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काव्यकण्ठ वासिष्ठ श्री गणपति मुनि विरचितम्

शिवशतकं

दशमं शार्दूलविक्रीडितदशकम्

Siva Satakam By Kavyakantha Sri Ganapati Muni

शिवशतकम् – संक्षिप्त परिचय और महिमा

शिवशतकम् भगवान शिव की स्तुति में काव्यकण्ठ वासिष्ठ श्री गणपति मुनि द्वारा रचित एक गंभीर, सौ श्लोकों का स्तोत्र है। इस स्तोत्र में शिव समस्त जीवों के अंतरात्मा रूप में प्रकाशित होने वाले परमेश्वर, जगत् के अधिपति, पापों का नाश करने वाले करुणामूर्ति और मोक्ष प्रदान करने वाले परमदैव के रूप में आराधित हैं। यहाँ शिव केवल पवित्र दिव्य रूप वाले देवता के रूप में ही नहीं, बल्कि सूर्य, अग्नि, वायु, आकाश, जीवों के हृदय और समस्त विश्व में व्याप्त परमसत्य के रूप में दर्शन देते हैं।


ये श्लोक भक्तिपूर्ण स्तुति से लेकर गहरी आध्यात्मिक दृष्टि तक सुंदर रूप से प्रवाहित होते हैं। शिव को अष्टमूर्ति, अर्थात् आठ विश्वरूपों के अधिपति; पशुपति, अर्थात् समस्त जीवों की करुणा से रक्षा करने वाले प्रभु; अपने कृपाकटाक्ष से भक्त को पवित्र करने वाले दयास्वरूप; और नाम-रूपों से परे परमचैतन्य के रूप में वर्णित किया गया है। साथ ही इस स्तोत्र में गौरीदेवी की दिव्य उपस्थिति, शिव की जटाओं से प्रवाहित होने वाली पवित्र गंगा और शिवनामों की रक्षणशक्ति की भी महिमा गाई गई है।


शिवशतकम् का पारायण भक्ति, अंतःशुद्धि, धैर्य, वैराग्य और मन की शांति को बढ़ाने में अत्यंत सहायक है। यह स्तोत्र बार-बार बताता है कि शिव का स्मरण, स्तुति और नामसंकीर्तन पापों, दुःखों, भयों और सांसारिक कष्टों को दूर करते हैं। यह शतकम् साधकों को यह शिक्षा देता है कि शिव के चरणकमल ही सच्चा शरण हैं, और उनका नामस्मरण आध्यात्मिक कल्याण तथा मोक्ष के लिए सबसे सरल और श्रेष्ठ मार्गों में से एक है।


भक्तों और साधकों के लिए यह शतकम् प्रार्थना भी है और ध्यान भी। यह शिव के प्रति पूर्ण शरणागति उत्पन्न करता है, विवेक को जागृत करता है, हृदय को पवित्र करता है और मन को सांसारिक आश्रयों से हटाकर परमेश्वर की परमकृपा की ओर मोड़ता है। इसका पारायण भक्त को शिवभक्ति की पवित्र धारा में ले जाकर क्रमशः आंतरिक शांति, दैवी रक्षा और परमात्मा-साक्षात्कार की ओर अग्रसर करता है।

॥ काव्यकण्ठ वासिष्ठ श्रीगणपतिमुनि विरचितम् शिवशतकम् ॥


अथ दशमं शार्दूलविक्रीडितदशकम्


यः प्रज्ञानमयो यमाहुरजरं येनाभितः स्थीयते

यस्मै कर्मसमर्पयन्ति मुनयो यस्मात्परो नापरः ।

यस्यासावसुरम्बरे तपति नः प्राणान्दघानो रविः

यस्मिन्प्रोतमिदं समस्तभुवनं कस्मैचिदस्मै नमः ॥ ९१।


कन्याशीतगिरेरियं सुललितैर्गात्रैरियं भामिनी

मातेयं गजवक्त्रतारकजितोरित्यल्पदृष्टेः कथाः ।

सर्वस्मिन्नचरे चरे च विभवादेका परा जाग्रती

शक्तिः काचन सा विचाररसिकैराराध्यते नाथ ते ॥ ९२ ॥


केषाञ्चित्स हिरण्मयो मतिमतां कृष्णः परेषां विदा

मन्येषां विदुषां सुधांशुधवलस्त्रेधा परेषां परः

केऽपि स्थूलदृशां जगत्पतिवपुर्ध्यानाय कल्पा इमे

सत्यं तु ज्वलदप्यबाध्यमभितो गूढं गुहायामिव ॥ ९३ ॥


सौरं मण्डलमुज्ज्वलं तव तपः श्वासश्चरन्मारुतो

बिम्बं मेचकतोयजातसुहृदो मन्दस्मितं सुन्दरम्

चित्रं कन्दुकखेलनं वसुमतीलोकस्य तिर्यग्भ्रमिः

को वा भाषितुमीश ते प्रभवति स्वल्पश्रुतो वैभवम् ॥ ९४ ॥


संश्लिष्यन्प्रकृतिं रजोगुणमयीं देहे विराभण्यसे

बिम्बेऽर्कस्य हिरण्यगर्भ उदितः शुद्धां श्रितः सात्त्विकीम् ।

ईशस्त्वं परतामसीमुपगतो गुप्तां नभस्युच्यसे

धेनुः श्रीर्गिरिजेति शाक्तसमये यस्यास्त्रिधा विश्रुतिः ॥ ९५॥


ऊर्ध्वं भासि हिरण्मयाङ्गसकलप्राणे रवेर्मण्डले

लोके च ध्वनिधाम्नि रुद्रमरुतामन्तः समुद्द्योतसे ।

अस्माकं हृदयेषु च क्षितिजुषां वैश्वानर भ्राजसे

शेषं सर्वमिदं पचनपि पर व्याप्तोऽभितो वर्तसे ॥ ९६ ॥


भूतत्त्वं तव शैलजात्वमपि ते शक्तेः प्रभो पण्डिताः

चातुर्येण समर्थयन्ति युवयोर्लीलाशरीरग्रहम् ।

केचिद्विग्रहकल्पनं जडधियामर्थेकृतं साधय

न्त्यन्येंऽशावतरं भणन्ति भणितं भाक्तं परे मन्वते ॥ ९७ ॥


माहात्म्यं तव वक्तु कः पशुपते यद्रोमतुल्यं महत्

ब्रह्माण्डं चरितानि वेद तव कः सर्वान्तरो भासि यः ।

यागं को विदधातु ते वरदकैर्यस्य स्वमेवाखिलं

नामैकं तव सूरिभिः प्रकटितं ङेऽन्तं हृदादि श्रये ॥ ९८ ।।


द्राक्षामाक्षिपति क्षिणोति मधुनो दर्पं सितां निन्दति

क्षीरं नो बहु मन्यते प्रशमयत्यग्र्यं सुधाया यशः ।

किं वान्यत्कथयाम तं च घृणया कान्ताऽधरं वीक्षते

प्राप्तो जन्मसभक्तवक्त्रकमलान्नामध्वनिर्नाथ ते ॥ ९९ ॥


किं यागैरतिदारुणेन तपसा किं वा किमभ्यर्चनैः

एका लोकहितङ्करी विजयते मुक्तेरुपायः परः ।

कामारे करुणानिधे पशुपते भूतेश गौरीपते

शम्भो शङ्कर चन्द्रचूड जगतां नाथेति नामावली ॥ १०० ॥


॥ इति श्रीभगवन्महर्षिरमणान्तेवासिनो वासिष्ठस्य नरसिंहसूनोः गणपतेः

कृतिः शिवशतकं समाप्तम् ॥

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