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काव्यकण्ठ वासिष्ठ श्री गणपति मुनि विरचितम्

इन्द्राणी सप्तसती

द्वितीयो मदलेखा स्तबकः

Indrani Saptasati - The 700 Verses Mystical work of Kavyakantha Sri Ganapati Muni

यह स्तबक देवताओं की साम्राज्ञी, इन्द्र के पराक्रम के पीछे सक्रिय सार्वभौम शक्ति, पौलोमी शचीदेवी—इन्द्राणी—की प्रभावशाली स्तुति है। श्री गणपति मुनि प्रार्थना करते हैं कि उनकी चन्द्रमा के समान निर्मल मुस्कान और करुणामयी दृष्टि भारतवर्ष की दुर्बलता को दूर करे तथा भक्त को शुभ और मंगल प्रदान करे।


इस स्तबक की प्रमुख शिक्षा दिव्यमाता के संकल्प की अप्रतिहत शक्ति है। जब उनका संकल्प उदित होता है, तब सम्भव और असम्भव का सामान्य भेद ही समाप्त हो जाता है। प्रकृति के नियम भी अतिक्रमित हो सकते हैं। दुर्बल व्यक्ति विजयी हो सकता है, महान शक्तिशाली भी पतित हो सकता है, मन्दबुद्धि व्यक्ति विद्या में सफलता प्राप्त कर सकता है और विद्वान भी भ्रम में पड़ सकता है। राज्य उदित हो सकते हैं और उनका पतन भी हो सकता है। इन श्लोकों के माध्यम से मुनि प्रकट करते हैं कि संसार में विजय, ज्ञान, अधिकार, पराक्रम और योगसिद्धि—ये सभी अन्ततः शक्ति की अनुमति और कृपा पर ही निर्भर हैं।


आगे के श्लोकों में इन्द्राणी को ऋषियों द्वारा स्तुत गूढ़ मायाशक्ति, स्वयं इन्द्र को भी नियन्त्रित करने वाली पराशक्ति तथा तीनों लोकों को धारण और पोषित करने वाली जगद्धात्री के रूप में वन्दित किया गया है। उनका सौन्दर्य, उनकी दृष्टि और उनकी भौंहों की हल्की-सी गति तक गर्व और मद से उन्मत्त असुरों को दबा देने में समर्थ बताई गई है। युद्ध में इन्द्र द्वारा प्रयुक्त वज्रायुध भी उनकी महान शक्ति के एक अंश से निर्मित कहा गया है।


इस स्तबक में शरणागति से सम्बन्धित एक गम्भीर आध्यात्मिक शिक्षा भी मिलती है। जो भक्त अपने आपको पूर्णतः दिव्यमाता को समर्पित कर देता है, उसे वे उसी प्रकार स्वयं सुरक्षित रखते हुए आगे ले जाती हैं, जैसे बिल्ली अपने बच्चे को मुख में पकड़कर ले जाती है। इसके विपरीत एक अन्य योगमार्ग की तुलना उस बन्दर के बच्चे से की गई है, जो अपनी माता के शरीर को कसकर पकड़कर चलता है। इस प्रकार यह स्तबक पूर्ण शरणागति के मार्ग और स्वप्रयत्न से की जाने वाली योगसाधना के मार्ग के बीच का अन्तर अत्यन्त सुन्दर ढंग से स्पष्ट करता है। यह आश्वासन भी देता है कि जिसे समाधि की विधि ज्ञात न हो, वह भी यदि जप और भक्ति से निरन्तर दिव्यमाता की सेवा करे, तो उनकी कृपा से धीरे-धीरे सिद्धि, स्थिरता और आध्यात्मिक निष्ठा प्राप्त कर सकता है।


अन्त में मुनि अत्यन्त उत्कट भाव से प्रार्थना करते हैं कि अनेक वर्गों में विभाजित और शत्रुशक्तियों के भार से पीड़ित भारतभूमि की रक्षा करने की शक्ति उन्हें प्रदान की जाए। इसलिए यह स्तबक केवल गूढ़ आध्यात्मिक अर्थ से परिपूर्ण भक्तिस्तोत्र ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चेतना, संरक्षण और देशसेवा की भावना से ओतप्रोत प्रार्थना भी है।


## इस स्तबक के मुख्य विषय


• भारतवर्ष की दुर्बलता दूर करने के लिए शचीदेवी की करुणादृष्टि का आवाहन

• दिव्य संकल्प की अप्रतिहत शक्ति का प्रकाशन

• विजय, पराजय, अभ्युदय, पतन, ज्ञान और भ्रम—इन सभी को शक्ति की कृपा पर निर्भर बताना

• इन्द्राणी को ऋषियों द्वारा स्तुत मायाशक्ति तथा तीनों लोकों की पोषिका के रूप में वन्दित करना

• इन्द्र के वज्रायुध को उनकी शक्ति के एक अंश से निर्मित बताना

• पूर्ण शरणागति और प्रयत्नपूर्वक योगसाधना के मार्गों का अन्तर समझाना

• निरन्तर जप और भक्ति से क्रमशः सिद्धि तथा निष्ठा की प्राप्ति का आश्वासन

• विभाजन और संकटों से पीड़ित भारतभूमि की रक्षा के लिए शक्ति प्रदान करने की प्रार्थना


॥ द्वितीयो मदलेखा स्तबकः ॥


पौलोम्याः परिशुभ्रज्योत्स्नादृश्यरुचो मे ।

श्रीमन्तो दरहासाः कल्पन्तां कुशलाय ।। १२६ ।।


कारुण्यामृतसिक्ता शक्ता शक्रमहिष्याः ।

प्रेक्षा भारतभूमेर्दौर्बल्यं विधुनोतु ।। १२७ ।।


वन्दे निर्जरराज्ञीं सङ्कल्पे सति यस्याः ।

साध्यासाध्यविचारो नैव स्यादणुकोऽपि ।। १२८ ।।


सङ्कल्पस्तव कश्चिच्चित्ते चेद्दिव ईशे ।

स्यादुल्लङ्घ्य निसर्गं सिद्धिर्निष्फलता च ।। १२९।।


मूढोऽप्युत्तमरीत्या सिध्येदध्ययनेषु ।

मेधावी च नितान्तं नैव स्यात्कृतकृत्यः ।। १३०।।


उत्पद्येत महेश्वर्यप्राज्ञादपि शास्त्रम् ।

यायान्मातरकस्माद्विभ्रान्तिं विबुधोऽपि ।। १३१ ।।


अल्पानामबलानां सङ्ग्रामे विजयः स्यात् ।

शक्तानां बहुलानां घोरा स्यात्परिभूतिः ।। १३२।।


राजेरन्नृपपीठेष्वख्यातानि कुलानि ।

स्याद्दुर्धर्षबलानां पातो राजकुलानाम् ।। १३३ ।।


निर्यत्नोऽपि समाधेर्विन्देद्देवि समृद्धिम् ।

योगस्याम्ब न पश्येदभ्यस्यन्नपि सिद्धिम् ।। १३४ ।।


अत्यन्तं यदसाध्यं नेदिष्ठं भवतीदम् ।

साध्यं सर्वविधाभिः स्यादिन्द्राणि दविष्ठम् ।। १३५।।


गायामो मुनिसङ्घैर्गेयाम् कामपि मायाम् ।

इन्द्रस्यापि विनेत्रीं त्रैलोक्यस्य च धात्रीम् ।। १३६ ।।


विद्यानामधिनाथे कां विद्यां श्रयसे त्वम् ।

इन्द्रं कर्तुमधीनं विश्वस्मादधिकं तम् ।। १३७ ।।


नित्यालिप्तमनीषे स्त्रीमोहो न वितर्क्यः ।

भ्रूचेष्टानुचरत्वादन्या स्यादनुकम्पा ।। १३८ ।।


सौन्दर्यं परमन्यद्वज्रेश्वर्यथवा ते ।

हर्तुं यत्सुखमीष्टे तादृक्तस्य च चित्तम् ।। १३९ ।।


चक्षुर्दर्शनमात्रान्निस्तेजो विदधानम् ।

चित्तं चोज्झितधैर्यं मत्तानां दनुजानाम् ।। १४० ।।


गर्ते दुर्जनदेहे मग्नान् पङ्कविलग्नान् ।

प्राणानात्मसजातीनुद्धर्तुं धृतदीक्षम् ।। १४१ ।।


वज्रं निर्जरराजो यद्धत्ते समरेषु ।

त्वच्छक्तेः कलयैतन्मन्मातर्निरमायि ।। १४२।।


राज्ञीत्वात्परमेते राजत्वं शतमन्योः ।

निश्शक्तिस्स विना त्वां कामाज्ञां कुरुतां नः ।। १४३।।


सर्वं शक्रनिशान्तस्येशाने तव हस्ते ।

अस्माकं तु धियेदं स्तोत्रं सङ्ग्रहतस्ते ।। १४४।।


गन्तव्यं स्वरधीशे निश्शेषार्पणशूरम् ।

बिभ्राणा नयसि त्वं मार्जालीव किशोरम् ।। १४५।।


गृह्णन्नम्बरनाथामम्बामश्लथमन्धः ।

कीशस्येव किशोरो योगी गच्छति गम्यम् ।। १४६।।


पूर्णात्मार्पणहीनो ऽप्यज्ञाताऽपि समाधेः ।

नित्यं यो जगदम्ब त्वां सेवेत जपाद्यैः ।। १४७।।


तं चाचञ्चलभक्तिं कृत्वा पूरितकामम् ।

निष्ठां दास्यसि तस्मै पौलोमि क्रमशस्त्वम् ।। १४८।।


भिन्नां सङ्घसहस्रैः खिन्नां शत्रुभरेण ।

पातुं भारतभूमिं मातर्देहि बलं मे ।। १४९।।


त्र्यैलोक्यावनभारश्रान्तां वासवकान्ताम् ।

हैरम्ब्यो मदलेखाः सम्यक् सम्मदयन्तु ।। १५० ।।


॥ इति द्वितीयः स्तबकः ॥

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