्दयितांशविदीप्ते पदकमलाश्रितसाधुजनाप्ते ।
दुरितवशादभितो गतभासं मनुजकुमारजनन्यवदासम् ।। ६९६ ।
अमरनरेश्वरमन्दिरनेत्री सुमशरजीवनसुन्दरगात्री ।
भवतु शची विततस्वयशस्सु प्रतिफलिता गणनाथवचस्सु ।।६९७
विकसतु मे हृदयं जलजातं विलसतु तत्र शचीस्तुतिगीतम् ।
स्फुरतु समस्तमिहेप्सितवस्तु प्रथिततमं मम पाटवमस्तु ।। ६९८
कुरु करुणारससिक्तनिरीक्षे वचनपथातिगसद्गुणलक्षे ।
शचि नरसिंहजमाहितगीतं भरतधरामवितुं पटुमेतम् ।। ६९९ ।।
सुललिततामरसैः प्रसमाप्तं वरनुतिबन्धमिमं श्रवणाप्तम् ।
जननि निशम्य सुसिद्धमशेषं हरिललने मम कुर्वभिलाषम् ।। ।। ।। ७०० ।।
॥ इति श्रीभगवन्महर्षिरमणान्तेवासिनो वासिष्ठस्य
नरसिंहसूनोः गणपतेः कृतौ इन्द्राणीसप्तशती समाप्ता ॥
॥ इन्द्रो विश्वस्य राजति ॥
