अम्बिकागीतम्
Hindi/Devanagari

The Hymn Of Universal Mother
अम्बिका गीतम् – परिचय
काव्यकण्ठ वासिष्ठ श्री गणपति मुनि द्वारा रचित मधुर और लयबद्ध स्तोत्र ही अम्बिका गीतम् है। इस सुन्दर गीत में श्री गणपति मुनि ने अम्बिका को परम दैव और विश्वमाता के रूप में व्यक्त किया है। अम्बिका शब्द का अर्थ ही “माता” है। यहाँ वे समस्त जीवों में व्याप्त होकर उनकी रक्षा करने वाली, उनका पोषण करने वाली और उन्हें मार्गदर्शन देने वाली दिव्यमाता के रूप में आराधित हैं।
अम्बिका गीतम् का मुख्य भाव दैवम् — अर्थात् दिव्यता — के अर्थ और सान्निध्य को प्रकट करना है। प्रत्येक श्लोक के माध्यम से मुनि काव्यात्मक रूप में बताते हैं कि दैवम् क्या है, दैवम् कहाँ है, और दैवम् विश्व में किस प्रकार प्रकट होता है। वे दिखाते हैं कि दैव किसी एक स्थान या एक रूप तक सीमित नहीं है; वह सूर्य में, चन्द्रमा में, बिजली में, आकाश में, पृथ्वी में, वायु में, जल में, पर्वतों में, वनों में, ग्रामों में, नगरों में और समस्त जीवों की प्राणशक्ति में विद्यमान है।
सूक्ष्म और प्रेरणादायक ढंग से यह स्तोत्र हमें अपने चारों ओर प्रत्येक वस्तु में दैविक सान्निध्य का दर्शन करने का मार्ग दिखाता है। यह भक्त को अम्बिका को केवल पूजनीय देवी के रूप में ही नहीं, बल्कि समस्त सृष्टि में प्रकाशित होने वाली सजीव दिव्यशक्ति के रूप में देखने के लिए आमंत्रित करता है।
सर्वव्यापक दिव्यमाता का यही दर्शन अम्बिका गीतम् का केंद्रीय संदेश है।
यदि इस प्रयास से आपको प्रेरणा, अंतर्दृष्टि या आध्यात्मिक लाभ मिला हो, तो कृपया काव्यकण्ठ श्री गणपति मुनि की अमूल्य रचनाओं के संरक्षण, प्रकाशन, अनुवाद और व्यापक प्रसार में सहयोग करें। ऐसा करने से उनका प्रकाशमय वैदिक ज्ञान विश्वभर के सच्चे साधकों को निरंतर प्रेरणा और मंगल प्रदान करता रहेगा।
॥ काव्यकण्ठ वासिष्ठ श्रीगणपतिमुनि विरचितम् अम्बिकागीतम् ॥
सेवकपातकशमनं दैवं मानसवाञ्छितफलदं दैवम् ।
सज्जनरक्षणचतुरं दैवं दुर्जनमर्दनपरुषं दैवम् ॥ १॥
भास्करबिम्बे दीप्तं दैवं लोचनमध्ये सुप्तं दैवम् ।
सितकरमण्डलगुप्तं दैवं त्रिगुणितभुवनव्याप्तं दैवम् ॥ २॥
बहुशतचेटीसहितं दैवं रेणुसमष्ट्या विहितं दैवम् ।
अम्बरसौधे निहितं दैवं भैरववदनाऽभिहितं दैवम् ॥ ३ ॥
असुरुचिपद्याभूतं दैवं वसुरुद्रार्कैर्गीतं दैवम् ।
क्षितिजलशुचिषु प्रोतं दैवं शितमतिभिः समधीतं दैवम् ॥ ४ ॥
मृदुहृदयानां सौम्यं दैवं प्रियरूपाणां रम्यं दैवम् ।
तत्त्वज्ञानां विश्वं दैवं गुणविरुचीनां शून्यं दैवम् ॥ ५॥
चालकमवनेः शक्त्या दैवं शम्पाद्वारा दृश्यं दैवम् ।
दोग्ध्रीमनुवरवाच्यं दैवं विदधद्विनतमशोच्यं दैवम् ॥६॥
शैले शैले विहरद्दैवं विपिने विपिने विचरद्दैवम् ।
ग्रामे ग्रामे ख्यातं दैवं नगरे नगरे प्रथितं दैवम् ॥ ७॥
परितो व्योम्नि निराकृति दैवं स्वर्गे पौलोम्याकृति दैवम्
हिमवति गौरीरूपं दैवं तनुषु प्राणाकारं दैवम् ॥ ८ ॥
अर्धं सुरगिरिधनुषो दैवं भुवनत्रितये पूर्णं दैवम् ।
हृदि भूतानां किञ्चिद्दैवं तृणवन्मनसि प्रचुरं दैवम् ।।९।।
लज्जाभावो ललितं दैवं रसनाभावो भीमं दैवम्
दृष्टौ दृष्टौ सूक्ष्मं दैवं विषये विषये स्थूलं दैवम् ॥ १०॥
स्तोत्रे स्तोत्रे मधुरं दैवं ध्याने ध्याने मदकृद्दैवम् ।
नमने नमने वरदं दैवं चरिते चरिते पूतं दैवम् ॥ ११ ॥
आकाशामलगात्रं दैवं तारारविशशिनेत्रं दैवम्
व्यापकपवनश्वसितं दैवं पारावारस्वेदं दैवम् ॥ १२॥
लीलानारीवेषं दैवं दिव्यहिरण्मयभूषं दैवम् ।
केषाञ्चित्कृतपोषं दैवं केषाञ्चित्कृतशोषं दैवम् ॥ १३ ॥
पोषविधाने शीतं दैवं शोषविधाने तपनं दैवम् ।
सर्गविधाने विकस दैवं प्रलयविधाने मीलदैवम् ॥ १४ ॥
सोमं पीत्वा पुष्टं दैवं द्विषतो हत्वा हृष्टं दैवम् ।
भुवनप्रलये शिष्टं दैवं सर्वपदार्थोत्कृष्टं दैवम् ॥१५॥
कौलाचारिषु माद्यद्दैवं समयाचारिषु शान्तं दैवम् ।
योगाचारिषु पीनं दैवं ज्ञानाचारिषु लीनं दैवम् ॥१६॥
कामविरोधि कलत्रं दैवं गणपषडाननपुत्रं दैवम् ।
पापविदारि पवित्रं दैवं जयति मुनिस्तुतिपात्रं दैवम् ॥१७ ॥
॥ इति श्रीभगवन्महर्षिरमणान्तेवासिनो वासिष्ठस्य
नरसिंहसूनोर्गणपतेः कृता ‘अम्बिकागीतम्’ सम्पूर्णम् ॥
