काव्यकण्ठ वासिष्ठ श्री गणपति मुनि विरचितम्
उमाशतकं
नवमं दशकम् - आर्यावृत्तम्

उमा शतकम् – संक्षिप्त परिचय
उमा शतकम् परमशक्ति स्वरूपिणी, भगवान् शिव की अर्धांगिनी दिव्य माता उमा देवी की स्तुति में काव्यकण्ठ वासिष्ठ श्री गणपति मुनि द्वारा रचित एक गंभीर सौ श्लोकों का स्तोत्र है। इस स्तोत्र में उमा देवी को केवल करुणा से जगत् की रक्षा करने वाली विश्वमाता के रूप में ही नहीं, बल्कि अंतरंग चैतन्यशक्ति, ज्ञान, पवित्रता, रक्षा और मोक्ष प्रदान करने वाली परम दैवी शक्ति के रूप में भी आराधित किया गया है।
इस स्तोत्र में उमा देवी पार्वती, गौरी, चण्डी, कालिका, अम्बिका, रेणुका, गणपति और स्कन्द की माता जैसे अनेक दिव्य रूपों में प्रकट होती हैं। वे कैलास, अरुणाचल, काशी जैसे पुण्यक्षेत्रों में, साधक के हृदय-कमल में, और शरीर के सूक्ष्म आध्यात्मिक केंद्रों में निवास करने वाली पराशक्ति के रूप में पूजित हैं। इस प्रकार यह स्तोत्र भक्ति, मन्त्रशास्त्र, योग, तन्त्र और वेदान्त-दृष्टि को अत्यंत सुंदर ढंग से एक सूत्र में पिरोता है।
उमा शतकम् का मुख्य भाव है — माँ की वह कृपा जो पापों का नाश करती है, अंतःकरण की मलिनताओं को दूर करती है, चंचल मन को स्थिर करती है, और भक्त को संसार-सागर से पार ले जाती है। कवि मनुष्य की दुर्बलताओं — काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार और मन की अस्थिरता — को बार-बार स्वीकार करते हुए, सांसारिक दुःखों की सच्ची औषधि के रूप में देवी के करुणाकटाक्ष की प्रार्थना करते हैं।
यह स्तोत्र उमा देवी के पवित्र चरणों को परम शरण के रूप में महिमामंडित करता है। माँ के चरणों का एक क्षण भी ध्यान करना लौकिक सम्पत्ति, काव्य-कौशल और स्वर्ग-सुखों से भी श्रेष्ठ बताया गया है। सच्चे भक्त के लिए माँ की कृपा ही मार्ग, रक्षा, शुद्धि और परम लक्ष्य बन जाती है।
उमा शतकम् का महत्व उसकी काव्य-सुंदरता और आध्यात्मिक गहराई के दुर्लभ समन्वय में निहित है। यह केवल एक भक्तिपूर्ण प्रार्थना ही नहीं, बल्कि आंतरिक साधना का मार्ग दिखाने वाला स्तोत्र भी है। यह साधक को बाह्य पूजा से अंतर्मुख ध्यान की ओर, भावपूर्ण शरणागति से योगिक जागरण की ओर, और कर्मबंधन से दैवी कृपा द्वारा प्राप्त मुक्ति की ओर ले जाता है।
ऐसा माना जाता है कि उमा शतकम् का भक्तिभाव से पारायण या ध्यान करने से मन पवित्र होता है, विघ्न दूर होते हैं, दुःखों से रक्षा मिलती है, साधना में स्थिरता आती है, भक्ति जागृत होती है और दिव्य माता का करुणाकटाक्ष प्राप्त होता है। सबसे बढ़कर, यह स्तोत्र साधक को उस परममाता उमा देवी के चरणों में पूर्ण शरणागति करने में सहायता करता है, जो दुर्बलता को शक्ति में, चंचलता को ध्यान में, और बंधन को मुक्ति में बदलने में समर्थ हैं।
॥ काव्यकण्ठ वासिष्ठ श्रीगणपतिमुनि विरचितम् उमाशतकम् ॥
नवमं दशकम् - आर्यावृत्तम्
स जयति पुण्यकुलेषु भ्राम्यन् गणनाथमातुरालोकः ।
यमनुचरतो जनार्दनकुलतरुणी देवता च गिराम् ॥८१॥
कस्य प्रबलप्रतिभटभुजकण्डूवारणं महद्वीर्यम् ।
कस्य गिरामिह सर्गो युगस्य परिवर्तनेऽपि पटुः ॥८२॥
कस्य पुनरन्तरात्मनि सङ्गसहस्रैरचालिता निष्ठा ।
धूर्जटिदयिते युष्मद्दृगन्तभृतमन्तरा धन्यम् ॥ ८३॥
यस्य निदानमविद्या ममकारः पूर्वरूपमङ्कुरितः ।
रूपं तापत्रितयं सत्सङ्गः किञ्चिदुपशान्त्यै ।। ८४।।
अन्तःकरणं स्थानं प्रकोपनो विषयपञ्चकाभ्यासः ।
मुक्तिः सुषुप्तिसमये पुनरागमनाय घोराय ।।८५।।
लोभाभिलाषरोषाः कफमारुतमायवस्त्रयो दोषाः ।
अरुचिः पथ्ये भूयस्यनुबन्धोपद्रवो घोरः ।। ८६ ।।
तस्य प्रयच्छ शमनं संसाराख्यज्वरस्य भूरिकृपे ।
मृत्युञ्जयस्य भामिनि भेषजमालोकितं नाम ।। ८७॥
भवदीयस्य भ वानि प्रसिद्धचरिते कटाक्षमेघस्य ।
प्रावृट्परितापहृतो भव्यामृतवर्षिणः करुणा ॥ ८८॥
राजोग्रदृष्टिरुग्रो युवराजः सन्ततं मदोपेतः ।
तव राज्ञि न करुणा चेद्भुवनस्य कथं शुभं भवतु ।। ८९।।
राज्ञि तव दृष्टिरवने विनतानामपि सदैव खेलन्त्याः ।
तपतोऽपि नित्यमीशो लोलो लीलासु ते भवति ।। ९०।।
