“धर्म सबका अधिकार है — श्री गणपति मुनि का वैदिक सामाजिक दर्शन।”
- Jyoti Modekurti

- Nov 13
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किस प्रकार श्री गणपति मुनि के ग्रंथ – पञ्चममीमांसा, साम्राज्य निबन्धनम् और पञ्चजन चर्चा – भारत की धार्मिक एकता को पुनर्स्थापित करती हैं ।

श्री गणपति मुनि का पाँच जनों से उद्घोष : “तुम वेदधर्म से कभी बहिष्कृत नहीं हुए।”
प्रस्तावना
आधुनिक युग में “सामाजिक न्याय” को प्रायः एक पश्चिमी, प्रबोधन-कालीन विचार माना जाता है। किंतु भारत की अपनी पवित्र भूमि में एक ऐसा ऋषि उदित हुआ, जिसने वैदिक दृष्टि से सामाजिक समरसता, समानता और आध्यात्मिक गरिमा की स्थापना की — वे हैं काव्यकण्ठ वासिष्ठ श्री गणपति मुनि।
“समाज सुधारक” शब्द चलन में आने से बहुत पहले ही, श्री मुनि ने वैदिक प्रमाणों के आधार पर समावेश और एकत्व की वह दार्शनिक नींव रखी, जो केवल सामाजिक नहीं, बल्कि शास्त्र-सिद्ध थी। उनके ग्रंथ — पञ्चममीमांसा, साम्राज्य निबन्धनम्, पञ्चजन चर्चा और इन्द्र यज्ञ पर उनके रहस्योद्घाटन — एक ऐसे धर्मदर्शन को प्रस्तुत करते हैं, जो हर मनुष्य को धर्म में सहभागी बनाता है।
पञ्चममीमांसा : अस्पृश्यता के मिथक का शास्त्रीय खण्डन
श्री गणपति मुनि का सबसे प्रखर और प्रमाणयुक्त ग्रंथ “पञ्चममीमांसा” तथाकथित “पंचम वर्ण” — “अस्पृश्य” माने जाने वाले पाँचवें वर्ग की भेदभावपूर्ण अवधारणा का पूर्णतः खण्डन करता है।
मुनि स्पष्ट रूप से कहते हैं —
“तस्मात् पञ्चमोऽपि धर्माधिकारी धर्माधिकारी ।।”
tasmāt pañcamo’pi dharmādhikārī dharmādhikārī ॥
अर्थात् — “इसलिए पाँचवाँ भी धर्म का अधिकारी है — निःसंदेह अधिकारी है।”
यहां ‘धर्माधिकारी’ शब्द का दोहराव मात्र वाक्प्रभाव नहीं, बल्कि शास्त्रीय न्याय है — वैदिक प्रमाण से निष्पन्न निष्कर्ष है।
ऋग्वेद, निरुक्त और मीमांसा के आधार पर मुनि सिद्ध करते हैं कि किसी भी मानव को जन्म के कारण धर्म से वंचित नहीं किया जा सकता।
जैसा कि उन्होंने ग्रंथ के प्रथम अध्याय में कहा है—
“पञ्चमः वर्णो नास्ति”
pañcamaḥ varṇo nāsti
अर्थात् — “पाँचवाँ वर्ण नहीं है।”
ये घोषणाएँ सामाजिक नारे नहीं, बल्कि वैदिक सत्य हैं। श्री मुनि जी इनका प्रतिपादन पंक्ति-दर-पंक्ति करते हुए मनुस्मृति, पुराण और सामाजिक भ्रांतियों की गलत व्याख्याओं का शास्त्रीय खण्डन करते हैं।
साम्राज्य निबन्धनम् : आध्यात्मिक सार्वभौमिकता से राष्ट्रीय एकता
साम्राज्य निबन्धनम् में श्री गणपति मुनि, भारत के लिए एक वैदिक संविधान की रूपरेखा प्रस्तुत करते हैं — एक ऐसा राष्ट्र जो आध्यात्मिक रूप से जागृत, सामाजिक रूप से एकीकृत और सांस्कृतिक रूप से निर्भीक हो।
वे लिखते हैं कि मनुष्य की श्रेष्ठता (श्रेष्ठत्व) वंश से नहीं, बल्कि स्वधर्म और तप से निर्धारित होती है।
“कर्तृत्वानन्वयः” — kartṛtvānanvayaḥ
अर्थात् — "सच्चा उत्तरदायित्व जन्म से नहीं, बल्कि कर्म और चरित्र से निर्धारित होता है।"
इस ग्रंथ में मुनि कहते हैं कि राष्ट्र की सामाजिक और राजनीतिक सार्वभौमिकता केवल तभी टिक सकती है जब उसका आधार वैदिक एकत्व और तप की सार्वभौमिक उपलब्धता पर हो। उनका सुधार आंदोलन बाहरी क्रांति नहीं, बल्कि भीतर से धर्माधारित पुनर्जागरण था।
पञ्चजन चर्चा : वेद का सबके प्रति आलिंगन
पञ्चजन चर्चा में मुनि “आर्य” शब्द की संकीर्ण व्याख्या का खण्डन करते हुए दिखाते हैं कि वेदों में वर्णित पञ्चजन — अर्थात् म्लेच्छ, चाण्डाल, दस्यु और पंचम भी वैदिक दृष्टि में धर्म से कभी वंचित नहीं थे।
वे दृढ़तापूर्वक कहते हैं—
“तस्माद्ब्राह्मणकुलपुत्रैः सर्वैरयं खण्डयितव्यः खण्डयितव्यः ।।” (सूत्र १३, अध्याय १, पञ्चजन चर्चा)
tasmād brāhmaṇa-kula-putraiḥ sarvair ayaṁ khaṇḍayitavyaḥ khaṇḍayitavyaḥ ॥
अर्थात् — “अतः सभी ब्राह्मणकुल के पुत्रों को इस मिथ्या मत का खण्डन करना चाहिए — अवश्य करना चाहिए।”
यह दोहराव “खण्डयितव्यः” मुनि के आह्वान की तीव्रता दर्शाता है।
ऋग्वेद के मन्त्र — 1.100.12, 3.59.8, 1.7.9, 7.15.2 — में उल्लिखित पञ्चजनाः (पाँच जन) सब इन्द्र, मित्र, अग्नि की कृपा के अधीन हैं — कोई भी वैदिक संस्कृति से बहिष्कृत नहीं है।
इन्द्र यज्ञ : राष्ट्र की अन्तःशक्ति का जागरण
शक्ति, एकता और आत्मबल की पुनर्स्थापना के लिए मुनि ने इन्द्र यज्ञ का आह्वान किया। उनके लिए इन्द्र केवल देवता नहीं, बल्कि प्रत्येक मनुष्य की भीतर की स्वराज्य शक्ति हैं — वह योद्धा आत्मा जो जागृत होकर जीवन का धर्म निभाती है।
ऋग्वेद 1.7.9 का उल्लेख करते हुए मुनि कहते हैं—
“इन्द्रः पञ्चक्शितीनाम्”
indraḥ pañcakṣitīnām
अर्थात् — “इन्द्र पाँचों जनों का राजा है।”
इस प्रकार, यज्ञ के माध्यम से समाज से बहिष्कृत वर्ग भी, अपने भीतर निहित इन्द्रत्व को पुनः जागृत कर सकते हैं।
श्री मुनि संघर्ष से नहीं, बल्कि अंतःजागरण के माध्यम से व्यक्तिगत और राष्ट्रीय सशक्तिकरण का मार्ग प्रदर्शित करते हैं।
उपसंहार : वह मुनि जिसे हमें सुनना चाहिए
श्री गणपति मुनि केवल संत या विद्वान नहीं थे; वे भारत के उस मौलिक आध्यात्मिक न्याय-दर्शन के शिल्पकार थे, जो मानवता की एकता को मान्यता देता है — सभी को सत्य, तप और धर्म का अधिकारी मानता है।
जब जाति-विभाजन को औपनिवेशिक शक्तियों ने बढ़ाया और समाज ने उसे आत्मसात कर लिया, तब मुनि की वाणी ऋषि-संहिता की गड़गड़ाहट बनकर गूंजी—
“तस्मात् पञ्चमोऽपि धर्माधिकारी धर्माधिकारी”
उनकी यह आवाज़ हमें केवल उनके ग्रंथ पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि उनके दृष्टिकोण को जीने के लिए पुकारती है।
पञ्चममीमांसा के माध्यम से उन्होंने पंचम वर्ण के मिथक को खंडित किया; साम्राज्य निबंधनम् में उन्होंने वैदिक नैतिकताओं पर आधारित राष्ट्र की दृष्टि प्रस्तुत की; और पञ्चजन चर्चा में उन्होंने यह पुष्टि की कि वेद के सभी “पाँच जन” यज्ञ, आध्यात्मिक साधना और धर्मिक सहभागिता में समान अधिकार रखते थे।
श्री मुनि के पुनरुत्थान के तीन सूत्र
• धर्म सबका अधिकार है — किसी को भी वैदिक धर्म से बाहर नहीं माना जा सकता।
• अधिकार जन्म से नहीं, आचरण से है — उन्होंने सिद्ध किया कि बहिष्करण, द्वेष और स्मृतियों की गलत व्याख्या पर आधारित था, न कि ऋग्वेद के एकत्व-दर्शन पर।
• पुनः सम्मिलन, स्थायी बहिष्कार नहीं — उन्होंने स्पष्ट किया कि कथित “पतनशील” या किसी अन्य धर्म में परिवर्तित व्यक्ति भी सत्यनिष्ठा, अनुशासन और आंतरिक शुद्धि के द्वारा अपना अधिकार पुनः अर्जित कर सकते हैं।
वर्तमान युग में — जहाँ सामाजिक विखंडन, पहचान आधारित राजनीति और वंशानुगत असमानताएँ व्याप्त हैं — उनका संदेश आज भी अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रासंगिक है।
यदि भारत को अपना आध्यात्मिक आत्मसम्मान, सामाजिक सामंजस्य और धार्मिक केन्द्र फिर से प्राप्त करना है, तो यही वैदिक समावेशी दृष्टि उसका मार्ग बनेगी।
श्री गणपति मुनि की यह वैदिक-संग्रह दृष्टि तर्कसंगत, करुणामयी और शास्त्रसम्मत आधार देती है — एक ऐसा आधार जिससे राष्ट्र की आत्मा पुनः एक हो सके।
अन्ततः, श्री कव्यकण्ठ गणपति मुनि हमें केवल ग्रंथ पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि उनके अर्थ को जीवन में उतारने के लिए आमंत्रित करते हैं —
एक ऐसे समाज के लिए,
जहाँ प्रत्येक मनुष्य को यज्ञ की अग्नि में आहुति देने का अधिकार हो,
ऋषियों की वाणी सुनने का अधिकार हो,
और “धर्माधिकारी” कहलाने का अधिकार हो —
जन्म, जाति या परिस्थिति की परवाह किए बिना।
श्री काव्यकण्ठ गणपति मुनि की कृपा भारत और हम सब पर बनी रहे।



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