रेणुकागीतम्
Hindi/Devanagari

Mother Renuka Of Kundalipura
रेणुका गीतम् – परिचय
रेणुका गीतम् काव्यकण्ठ वासिष्ठ श्री गणपति मुनि द्वारा पड़ैवीडु क्षेत्र की अधिष्ठात्री देवी श्री रेणुका माता की स्तुति में रचित एक अत्यन्त शक्तिशाली संस्कृत स्तोत्र है। पड़ैवीडु क्षेत्र परम्परागत रूप से कुण्डलीपुरम् नाम से भी प्रसिद्ध है। इस गीत में गहन भक्ति, पूर्ण शरणागति, गहरी आध्यात्मिक दृष्टि तथा दिव्य माता की रक्षा और कृपा की याचना करता हुआ एक भक्त-पुत्र का आत्मीय निवेदन अत्यन्त हृदयस्पर्शी रूप में व्यक्त हुआ है।
इस गीत की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि इसकी महिमा को और भी विशिष्ट बनाती है। सन् 1908 में कुछ लोगों ने श्री गणपति मुनि पर झूठे आरोप लगाकर ब्रिटिश शासन के अधिकारियों के मन में संदेह उत्पन्न कर दिया। उन्हें गुप्त रूप से जाँचने और पर्याप्त प्रमाण मिलने पर गिरफ्तार करने के उद्देश्य से गुप्तचर पुलिस अधिकारियों को भेजा गया। उस समय श्री गणपति मुनि पड़ैवीडु स्थित पवित्र रेणुका माता मंदिर में निवास कर रहे थे।
अपनी अन्तर्दृष्टि से गणपति मुनि ने वेश बदलकर मंदिर की ओर आ रहे अधिकारियों के आगमन को पहले ही जान लिया। वे तुरंत मंदिर-प्रांगण में गए और रेणुका माता के छोटे गर्भगृह की प्रदक्षिणा करने लगे। प्रदक्षिणा करते हुए उन्होंने अपने हृदय की समस्त भावनाएँ माता को समर्पित कीं और उनकी रक्षा की प्रार्थना करते हुए संस्कृत श्लोकों का आशु-गान किया। इस प्रकार तीव्र संकट, पूर्ण शरणागति और दिव्य माता की महाशक्ति के साथ एकत्व के उस पवित्र क्षण में रेणुका गीतम् का प्राकट्य हुआ।
वे अधिकारी मंदिर पहुँचे और गणपति मुनि से बहुत देर तक पूछताछ करते रहे। जिस उमा सहस्रम् की मूल प्रति की उन्हें जाँच करनी थी, वह उनके सामने स्पष्ट रूप से रखी हुई थी। फिर भी रेणुका माता की कृपा से न तो उनकी दृष्टि उस पर गई और न ही उन्होंने उसे जाँचा। इसके स्थान पर गणपति मुनि के साथ हुए दीर्घ संवाद से उनके आध्यात्मिक जीवन, उद्देश्यों और रचनाओं के वास्तविक स्वरूप को अधिकारी समझ सके। उनके सारे संदेह पूर्णतः दूर हो गए। जाँच करने और आवश्यकता पड़ने पर उन्हें गिरफ्तार करने आए वे अधिकारी अन्ततः गहरे सम्मानभाव के साथ वहाँ से लौट गए। बाद के समय में उनमें से कुछ का गणपति मुनि के साथ निकट आध्यात्मिक संबंध भी स्थापित हुआ।
श्री गणपति मुनि ने स्वयं कहा कि उन्हें उस भीषण संकट से बचाने और झूठे आरोपों तथा कठिनाइयों से मुक्त कराने वाली शक्ति रेणुका माता की कृपा ही थी, और वही कृपा रेणुका गीतम् के माध्यम से प्रकट हुई। इसी कारण उनकी आध्यात्मिक परम्परा में इस गीत को अत्यन्त शक्तिशाली रक्षास्तोत्र के रूप में आदर प्राप्त हुआ।
परम्परागत विश्वास है कि जो लोग इस गीत का प्रतिदिन श्रद्धा, निष्ठा और पूर्ण विश्वास के साथ पाठ करते हैं, उन्हें रेणुका माता की प्रबल रक्षा प्राप्त होती है। सांसारिक जीवन की कठिनाइयाँ धीरे-धीरे कम होने लगती हैं, अदृश्य संकट दूर होते हैं और आध्यात्मिक मार्ग की बाधाएँ हटती हैं। कोई साधक यदि इसका नित्य पाठ करे, तो उसका विश्वास दृढ़ होता है, हृदय शुद्ध होता है और साधना में स्थिर प्रगति होने लगती है।
जब यह समझ न आए कि क्या किया जाए, जब मन गहरे भ्रम, संकट या असहायता में घिरा हो, तब सम्पूर्ण विश्वास के साथ रेणुका गीतम् का पाठ करना करुणामयी दिव्य माता से की गई सीधी प्रार्थना माना जाता है। उनकी कृपा असम्भव प्रतीत होने वाली परिस्थितियों में भी अप्रत्याशित रूप से एक नया मार्ग खोल सकती है।
श्री गणपति मुनि के समय से ही उनकी शिष्य-परम्परा में पीढ़ी-दर-पीढ़ी रेणुका गीतम् का नित्यपाठ एक पवित्र साधना के रूप में चला आ रहा है। यह केवल एक स्तोत्र नहीं है; यह पूर्ण शरणागति की जीवंत प्रार्थना, दिव्य अनुग्रह का रक्षाकवच और रेणुका माता की अपरिमित रक्षण-महिमा का पवित्र प्रमाण है।
॥ काव्यकण्ठ वसिष्ठ श्री गणपति मुनि विरचित रेणुकागीतम् ॥
सुरशिरश्चरच्चरणरेणुका ।
जगदधीश्वरी जयति रेणुका ॥१॥
देवताशिरोदेशलालितम् ।
रेणुकापदं दिशतु मे मुदम् ॥ २॥ ॥
कुण्डलीपुरीमण्डनं महः ।
किमपि भासतां मम सदा हृदि ॥ ३ ॥
मस्तकैतवं वस्तु शाश्वतम् ।
अस्ति मे सदा शस्तदं हृदि ॥ ४ ॥
आदिनारि ते पादपङ्कजम् ।
स्फुरतु मे मनः सरसि सर्वदा ॥५॥
केवलं पदोः सेवकोऽस्मि ते ।
वेद्मि नेतरद्वेदसन्नुते ॥ ६॥
हृदय तेऽणुनः समुचितोऽणुना ।
परिचयोऽम्बिकापादरेणुना ॥ ७ ॥
पाहि मुञ्च वा पादपङ्कजम् ।
त्रिदशसन्नुते न त्यजामि ते ॥ ८ ॥
चरणमम्ब ते यो निषेवते ।
पुनरयं कुचौ धयति किं कृती ॥ ९ ॥
अहरहोऽम्ब ते रहसि चिन्तया ।
धन्यतां गतो नान्यदर्थये ।। १० ।
स्मरजितो यथा शिरसि जाह्नवी ।
जननि रेणुके मनसि ते कृपा ॥ ११ ॥
अम्ब पाहि मां दम्भतापसि ।
पादकञ्जयोरादिकिङ्करम् ॥ १२ ॥
पुत्रमात्मनः पुण्यकीर्तने ।
बहुकृपे कुतो मामुपेक्षसे ॥ १३॥
अम्ब संस्तुते जम्भवैरिणा ।
पाहि मामिमं मग्नमापदि ॥ १४ ॥
तत्त्ववादिनः सत्त्वशालिनि ।
त्वामजे विदुः सत्स्वरूपिणीम् ॥ १५॥
त्वां प्रचक्षते सदयवीक्षिते ।
वेदवेदिनो मोदरूपिणीम् ॥ १६ ॥
संविदं विदुस्त्वामिदं प्रसु ।
परमयोगिनः परमदेवते ॥ १७ ॥
जननि कुण्डलीपुरनिवासिनि ।
परशुरामवत् पश्यमामिमम् ॥ १८॥
तनयरोदनं श्रवणशालिनि ।
शृणु सुरार्चिते यदि दया हृदि ॥ १९॥
याचकः सुतो भजनमीप्सितम् ।
तदपि दुर्लभं किमिदमम्बिके ॥ २० ॥
मास्तु वेतनं छिन्नमस्तके ।
भजनमेव ते याच्यते मया ॥ २१॥
तरलतारया जलजदीर्घया ।
सानुकम्पया शीतपातया ॥२२॥
केवलं दृशा पश्य रेणुके ।
तेन मे शुभं न च तवाशुभम् ॥ २३॥
किङ्करीभवत्सुरविलासिनी ।
जयति कुण्डलीनगरवासिनी ॥२४॥
मधुरमम्ब ते चरणपङ्कजम् ।
तत्र यद्रतैस्त्यज्य तेऽखिलम् ॥ २५ ॥
चरणमम्ब ते चरतु मे हृदि ।
इयमनामये प्रार्थना मम ॥ २६ ॥
भुजगकङ्कणप्रभृतिसंस्तुते ।
भुज़भुवामरेर्जननि पाहि माम् ॥ २७ ॥
कुण्डलीपुरीमण्डनायिता ।
गणपतिस्तुता जयति रेणुका ॥ २८ ॥
॥ इति श्रीभगवन्महर्षिरमणान्तेवासिनो वासिष्ठस्य
नरसिंहसूनोर्गणपतेः कृता ‘रेणुकागीतम्’ सम्पूर्णम् ॥
॥ इन्द्रो विश्वस्य राजति ॥
