काव्यकण्ठ वासिष्ठ श्री गणपति मुनि विरचितम्
इन्द्राणी सप्तसती
तृतीयो मुकुल स्तबकः

*इन्द्राणी सप्तशती* का यह तृतीय स्तबक एक गम्भीर दार्शनिक स्तुति है। इसमें श्री गणपति मुनि इन्द्राणी शचीदेवी को उस परमशक्ति के रूप में प्रकट करते हैं, जो अनेक नामों, रूपों और दैवी तत्त्वदर्शनों के माध्यम से अभिव्यक्त होती हैं। यह स्तबक इस प्रार्थना से आरम्भ होता है कि शक्र के दिव्यधाम की साम्राज्ञी शचीदेवी की चन्द्रमा के समान मनोहर मुस्कान हृदय में निर्मल प्रज्ञा को जागृत करे। साथ ही मुनि दुःख से आहत भारतवर्ष के कल्याण और संरक्षण के लिए देवी की करुणा का आवाहन करते हैं।
इस स्तबक के प्रमुख दार्शनिक विषयों में ‘व्योमतनु’ की अवधारणा विशेष महत्त्व रखती है—अर्थात् वह दिव्य विश्वरूप, जिसका शरीर स्वयं आकाश है। कुछ ऋषि इस विश्वमय रूप को पुरुषस्वरूप में देखते हैं, कुछ इसे स्त्रीस्वरूप मानते हैं, जबकि अन्य इसे स्त्री और पुरुष के भेद से परे सगुण ब्रह्म के रूप में समझते हैं। इस प्रकार मुनि विभिन्न आध्यात्मिक परम्पराओं और दार्शनिक दृष्टियों का बिना किसी विरोध के अत्यन्त सुन्दर समन्वय करते हैं।
शचीदेवी को अनेक दैवी नामों के साथ अभिन्न स्वरूप में प्रतिष्ठित किया गया है। वे ही दुर्गा हैं, अदिति हैं, शिवा हैं और शक्र की शक्ति शची हैं। उन्हें विश्व के महाप्राण, रुद्र, प्रणव और विद्युत् को मुकुट की भाँति धारण करने वाले शक्र के रूप में भी स्तुत किया गया है। यह स्तबक सिखाता है कि प्राण, प्रणव और आकाश में विचरण करने वाली दिव्यज्योति तीन पृथक् सत्ताएँ नहीं हैं, बल्कि एक ही परमसत्य की तीन भिन्न अभिव्यक्तियाँ हैं।
ब्रह्म और शक्ति के सम्बन्ध को भी यह स्तबक अत्यन्त सूक्ष्मता से समझाता है। निर्गुण ब्रह्म शब्द आदि समस्त गुणों से परे है। शचीदेवी उसी ब्रह्म की वह सगुण अभिव्यक्ति हैं, जो शब्द, सौन्दर्य, शक्ति और दैवी गुणों से सम्पन्न है। वे परम साक्षी से भिन्न नहीं हैं, फिर भी समस्त लोकों में होने वाले प्रत्येक कार्य का संचालन उन्हीं के द्वारा होता है। इस प्रकार दिव्यमाता को सृष्टि से परे स्थित परम सत्ता के रूप में भी देखा गया है और सृष्टि की प्रत्येक गति में सक्रिय शक्ति के रूप में भी। वे परम शुद्ध और परात्पर तत्त्व हैं, और वही शक्ति अभिव्यक्त होकर विश्व में कार्यरूप धारण करती है।
इस स्तबक में प्रकाशमय दिव्य आकाश—‘द्यौस्’—की अवधारणा भी प्रकट होती है। मुनि घोषित करते हैं कि यही दिव्य आकाश जगत् का माता और पिता दोनों है। वे बताते हैं कि दृश्य आकाश के पार एक शुद्ध परमसत्य विद्यमान है। शचीदेवी को पूर्ण अदिति, नित्यस्वरूपिणी, शब्द को धारण करने वाली, प्रकाशमयी गौरी और अपने व्योममय शरीर से सम्पूर्ण विश्व की रक्षा करने वाली देवी के रूप में देखा गया है।
अन्तिम श्लोकों में मुनि उनकी परमशक्ति से दुःखियों की रक्षा करने की प्रार्थना करते हैं। जिस प्रकार देवी ने इन्द्र की भुजाओं को शक्ति प्रदान की है, उसी प्रकार वे वासिष्ठ के मन और प्रज्ञा को भी सामर्थ्य प्रदान करें—ऐसी प्रार्थना की गई है। इस प्रकार यह तृतीय स्तबक ज्ञान, एकत्व, विश्वव्यापी दैवी तत्त्व और दिव्य संरक्षण को अभिव्यक्त करने वाली महिमामयी स्तुति है। यह प्रकट करता है कि दिव्यमाता के सभी नाम अन्ततः एक ही परमशक्ति में एकीकृत हो जाते हैं।
## इस स्तबक के मुख्य विषय
• शचीदेवी की चन्द्रमा के समान मुस्कान से निर्मल प्रज्ञा की प्राप्ति के लिए प्रार्थना
• भारतवर्ष की रक्षा के लिए इन्द्राणी की करुणा का आवाहन
• ‘व्योमतनु’—आकाश को ही शरीर रूप में धारण करने वाले दिव्यरूप—की शिक्षा
• दैवी सत्ता को पुरुष, स्त्री तथा स्त्री-पुरुष भेद से परे रूपों में देखने वाली धारणाओं का समन्वय
• शचीदेवी को दुर्गा, अदिति, शिवा और शक्रशक्ति के अभिन्न स्वरूप के रूप में देखना
• दिव्यमाता को विश्वप्राण, प्रणव, रुद्र और शक्र के रूप में प्रकट करना
• प्राण, प्रणव और दिव्य आकाशज्योति को एक ही सत्य की तीन अभिव्यक्तियों के रूप में समझना
• शचीदेवी को शब्द, शक्ति और दैवी गुणों से सम्पन्न सगुण ब्रह्मस्वरूपिणी के रूप में प्रतिष्ठित करना
• दिव्य आकाश को विश्व के माता और पिता दोनों के रूप में देखना
• दुःखियों की रक्षा और वासिष्ठ की प्रज्ञा को शक्ति प्रदान करने के लिए दिव्यमाता से प्रार्थना
॥ तृतीयो मुकुल स्तबकः ॥
हासाः शक्रगृहेश्वर्याश्चन्द्ररुचः ।
भूयासुर्विमलप्रज्ञायै हृदि मे ।। ५१ ।।
इन्द्राण्याः करुणा लोकाश्शोकहृतः ।
भूयासुर्भरतक्ष्मायै क्षेमकृतः ।। ५२ ।।
व्यक्तिर्व्योमतनु शक्तित्वाद्द्वनिता ।
ज्ञातृत्वात्पुरुषः केषाञ्चिद्विदुषाम् ।। ५३ ।।
व्यक्तिं व्योमतनुं ये प्राहुः पुरुषम् ।
तेषां तत्त्वविदां कल्पस्स्यात् त्रिविधः ।। ५४ ।।
रुद्रं केऽपि जगुः शक्रं केऽपि विदुः ।
भाषन्ते भुवनप्राणं केऽपि विदः ।। ५५।।
व्यक्तिं व्योमतनुं प्राहुर्ये वनिताम् ।
तेषां च त्रिविधः कल्पश्शास्त्रविदाम् ।। ५६ ।।
दुर्गा सूरिवरैः कैश्चित्सा गदिता ।
शच्यन्यैर्विबुधैर्ज्ञैरन्यैरदितिः ।। ५७।।
एकेषां विदुषां व्यक्तिर्योमतनुः ।
न स्त्री नो पुरुषो ब्रह्मैतत्सगुणम् ।। ५८ ।।
त्वं विश्वस्य महान् प्राणः कः परमे ।
त्वं रुद्रः प्रणवस्त्वं शक्रोऽभ्रशिखी ।। ५९।।
त्वं कस्यास्यदितिस्त्वं रुद्रस्य शिवा ।
त्वं शक्रस्य शची शक्तिर्देवनुते ।। ६० ।।
प्राणश्च प्रणवो ज्योतिश्चाम्बरगम् ।
वस्त्वेकं त्रिगुणं नो वस्तु त्रितयम् ।। ६१।।
शक्तेरम्बपरे शक्तस्यापि भिदा ।
ज्वाला पावकवद्भाषा भेदकृ ता ।। ६२।।
सर्वं दृश्यमिदं भुञ्जाने परमे ।
पुंनामस्तुतयो युज्यन्ते खलु ते ।। ६३ ।।
कुर्वाणेम्बसतस्सन्तोषं सततम् ।
स्त्रीनामस्तुतयः शोभां ते दधते ।। ६४ ।।
सब्रह्म ब्रुवते विद्वांसो विगुणम् ।
त्वं मातस्सगुणं ब्रह्मासि प्रथिते ।। ६५।।
शब्दाद्यैर्वियुतं सद्ब्रह्मा मलिनम् ।
शब्दाद्यैः सहिता त्वं देव्यच्छहिता ।। ६६ ।।
साक्षि ब्रह्म परं त्वं मातः कुरुषे ।
सर्वेषां जगतां कार्यं सर्वविधम् ।। ६७ ।।
द्यौर्माता जगतो द्यौरेवास्य पिता ।
व्याप्तं भाति जगद्यावा सर्वमिदम् ।। ६८ ।।
आकाशाद्रजसो द्यौरन्या विरजाः ।
आकाशेऽस्ति पुनस्तत्पारे च परा ।। ६९ ।।
द्यावं तां जगतो रङ्गे व्योमतनुम् ।
पारे शुद्धतमां विद्मस्त्वां परमे ।। ७० ।।
त्वां पूर्णामदितिं शक्तिं देवि शचीम् ।
नित्यं शब्दवतीं गौरीं प्रब्रुवते ।। ७१।।
पुंनामा भवतु स्त्रीनामास्त्वथवा ।
व्यक्तिर्व्यामतनुर्लोकं पात्यखिलम् ।। ७२ ।।
नाके सा किल भात्यैन्द्री राज्यरमा ।
विभ्राणा ललितं स्त्रीरूपं परमा ।। ७३ ।।
शक्तां देवि विधेह्यार्तानामवने ।
इन्द्रस्येव भुजां वासिष्ठस्य मतिम् ।। ७४ ।।
पूजाशक्रतरुण्यैतैस्सिध्यतु ते ।
गातृणां वरदे गायत्रैर्मुकुलैः ।। ७५॥
॥ इति तृतीयस्तब कः ॥
