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मंगल गौरी स्तोत्रम्

Hindi/Devanagari

Hindi/Devanagari

Goddess Gauri and the all-pervading supreme Shakti who sustains, protects, and blesses the universe

मंगल गौरी स्तोत्रम् – संक्षिप्त परिचय

मंगल गौरी स्तोत्रम् दिव्य माता गौरीदेवी की स्तुति में काव्यकण्ठ वासिष्ठ श्री गणपति मुनि द्वारा रचित एक सुंदर और भक्तिपूर्ण स्तोत्र है। इन आठ श्लोकों में देवी की आराधना पर्वतराज की पुत्री, समस्त जगत पर करुणा बरसाने वाली विश्वमाता और संपूर्ण ब्रह्मांड में व्याप्त परम दिव्यशक्ति के रूप में की गई है।


इस स्तोत्र में गौरीदेवी को केवल भगवान शिव की अर्धांगिनी के रूप में ही नहीं, बल्कि समस्त प्राणियों के अंतर में स्थित चैतन्यस्वरूपिणी तथा ग्रहों की गति, वायु, आकाश, सूर्य और सृष्टि की सभी तेजोमय शक्तियों के मूल में विद्यमान विश्वशक्ति के रूप में दर्शाया गया है। उनकी दिव्य शक्ति प्रतिकूल शक्तियों को वश में करती है, लोकों की रक्षा करती है और उनकी इच्छा को पूर्ण करने वाली महान दैवी शक्तियों के माध्यम से अपना कार्य संपन्न करती है।


देवी की स्तुति नित्य पवित्र, नित्ययौवना, अनुपम सौंदर्यस्वरूपिणी और सभी सीमाओं से परे परमदेवी के रूप में की गई है। अंतिम श्लोक में उन्हें शंकर की प्रिय ललितास्वरूपिणी और तीनों लोकों को पवित्र करने वाली दिव्य माता के रूप में वंदित किया गया है।


वैदिक सनातन परंपरा में किसी भी शुभकार्य के समापन पर स्त्रियों द्वारा पारंपरिक आरती गीत या मंगलगीत गाते हुए मंगल आरती उतारकर उपस्थित लोगों को आशीर्वाद देने की पवित्र परंपरा रही है। ऐसे पावन और मंगलमय अवसरों पर महिलाओं के लिए सीखने और गाने हेतु मंगल गौरी स्तोत्रम् विशेष रूप से उपयुक्त है, क्योंकि इसका प्रत्येक श्लोक माता गौरी की करुणामयी, रक्षक और मंगलकारी कृपा तथा आशीर्वाद से प्रकाशित है।


इस प्रकार मंगल गौरी स्तोत्रम् मंगलस्वरूपिणी गौरीदेवी और समस्त विश्व का पालन, संरक्षण और कल्याण करने वाली सर्वव्यापी पराशक्ति की स्तुति करने वाला एक शक्तिशाली और मधुर भक्तिगीत है।


।। काव्यकण्ठ वासिष्ठ श्री गणपति मुनि विरचितम् मङ्गलगौरीस्तोत्रम् ।।


जय गौरि जय गौरि जय पर्वततनये ।

स्थिरहस्तस्थितविजये करुणामयहृदये । ।।१।।

जय गौरि जय गौरि…


धृतसर्वग्रहगमनं शुद्धाजरपवनम् ।

सति तव लीलाभवनं सर्वेश्वरि गगनम्। ।। २।।

जय गौरि जय गौरि…


मण्डलमर्कस्य घनं सिंहासनमवनम् ।

नरततिलोचनमदनं तेजस्तव शयनम् । ।।३।।

जय गौरि जय गौरि…


तव शब्देन विभाता ब्रह्मद्युतिभीता ।

असुरप्रमुखविनीता रिपुसेनाधूता । ।। ४ ।।

जय गौरि जय गौरि…


दक्षिणहस्तो दाता वामस्तव नेता ।

तव कार्ये स विधाता जगतामसि माता । ।। ५ ।।

जय गौरि जय गौरि…


असि संविद्गतदोषा सर्वान्तरभूषा ।

अनुपमतरुणीवेषा भवसीश्वरयोषा । ।। ६ ।।

जय गौरि जय गौरि…


एकस्तव बलशाली सुत इन्द्रो जाली ।

अपरस्सितकरमाली शुचिरितरः कीली। ॥७॥

जय गौरि जय गौरि…


चन्द्रार्कस्तनमुदिता शङ्करदयिता ललिता ।

गणपतिमुनिसङ्गीता त्रिभुवनपावनमाता । ।। ८ ।।


जय गौरि जय गौरि जय पर्वततनये ।

स्थिरहस्तस्थितविजये करुणामयहृदये ।


।। इति श्रीभगवन्महर्षिरमणान्तेवासिनो वासिष्ठस्य

नरसिंहसूनोर्गणपतेः कृतिः मङ्गलगौरीस्तोत्रं समाप्तम् ।।

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