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काव्यकण्ठ वासिष्ठ श्री गणपति मुनि विरचितम्

शिवशतकं

सप्तमं शशिवदनादशकम्

Siva Satakam By Kavyakantha Sri Ganapati Muni

शिवशतकम् – संक्षिप्त परिचय और महिमा

शिवशतकम् भगवान शिव की स्तुति में काव्यकण्ठ वासिष्ठ श्री गणपति मुनि द्वारा रचित एक गंभीर, सौ श्लोकों का स्तोत्र है। इस स्तोत्र में शिव समस्त जीवों के अंतरात्मा रूप में प्रकाशित होने वाले परमेश्वर, जगत् के अधिपति, पापों का नाश करने वाले करुणामूर्ति और मोक्ष प्रदान करने वाले परमदैव के रूप में आराधित हैं। यहाँ शिव केवल पवित्र दिव्य रूप वाले देवता के रूप में ही नहीं, बल्कि सूर्य, अग्नि, वायु, आकाश, जीवों के हृदय और समस्त विश्व में व्याप्त परमसत्य के रूप में दर्शन देते हैं।


ये श्लोक भक्तिपूर्ण स्तुति से लेकर गहरी आध्यात्मिक दृष्टि तक सुंदर रूप से प्रवाहित होते हैं। शिव को अष्टमूर्ति, अर्थात् आठ विश्वरूपों के अधिपति; पशुपति, अर्थात् समस्त जीवों की करुणा से रक्षा करने वाले प्रभु; अपने कृपाकटाक्ष से भक्त को पवित्र करने वाले दयास्वरूप; और नाम-रूपों से परे परमचैतन्य के रूप में वर्णित किया गया है। साथ ही इस स्तोत्र में गौरीदेवी की दिव्य उपस्थिति, शिव की जटाओं से प्रवाहित होने वाली पवित्र गंगा और शिवनामों की रक्षणशक्ति की भी महिमा गाई गई है।


शिवशतकम् का पारायण भक्ति, अंतःशुद्धि, धैर्य, वैराग्य और मन की शांति को बढ़ाने में अत्यंत सहायक है। यह स्तोत्र बार-बार बताता है कि शिव का स्मरण, स्तुति और नामसंकीर्तन पापों, दुःखों, भयों और सांसारिक कष्टों को दूर करते हैं। यह शतकम् साधकों को यह शिक्षा देता है कि शिव के चरणकमल ही सच्चा शरण हैं, और उनका नामस्मरण आध्यात्मिक कल्याण तथा मोक्ष के लिए सबसे सरल और श्रेष्ठ मार्गों में से एक है।


भक्तों और साधकों के लिए यह शतकम् प्रार्थना भी है और ध्यान भी। यह शिव के प्रति पूर्ण शरणागति उत्पन्न करता है, विवेक को जागृत करता है, हृदय को पवित्र करता है और मन को सांसारिक आश्रयों से हटाकर परमेश्वर की परमकृपा की ओर मोड़ता है। इसका पारायण भक्त को शिवभक्ति की पवित्र धारा में ले जाकर क्रमशः आंतरिक शांति, दैवी रक्षा और परमात्मा-साक्षात्कार की ओर अग्रसर करता है।

॥ काव्यकण्ठ वासिष्ठ श्रीगणपतिमुनि विरचितम् शिवशतकम् ॥


अथ सप्तमं शशिवदनादशकम्


अमृतमयूखं मुकुटमनर्घम् ।

जयति दधानो जगदधिराजः ॥ ६१ ॥


सकलबुधौघे विफलविधाने ।

असति शरण्ये मतिमतिगण्ये ॥ ६२ ॥


दुरितविसारप्रतमसि लोके ।

ऋषिकुलजानां सदसि सशोके ॥ ६३ ॥


अतिदुरदृष्टान्नरनियुतेषु ।

अपि मितमत्तुं धनरहितेषु ॥ ६४ ॥


उदितविरोधास्वयुतभिदासु ।

चतसृषु जातिष्वबलतमासु ॥६५॥


मुहुरपि लोले क्षितिसुरशीले ।

अजगणकल्पे भुजभवसङ्घे ॥ ६६ ॥


चतुरविरोधिव्रजहृतसाराम् ।

अविरतनेत्रस्रुतजलधाराम् ॥ ६७ ॥


भरतधरित्रीं भुवननृपालः ।

अवतु दयालुः सितगिरिशालः ॥ ६८ ॥


अरुणधरित्रीधर हर दूनाम् ।

भरतधरित्रीमव शिव दीनाम् ॥ ६९ ॥


हर भरतक्ष्माजनवरदूतम्

कुरु चरितार्थं गणपतिमेतम् ॥ ७० ॥

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