top of page

इन्द्रसहस्रनामस्तोत्रं

Hindi/Devanagari

Hindi/Devanagari

Bhagavan Indra - The Supreme Sovereign Of The Universe

इन्द्र सहस्रनाम स्तोत्रम् – परिचय और महत्त्व


इन्द्र सहस्रनाम स्तोत्रम् काव्यकण्ठ वासिष्ठ श्री गणपति मुनि की अत्यंत विशिष्ट और शक्तिशाली कृतियों में से एक है। यह भगवान् इन्द्र के एक हजार नामों से युक्त 108 श्लोकों का स्तोत्र है। ये सभी नाम सीधे ऋग्वेद से संगृहीत किए गए हैं। बाद के समय में प्रसिद्ध अनेक सहस्रनामों की तरह यह मुख्य रूप से पुराण या आगम परंपरा पर आधारित नहीं है। यह वेदमूलक नामों को भक्तिस्तोत्र के रूप में व्यवस्थित करने वाला एक अपूर्व वैदिक संकलन है।


इस कृति के पीछे का ऐतिहासिक प्रसंग अत्यंत हृदयस्पर्शी है। पांडिचेरी से तिरुवण्णामलै लौटने के बाद श्री गणपति मुनि कुछ समय तक अरुणाचल के समीप रहे। बाहरी परिस्थितियाँ कठिन थीं, फिर भी उन्होंने उस समय का अत्यंत उच्च आध्यात्मिक उपयोग किया। दिसंबर 1928 के अंत तक उन्होंने ऋग्वेद से भगवान् इन्द्र के एक हजार नामों का संग्रह कर लिया था। बाद में जब वे रमणाश्रम में दर्शन के लिए गए, तो उन्होंने यह नाम-सूची भगवान् श्री रमण महर्षि को दिखाई। ऋग्वेद से सीधे संगृहीत इतने प्राचीन और शक्तिशाली वैदिक नामों को देखकर भगवान् ने गहरी रुचि प्रकट की। दिसंबर 1928 के अंतिम दिनों से लेकर 1929 के आरंभिक समय तक, रमणाश्रम के समीप कटहल के उपवन में स्थित एक शांत कुटीर में रहते हुए, श्री गणपति मुनि ने इस इन्द्र सहस्रनाम स्तोत्रम् की रचना 108 श्लोकों में की।


इस कृति की महिमा केवल इसके भक्तिभाव में ही नहीं, बल्कि इसके संकलन की असाधारण कठिनता में भी निहित है। उस समय आज की तरह डिजिटल ग्रंथ, खोज-सुविधाएँ या सहज उपलब्ध मुद्रित वेदसंहिताएँ नहीं थीं। ऐसे समय में श्री गणपति मुनि ने अपने अपार पांडित्य, दिव्य स्मरणशक्ति और मंत्रशक्ति के द्वारा ऋग्वेद जैसी विशाल वैदिक संपदा से इन नामों को संगृहीत किया। ये नाम केवल इन्द्रसूक्तों से ही नहीं लिए गए हैं। पूरे ऋग्वेद में इन्द्र अनेक प्रसंगों में वायु, सोम, मरुतों, अग्नि, ब्रह्मणस्पति, विष्णु आदि देवताओं के साथ भी स्तुत किए गए हैं। इसलिए यह सहस्रनाम संपूर्ण वैदिक प्रकाश से निकाला गया एक गहन सार है; यह केवल सतही नामों की सूची नहीं है।


इसकी एक और विशेषता यह है कि संख्या पूरी करने के लिए मुनि ने किसी भी नाम को दोहराया नहीं। छंद को पूरा करने के लिए उन्होंने अनावश्यक पूरक शब्दों का भी प्रयोग नहीं किया। प्रत्येक नाम का अपना उद्देश्य है। प्रत्येक श्लोक अर्थपूर्ण है। यह स्तोत्र केवल नामों की सूची नहीं है; प्रत्येक श्लोक वैदिक ऋषियों द्वारा देखे गए इन्द्र के जीवंत दर्शन का एक प्रमाण जैसा है। इसके लिए वेद पर पूर्ण अधिकार, संस्कृत भाषा पर असाधारण पकड़, छंद का ज्ञान, मंत्रशास्त्र की समझ, काव्य-रचना की क्षमता और गहरी आंतरिक एकाग्रता आवश्यक थी।


इस सहस्रनाम में प्रकट होने वाले इन्द्र केवल वर्षा और गर्जन से संबंधित देवता नहीं हैं; वे केवल पुराणों में वर्णित देवलोक के राजा भी नहीं हैं। वैदिक दृष्टि में वे दिव्यशक्ति, प्रकाशित बुद्धि, वीरसंकल्प, रक्षा, विस्तार, विजय, यज्ञ, ज्योति, शक्ति और ऋतमय विश्वव्यवस्था के अधिपति हैं। ये नाम इन्द्र को विश्व में, यज्ञ में, देवताओं में और साधक के आंतरिक जागरण में कार्य करने वाले एक महान् आध्यात्मिक तत्त्व के रूप में प्रकट करते हैं।


इसलिए इन्द्र सहस्रनाम स्तोत्रम् का महत्त्व अत्यंत विशाल है। यह इन्द्र की मूल वैदिक महिमा को पुनः प्रतिष्ठित करता है। यह भक्त को फिर से मंत्रस्वरूप वेदमूल की ओर ले जाता है। यह हमें स्मरण कराता है कि वैदिक देवता परस्पर अलग-अलग स्पर्धा करने वाली शक्तियाँ नहीं हैं; वे एक ही परमसत्य की प्रकाशमयी भिन्न-भिन्न अभिव्यक्तियाँ हैं। इस स्तोत्र के माध्यम से इन्द्र दिव्यशक्ति के महान् वैदिक स्वरूपों में से एक रूप में फिर से दर्शन देते हैं।


श्री गणपति मुनि स्वयं घोषित करते हैं कि यह सहस्रनाम वेदमंत्रों से संगृहीत सार है। इसलिए इसका भक्तिभाव से पारायण करना केवल सामान्य स्तोत्र-पाठ नहीं है; यह ऋग्वेद की जीवंत मंत्रशक्ति का आवाहन करने का मार्ग है। इस पारायण से आंतरिक बल, बुद्धि की स्पष्टता, रक्षा, वीरसंकल्प, चेतना का विस्तार और आध्यात्मिक विजय प्राप्त होती है। मुनि कहते हैं कि जो भक्तिभाव से इस ऐन्द्र सहस्रनाम की आराधना करता है, उसके वश में सिद्धियाँ होती हैं। इस दृष्टि से इन्द्र सहस्रनाम स्तोत्रम् केवल भक्तिपूर्ण स्तोत्र ही नहीं, बल्कि एक शक्तिशाली वैदिक साधना भी है।


इस प्रकार यह कृति प्राचीन ऋषियों और आधुनिक साधकों को जोड़ने वाला एक पवित्र सेतु है। यह मंत्र, तपस्, पांडित्य, काव्यप्रतिभा, दिव्य स्मरणशक्ति और वैदिक प्रकाश से संयुक्त एक अमूल्य निधि है। काव्यकण्ठ वासिष्ठ श्री गणपति मुनि की असाधारण आध्यात्मिक शक्ति के कारण ही ऐसी महान् कृति संभव हो सकी।


॥ काव्यकण्ठ वासिष्ठ श्री गणपति मुनि विरचितम् इन्द्रसहस्रनामस्तोत्रम् ॥


इन्द्रो देवतमोऽनीलः सुपर्णः पूर्णबन्धुरः ।

विश्वस्य दमिता विश्वस्येशानो विश्वचर्षणिः ॥ १ ॥


विश्वानि चक्रिर्विश्वस्मादुत्तरो विश्वभूर्बृहन् ।

चेकितानो वर्तमानः स्वधयाऽचक्रया परः ॥ २ ॥


विश्वानरो विश्वरूपो विश्वायुर्विश्वतस्पृथुः ।

विश्वकर्मा विश्वदेवो विश्वतोधीरनिष्कृतः ॥ ३ ॥


त्रिषुजातस्तिग्मशृङ्गो देवो ब्रध्नोऽरुषश्चरन् ।

रुचानः परमो विद्वानरुचो रोचयन्नजः ॥ ४ ॥


ज्येष्ठो जनानां वृषभो ज्योतिर्ज्येष्ठं सहोमहि ।

अभिक्रतूनां दमिता धर्ता विश्वस्य कर्मणः ॥ ५ ॥


धर्ता धनानां धातॄणां धाता धीरो धियेषितः ।

यज्ञस्य साधनो यज्ञो यज्ञवाहा अपामजः ॥ ६ ॥


यज्ञं जुषाणो यजतो युक्तग्राव्णोऽवितेषिरः ।

सुवज्रश्च्यवनो योद्धा यशसो यज्ञियो यहुः ॥ ७ ॥


अवयाता दुर्मतीनां हन्ता पापस्य रक्षसः ।

कृशस्य चोदिता कृत्नुः कृतब्रह्मा धृतव्रतः ॥ ८ ॥


घृष्ण्वोजा अविताधीनां धनानां सञ्जिदच्युतः ।

विहन्ता तमसस्त्वष्टा तनूपास्तरुतातुरः ॥ ९ ॥


त्वेषनृम्णस्त्वेषसंदृक् तुराषाडपराजितः ।

तुग्य्रावृधोदस्मतमस्तुविकूर्मितमस्तुजः ॥ १० ॥


वृषप्रभर्मा विश्वानि विद्वानादर्दिरस्तवाः ।

मन्द्रो मतीनां वृषभो मरुत्वान्मरुतामृषिः ॥ ११ ॥


महाहस्ती गणपतिर्धियं जिन्वो बृहस्पतिः ।

माहिनो मघवा मन्दी मर्कोऽर्को मेधिरो महान् ॥ १२ ॥


प्रतिरूपः परोमात्रः पुरुरूपः पुरुष्टुतः ।

पुरुहूतः पुरःस्थाता पुरुमायः पुरन्दरः ॥ १३ ॥


पुरुप्रशस्तः पुरुकृत् पुरां दर्ता पुरूतमः ।

पुरुगूर्तः पृत्सुजेता पुरुवर्पाः प्रवेपनी ॥ १४ ॥


पप्रिः प्रचेताः परिभूः पनीयानप्रतिष्कुतः ।

प्रवृद्धः प्रवयाः पाता पूषण्वानन्तराभरः ॥ १५ ॥


पुरुशाकः पाञ्चजन्यः पुरुभोजाः पुरूवसुः ।

पिशङ्गरातिः पपुरिः पुरोयोधः पृथुज्रया ॥ १६ ॥


प्ररिक्वः प्रदिवः पूर्व्यः पुरोभूः पूर्वजा ऋषिः ।

प्रणेता प्रमतिः पन्यः पूर्वयावा प्रभूवसुः ॥ १७ ॥


प्रयज्युः पावकः पूषा पदवीः पथिकृत्पतिः ।

पुरुत्मा पलितोहेता प्रहेता प्राविता पिता ॥ १८ ॥


पुरुनृम्णः पर्वतेष्ठाः प्राचामन्युः पुरोहितः ।

पुरांभिन्दुरनाधृष्यः पुराजाः प्रपथिंतमः ॥ १९ ॥


पृतनाषाड् बाहुशर्धी बृहद्रेणुरनिष्टृतः ।

अभिभूतिरयोपाष्टिः बृहद्रेरपिधानवान् ॥ २० ॥


ब्रह्मप्रियो ब्रह्मजूतो ब्रह्मवाहा अरङ्गमः ।

बोधिन्मना अवक्रक्षि बृहद्भानुरमित्रहा ॥ २१ ॥


भूरिकर्मा भरेकृत्नुर्भद्रकृद् भार्वरोभृमिः ।

भरेषु हव्यो भूर्योजाः पुरोहा प्राशुषाट् प्रषाट् ॥ २२ ॥


प्रभङ्गी महिषो भीमो भूर्यासुतिरशस्तिहा ।

प्रसक्षि विश्पतिर्वीरः परस्पाः शवस्सस्पतिः ॥ २३ ॥


पुरुदत्रः पितृतमः पुरुक्षुर्भूरिगुः पणिः ।

प्रत्वाक्षाणः पुरां दर्मापनस्युरभिमातिहा ॥ २४ ॥


पृथिव्या वृषभः प्रत्नः प्रमन्दी प्रथमः पृथुः ।

त्यः समुद्रव्यचाः पायुः प्रकेतश्चर्षणीसहः ॥ २५ ॥


कारुधायाः कविवृधः कनीनः क्रतुमान्क्रतुः ।

क्षपांवस्ता कवितमो गिर्वाहाः कीरिचोदनः ॥ २६ ॥


क्षपावान्कौशिकः कारी राजा क्षम्यस्य गोपतिः ।

गौर्गोर्दुरो दुरोऽश्वस्य यवस्यदुर आदुरिः ॥ २७ ॥


चन्द्रबुध्नश्चर्षणिप्राश्चर्कृत्यश्चोदयन्मतिः।

चित्रभानुश्चित्रतमश्चम्रीषश्चचक्रमासजः ॥ २८ ॥


तुविशुष्मस्तुविद्युम्नस्तुविजातस्तुवीमघः ।

तुविकूर्मिस्तुविम्रक्षस्तुविशग्मस्तुविप्रतिः ॥ २९ ॥


तुविनृम्णस्तुविग्रीवस्तुविराधास्तुविक्रतुः ।

तुविमात्रस्तुविग्राभस्तुविदेष्णस्तुविष्वणिः ॥ ३० ॥


तूतुजित् स्तवसस्तक्वस्तुविग्रस्तुर्वणिस्त्रदः ।

रथेष्ठस्तरणिस्तुम्रस्त्विषीमाननपच्युतः ॥ ३१ ॥


तोदस्तरुत्रस्तविषी मुषाणस्तविषस्तुरा ।

तितिर्वा ततुरिस्त्राता भूर्णिस्तूर्णिस्तवस्तरः ॥ ३२ ॥


यज्ञवृद्धो यज्ञियानां प्रथमो यज्वनो वृधः ।

अमित्रखादोऽनिमिषो विषुणोऽसुन्वन्तोऽजुरः ॥ ३३ ॥


अक्षितोतिरदाभ्योऽर्यः शिप्रिणीवानगोरुधः ।

आश्रुत्कर्णोऽन्तरिक्षप्रा अमितौजा अरिष्टुतः ॥ ३४ ॥


अदृष्ट एकराडूर्ध्व ऊर्ध्वसानः सनाद्युवा ।

स्थिरः सूर्यः स्वभूत्योजाः सत्यराधाः सनश्रुतः ॥ ३५ ॥


अकल्पः सत्त्वानां केतुरच्युतच्युदुरुव्यचाः ।

शवसी स्वपतिः स्वोजाः शचीवानविदीधयुः ॥ ३६ ॥


सत्यशुष्मः सत्यसत्वा सूनुः सत्यस्य सोमपाः ।

दस्योर्हन्ता दिवो धर्ता राजा दिव्यस्य चेतनः ॥ ३७ ॥


ऋग्मियोऽर्वा रोचमानो रभोदा ऋतपा ऋतः ।

ऋजीषी रणकृद्रेवानृत्वियो रध्रचोदनः ॥ ३८ ॥


ऋष्वोरायोऽवनीराजा रयिस्थानो रदावसुः ।

ऋभुक्षा अनिमानोऽश्वः सहमानः समुद्रियः ॥ ३९ ॥


ऋणकातिर्गिर्वणस्युः कीजः खिद्वाखजङ्करः ।

ऋजीषो वसुविद्वेन्यो वाजेषु दधृषः कविः ॥ ४० ॥


विरप्शी वीलितो विप्रो विश्ववेदा ऋतावृधः ।

ऋतयुग्धर्मकृद्धेनुर्धनजिद्धामवर्मवाट् ॥ ४१ ॥


ऋतेजाः सक्षणिः सोम्यः संसृष्टिजिदृभुष्ठिरः ।

ऋतयुः सबलः सह्युर्वज्रवाहा ऋचीषमः ॥ ४२ ॥


ऋग्मीदधृष्वानृष्वौजाः सुगोपाः स्वयशस्तरः ।

स्वभिष्टिसुम्नः सेहानः सुनीतिः सुकृतः शुचिः ॥ ४३ ॥


ऋणयाः सहसः सूनुः सुदानुः सगणो वसुः ।

स्तोम्यः समद्वा सत्राहा स्तोमवाहा ऋतीषहः ॥ ४४ ॥


शविष्ठः शवसस्पुत्रः शतमन्युः शतक्रतुः ।

शक्रः शिक्षानरः शुष्मी श्रुत्कर्णः श्रवयत्सखा ॥ ४५ ॥


शतमूतिः शर्धनीतिः शतनीथः शतामघः ।

श्लोकी शिवतमः श्रुत्यं नामबिभ्रदनानतः ॥ ४६ ॥


शूरः शिप्री सहस्रोतिः शुभ्रः शृङ्गवृषोनपात् ।

शासः शाकी श्रवस्कामः शवसावानहंसनः ॥ ४७ ॥


सुरूपकृत्नुरीशानः शूशुवानः शचीपतिः ।

सतीनसत्वा सनिता शक्तीवानमितक्रतुः ॥ ४८ ॥


सहस्रचेताः सुमनाः श्रुत्यः शुद्धः श्रुतामघः ।

सत्रादावा सोमपावा सुक्रतुः श्मश्रुषु श्रितः ॥ ४९ ॥


चोदप्रवृद्धो विश्वस्य जगतः प्राणतस्पतिः ।

च्यौत्नः सुप्रकरत्नोनरश्चकमानः सदावृधः । ॥ ५० ॥


स्वभिष्टिः सत्पतिः सत्यश्चारुर्वीरतमश्चती ।

चित्रश्चिकित्वानाज्ञाता प्रतिमानं सतः सतः ॥ ५१ ॥


स्थाताः सचेताः सदिवः सुदंसाः सुश्रवस्तमः ।

सहोदाः सुश्रुतः सम्राट् सुपारः सुन्वतः सखा ॥ ५२ ॥


ब्रह्मवाहस्तमो ब्रह्मा विष्णुर्वस्वःपतिर्हरिः ।

रणाय संस्कृतो रुद्रो रणितेशानकृच्छिवः ॥ ५३ ॥


विप्रजूतो विप्रतमो यह्वो वज्री हिरण्ययः ।

वव्रो वीरतरो वायुर्मातरिश्वा मरुत्सखा ॥ ५४ ॥


गूर्तश्रवा विश्वगूर्तो वन्दनश्रुद्विचक्षणः ।

वृष्णिर्वसुपतिर्वाजी वृषभो वाजिनी वसुः ॥ ५५ ॥


विग्रो विभीषणो वह्निर्वृद्धायुर्विश्रुतो वृषा ।

व्रजभृद्वृत्रहा वृद्धो विश्ववारो वृतञ्चयः ॥ ५६ ॥


वृषजूतिर्वृषरथो वृषभान्नो वृषक्रतुः ।

वृषकर्मा वृषमणाः सुदक्षः सुन्वतो वृधः ॥ ५७ ॥


अद्रोघवागसुरहा वेधाः सत्राकरोऽजरः ।

अपारः सुहवोऽभीरुरभिभङ्गोऽङ्गिरस्तमः ॥ ५८ ॥


अमर्त्यः स्वायुधोऽशत्रुरप्रतीतोऽभिमातिषाट् ।

अमत्री सूनुरर्चत्र्यः समद्दिष्टिरभयङ्करः ॥ ५९ ॥


अभिनेता स्पार्हराधाः सप्तरश्मिरभिष्टिकृत् ।

अनर्वा स्वर्जिदिष्कर्ता स्तोतॄणामवितोपरः ॥ ६० ॥


अजातशत्रुः सेनानी रुभयाव्युभयङ्करः ।

उरुगायः सत्ययोनिः सहस्वानुर्वरापतिः ॥ ६१ ॥


उग्रो गोपा उग्रबाहुरुग्रधन्वोक्थवर्धनः ।

गाथश्रवा गिरां राजा गम्भीरो गिर्वणस्तमः ॥ ६२ ॥


वज्रहस्तश्चर्षणीनां वृषभो वज्रदक्षिणः ।

सोमकामः सोमपतिः सोमवृद्धः सुदक्षिणः ॥ ६३ ॥


सुब्रह्मा स्थविरः सूरः सहिष्ठः सप्रथाः सराट् ।

हरिश्मशारुर्हरिवान्हरीणां पतिरस्तृतः ॥ ६४ ॥


हिरण्यबाहुरुर्व्यूतिर्हरिकेशो हिरीमशः ।

हरिशिप्रो हर्यमाणो हरिजातो हरिम्भरः ॥ ६५ ॥


हिरण्यवर्णो हर्यश्वो हरिवर्पा हरिप्रियः ।

हनिष्ठो हर्यतो हव्यो हरिष्ठा हरियोजनः ॥ ६६ ॥


सत्वा सुशिप्रः सुक्षत्रः सुवीरः सुतपा ऋषिः ।

गाथान्यो गोत्रभिद्ग्रामं वहमानो गवेषणः ॥ ६७ ॥


जिष्णुस्तस्थुष ईशान ईशानो जगतो नृतुः ।

नर्याणि विद्वान्नृपतिः नेता नृम्णस्य तूतुजिः ॥ ६८ ॥


निमेघमानो नर्यापाः सिन्धूनां पतिरुत्तरः ।

नर्यो नियुत्वान्निचितो नक्षद्दाभो नहुष्टरः ॥ ६९ ॥


नव्यो निधाता नृमणाः सध्रीचीनः सुतेरणः ।

नृतमानो नदनुमान्नवीयान्नृतमो नृजित् ॥ ७० ॥


विचयिष्ठो वज्रबाहुर्वृत्रखादो वलं रुजः ।

जातूभर्मा ज्येष्ठतमो जनभक्षो जनंसहः ॥ ७१ ॥


विश्वाषाड्वंसगो वस्यान्निष्पाडशनिमान्नृषाट् ।

पूर्भित्पुराषाडभिषाट् जगतस्तस्थुषस्पतिः ॥ ७२ ॥


संवृक् समत्सु सन्धाता सुसंदृक् सविताऽरुणः ।

स्वर्यः स्वरोचिः सुत्रामा स्तुषेय्यः सनजाः स्वरिः ॥ ७३ ॥


कृण्वन्नकेतवे केतुं पेशः कृण्वन्नपेशसे ।

वज्रेण हत्वी महिनो मरुत्स्तोत्रो मरुद्गणः ॥ ७४ ॥


महावीरो महाव्रातो महाय्यः प्रमतिर्मही ।

माता मघोनां मंहिष्ठो मन्युमीर्मन्युमत्तमः ॥ ७५ ॥


मेषो महीवृन्मन्मदानो माहिनावान्महेमतिः ।

म्रक्षो मृळीको मंहिष्ठो म्रक्षकृत्वा महामहः ॥ ७६ ॥


मदच्युन्मर्डितामद्वा मदानां पतिरातपः ।

सुशस्तिः स्वस्तिदाः स्वर्दृग्राधानामाकरः पतिः ॥ ७७ ॥


इषुहस्त इषां दाता वसुदाता विदद्वसुः ।

विभूतिर्व्यानाशिर्वेनो वरीयान् विश्वजिद्विभुः ॥ ७८ ॥


नृचक्षाः सहुरिः स्वर्वित्सुयज्ञः सुष्ठुतः स्वयुः ।

आपिः पृथिव्या जनिता सूर्यस्य जनिता श्रुतः ॥ ७९ ॥


स्पड्विहायाः स्मत्पुरन्धिर्वृषपर्वा वृषन्तमः ।

साधारणः सुखरथः स्वश्वः सत्राजिदद्भुतः ॥ ८० ॥


ज्येष्ठराजो जीरदानुर्जग्मिर्वित्वक्षणो वशी ।

विधाता विश्वमा आशुर्मायी वृद्धमहावृधः ॥ ८१ ॥


वरेण्यो विश्वतूर्वातस्येशानो द्यौर्विचर्षणिः ।

सतीनमन्युर्गोदत्रः सद्योजातो विभञ्जनुः ॥ ८२ ॥


वितन्तसाय्यो वाजानां विभक्ता वस्व आकरः ।

वीरको वीरयुर्वज्रं बभ्रिर्वीरेण्य आघृणिः ॥ ८३ ॥


वाजिनेयो वाजसनिर्वाजानांपतिराजिकृत् ।

वास्तोष्पतिर्वर्पणीतिर्विशां राजा वपोदरः ॥ ८४ ॥


विभूतद्युम्न आचक्रिरादारी दोधतो वधः ।

आखण्डलो दस्मवर्चाः सर्वसेनो विमोचनः ॥ ८५ ॥


वज्रस्य भर्ता वार्याणां पतिर्गोजिद्गवां पतिः ।

विश्वव्यचाः सञ्चकानः सुहार्दो जनिता दिवः ॥ ८६ ॥


समन्तुनामा पुरुध प्रतिको बृहतः पतिः ।

दीध्यानो दामनो दाता दीर्घश्रवस ऋभ्वसः ॥ ८७ ॥


दंसनावान्दिवः संम्राड्देवजूतो दिवावसुः ।

दशमो देवता दक्षो दुध्रोद्युम्नी द्युमन्तमः ॥ ८८ ॥


मंहिष्ठरातिरित्थाधीर्दीद्यानो दधृषिर्दुधिः ।

दुष्टरीतुर्दुश्च्यवनो दिवोमानो दिवोवृषा ॥ ८९ ॥


दक्षाय्यो दस्युहाधृष्णुः दक्षिणावान् धियावसुः ।

धनस्पृद्धृषितो धाता दयमानो धनञ्जयः ॥ ९० ॥


दिव्यो द्विबर्हाः सन्नार्यः समर्यस्त्राः सिमः सखा ।

द्युक्षः समानो दंसिष्ठो राधसः पतिरध्रिगुः ॥ ९१ ॥


सम्राट् पृथिव्या ओजस्वान्वयोधा ऋतुपा ऋभुः ।

एको राजैधमानद्विडेकवीर उरुज्रयाः ॥ ९२ ॥


लोककृज्जनिताऽश्वानां जोहूत्रो जनिता गवाम् ।

जरिता जनुषां राजा गिर्वणाः सुन्वतोऽविता ॥ ९३ ॥


अत्कं वसानः कृष्टीनां राजोक्थ्यः शिप्रवानुरुः ।

ईड्योदाश्वानिनतमो घोरः सङ्क्रन्दनः स्ववान् ॥ ९४ ॥


जागृविर्जगतो राजा गृत्सो गोविद् घनाघनः ।

जेताऽभिभूरकूपारो दानवानसुरोर्णऽवः ॥ ९५ ॥


घृष्विर्दमूनास्तवसस्तवीयानन्तमोऽवृतः ।

रायोदाता रयिपतिः विपश्चिद्वृत्रहन्तमः ॥ ९६ ॥


अपरीतः षालपश्चाद् दध्वायुत्कार आरितः ।

वोह्लावनिष्ठो वृष्ण्यावान्वृषण्वान्वृकोऽवतः ॥ ९७ ॥


गर्भोऽसमष्टकाव्यो युजाहिशुष्मो दधृष्वणिः ।

प्रत्नः पतिर्वाजदावा ज्योतिष्कर्ता गिरां पतिः ॥ ९८ ॥


अनवद्यः सम्भृताश्वो वज्रिवादद्रिवान्द्युमान् ।

दस्मो यजत्रो योधीयानकवारिर्यतङ्करः ॥ ९९ ॥


पृदाकुसानुरोजीयान् ब्रह्मणश्चोदिताः यमः ।

वन्दनेष्ठाः पुरां भेत्ता बन्धुरेष्ठा बृहद्दिवः ॥ १०० ॥


वरूता मधुनो राजा प्रणेनीः पप्रथी युवा ।

उरुशंसो हवंश्रोता भूरिदावा बृहच्छ्रवाः ॥ १०१ ॥


माता स्तियानां वृषभो महोदाता महावधः ।

सुग्म्यः सुराधाः सत्राषाडोदतीनां नदोधुनिः ॥ १०२ ॥


अकामकर्शनः स्वर्षाः सुमृळीकः सहस्कृतः ।

पास्त्यस्य होता सिन्धूनां वृषाभोजो रथीतमः ॥ १०३ ॥


सखा मुनीनां जनिदाः स्वधावानसमोऽप्रतिः ।

मनस्वानध्वरो मर्यो बृबदुक्थोऽविता भगः ॥ १०४ ॥


अषाळ्होऽरीळ्ह आदर्ता वीरं कर्तां विशस्पतिः ।

एकः पतिरिनः पुष्टिः सुवीर्यो हरिपाः सुदृक् ॥ १०५ ॥


एको हव्यः सनादारुगोको वाकस्य वक्षणिः ।

सुवृक्तिरमृतोऽमृक्तः खजकृद् बलदाः शुनः ॥ १०६ ॥


अमत्रो मित्र आकाय्यः सुदामाब्जिन् महोमही ।

रथः सुबाहुरुशना सुनीथो भूरिदाः सुदाः ॥ १०७ ॥


मदस्य राजा सोमस्य पीत्वीज्यायान्दिवः पतिः ।

तविषीवान्घनो युध्मो हवनश्रुत्सहः स्वराट् ॥ १०८ ॥


॥ अत्रेमे भवन्त्युपसंहारश्लोकाः ॥

इदं सहस्रमिन्द्रस्य नाम्नां परमपावनम् ।

ऋग्वेदतो गणपतिः सङ्गृह्य विनिबद्धवान् ॥


नात्र नाम्नः पौनरुक्त्यं न च कारादि पूरणम् ।

श्लोकमध्ये न चारम्या शतकस्योपसंहृतिः ॥


नाम्नामेषां छान्दसत्वात्सर्वेषां च स्वरूपतः ।

अवलोक्या यथा छन्दः शब्दशुद्धिर्विचक्षणैः ॥


अनेकपदनामानि विनियोज्यानि पूजने ।

चतुर्थ्यन्तप्रयोगेषु व्युत्क्रमाच्च यथान्वयम् ॥


अस्य नामसहस्रस्य वेदमूलस्य सेवने ।

पूर्णं फलं तद्विज्ञेयं यत्स्वाध्यायनिषेवणे ॥


मन्त्रेभ्यः सम्भृतं सारमेतन्नामसहस्रकम् ।

ऐन्द्रं यो भजते भक्त्या तस्य स्युः सिद्धयो वशे ॥


इन्द्रो विजयते देवः सर्वस्य जगतः पतिः ।

वेदमूलं जयत्येतत्तस्य नामसहस्रकम् ॥


॥ इति श्रीभगवन्महर्षिरमणान्तेवासिनो वासिष्ठस्य

नरसिंहसूनोर्गणपतेः कृतिः इन्द्रसहस्रनामस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

bottom of page