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काव्यकण्ठ वासिष्ठ श्री गणपति मुनि विरचितम्

उमाशतकं

सप्तमं दशकम् - मदालसावृत्तम्

Uma Satakam By Kavyakantha Sri Ganapati Muni

उमा शतकम् – संक्षिप्त परिचय

उमा शतकम् परमशक्ति स्वरूपिणी, भगवान् शिव की अर्धांगिनी दिव्य माता उमा देवी की स्तुति में काव्यकण्ठ वासिष्ठ श्री गणपति मुनि द्वारा रचित एक गंभीर सौ श्लोकों का स्तोत्र है। इस स्तोत्र में उमा देवी को केवल करुणा से जगत् की रक्षा करने वाली विश्वमाता के रूप में ही नहीं, बल्कि अंतरंग चैतन्यशक्ति, ज्ञान, पवित्रता, रक्षा और मोक्ष प्रदान करने वाली परम दैवी शक्ति के रूप में भी आराधित किया गया है।


इस स्तोत्र में उमा देवी पार्वती, गौरी, चण्डी, कालिका, अम्बिका, रेणुका, गणपति और स्कन्द की माता जैसे अनेक दिव्य रूपों में प्रकट होती हैं। वे कैलास, अरुणाचल, काशी जैसे पुण्यक्षेत्रों में, साधक के हृदय-कमल में, और शरीर के सूक्ष्म आध्यात्मिक केंद्रों में निवास करने वाली पराशक्ति के रूप में पूजित हैं। इस प्रकार यह स्तोत्र भक्ति, मन्त्रशास्त्र, योग, तन्त्र और वेदान्त-दृष्टि को अत्यंत सुंदर ढंग से एक सूत्र में पिरोता है।


उमा शतकम् का मुख्य भाव है — माँ की वह कृपा जो पापों का नाश करती है, अंतःकरण की मलिनताओं को दूर करती है, चंचल मन को स्थिर करती है, और भक्त को संसार-सागर से पार ले जाती है। कवि मनुष्य की दुर्बलताओं — काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार और मन की अस्थिरता — को बार-बार स्वीकार करते हुए, सांसारिक दुःखों की सच्ची औषधि के रूप में देवी के करुणाकटाक्ष की प्रार्थना करते हैं।


यह स्तोत्र उमा देवी के पवित्र चरणों को परम शरण के रूप में महिमामंडित करता है। माँ के चरणों का एक क्षण भी ध्यान करना लौकिक सम्पत्ति, काव्य-कौशल और स्वर्ग-सुखों से भी श्रेष्ठ बताया गया है। सच्चे भक्त के लिए माँ की कृपा ही मार्ग, रक्षा, शुद्धि और परम लक्ष्य बन जाती है।


उमा शतकम् का महत्व उसकी काव्य-सुंदरता और आध्यात्मिक गहराई के दुर्लभ समन्वय में निहित है। यह केवल एक भक्तिपूर्ण प्रार्थना ही नहीं, बल्कि आंतरिक साधना का मार्ग दिखाने वाला स्तोत्र भी है। यह साधक को बाह्य पूजा से अंतर्मुख ध्यान की ओर, भावपूर्ण शरणागति से योगिक जागरण की ओर, और कर्मबंधन से दैवी कृपा द्वारा प्राप्त मुक्ति की ओर ले जाता है।


ऐसा माना जाता है कि उमा शतकम् का भक्तिभाव से पारायण या ध्यान करने से मन पवित्र होता है, विघ्न दूर होते हैं, दुःखों से रक्षा मिलती है, साधना में स्थिरता आती है, भक्ति जागृत होती है और दिव्य माता का करुणाकटाक्ष प्राप्त होता है। सबसे बढ़कर, यह स्तोत्र साधक को उस परममाता उमा देवी के चरणों में पूर्ण शरणागति करने में सहायता करता है, जो दुर्बलता को शक्ति में, चंचलता को ध्यान में, और बंधन को मुक्ति में बदलने में समर्थ हैं।

॥ काव्यकण्ठ वासिष्ठ श्रीगणपतिमुनि विरचितम् उमाशतकम् ॥


सप्तमं दशकम् - मदालसावृत्तम्


जम्भारिमुख्यसुरसम्भाविता बहुलदम्भात्मनामसुलभा पुम्भावदृप्तसनिशुम्भादिबन्धुगणशुम्भासुरेन्द्रदमनी । कुम्भापहासिकुचकुम्भानघोरुजितरम्भाऽनुरक्तहृदया

शम्भाविभेन्द्रमुखडिम्भा करोतु तव शं भामिनीमणिरुमा ।। ६१।।


तारावलीतुलितहारालिशोभिकुचभाराऽलसालसगतिः

धाराधराभकचभारा सुपर्वरिपुवीराभिमानशमनी । नीराटकेतुशरधाराभदृष्टिरतिधीरा धराधरसुता

वाराणसीवसति वाराशितूणरतिराराध्यतामयि सखे ।। ६२।।


ख्याता मुनीन्द्रजनगीता मयूरहयपोताऽतिचित्रचरिता

शीताचलाधिपतिजाता प्रभातयमताताविशेषचरणा ।

पूता पिनाकधरपीताधरा त्रिदिवपातालभूतलजुषां

सा तापजातमविगीताऽखिलं हरतु माता कटाक्षकलया ।। ६३ ।।


खण्डामृतद्युतिशिखण्डा महोग्रतरभण्डादिदैत्यदमनी

चण्डाऽनलाढ्यकुलकुण्डालया विहितदण्डा खलाय भुवने । शुण्डालभूमिपतितुण्डाधिभूततरुषण्डा चलाण्डघटमृत्

पिण्डायिता सकलपिण्डान्तरस्थमणिभाण्डायिताऽस्तु शरणम् ।। ६४ ।।


राकासुधाकरसमाकारहासधुतभीका भवाब्धितरणे

नौका कटाक्षधुतशोका महामहिमपाकारिणाऽपि विनुता ।

एकाम्बिका सकललोकावलेरचलतोकायिताखिलघन

श्रीकानतस्य मम सा कालिका कमलनीकाशदृक् दिशतु शम् ।। ६५।।


नीलालका मधुरशीला विधूतरिपुजाला विलासवसतिः

लोला दृशोः कनकमालावती विबुधलीलावतीपरिवृता ।

कीलालजाप्तमुखहेला जितामृतकरेलातले निवसतां

शालारुचामजिनचेलाऽबला कपटकोलानुजा दिशतु शम् ।। ६६ ।।


अव्यादुदारतरपव्यायुधप्रभृतिहव्याशिकीर्तितगुणा गव्याज्यसम्मिलितकव्याशिलोकनुतभव्याऽतिपावनकथा ।

श्रव्या सदा विविधनव्यावतारवरकव्यारभट्यभिरता दिव्याकृतिस्तरुणरव्याभपादखिलमव्यात्मजा तव कुलम् ।। ६७ ।।


दोषाकरार्भकविभूषा कटाक्षधुतदोषा निरन्तरमन

स्तोषा परा कलुषिकाषायधारियतिवेषाऽनवाप्यचरणा । भाषावधूदयितशेषाहिशायिविनुतैषा विषादशमनी

पोषाय पापततिशोषाय चास्तु कुलयोषा भवस्य भवताम् ।। ६८ ।।


वन्दारुसाधुजनमन्दारवल्लिररविन्दाभदीर्घनयना

कुन्दालिकल्परदबृन्दा पदाब्जनतबृन्दारकेन्दुवदना ।

मन्दा गतावलममन्दा मतौ जितमुकुन्दासुरप्रशमनी

नन्दात्मजा दिशतु शं दारुणाघततिभिन्दाननामनिवहा ।। ६९।।


श्यामा कदम्बवनधामा भवार्तिहरनामा नमज्जनहिता

भीमा रणेषु सुरभामावतंससुमदामानुवासितपदा ।

कामाहितस्य कृतकामा किलालमभिरामा रमालयमुखी

क्षेमाय ते भवतु वामा कदम्बकललामायिता भगवती ।। ७० ।।

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