श्रीअमृताम्बापञ्चरत्नम्
Hindi/Devanagari

Bhagavati Sri Amrtamba - The Presiding Deity of Ghatikachala (Sholingur)
श्री अमृताम्बा पञ्चरत्नम् – परिचय
श्री अमृताम्बा पञ्चरत्नम् घटीकाचल क्षेत्र में विराजमान भगवान् श्री योग नृसिंह स्वामी की दिव्य सहचरी भगवती श्री अमृताम्बा की स्तुति में काव्यकण्ठ वासिष्ठ श्री गणपति मुनि द्वारा रचित पाँच श्लोकों का एक संक्षिप्त, सुंदर स्तोत्र है।
इस स्तोत्र की रचना का प्रसंग अत्यंत प्रेरणादायक है। इसका श्री नृसिंह पञ्चरत्नम् से घनिष्ठ संबंध है। 1904 में एक दिन, जिस विद्यालय में श्री गणपति मुनि अध्यापक के रूप में कार्य कर रहे थे, उसके प्रधानाध्यापक श्री राघवाचारी जी ने बातचीत के दौरान कहा कि वे चोलंगिपुरम् गए थे। यह क्षेत्र शोलिंगुर और घटीकाचल क्षेत्र के नाम से भी प्रसिद्ध है। उन्होंने बताया कि वहाँ उन्होंने श्री योग नृसिंह स्वामी का दर्शन किया था। चूँकि मुनि ने उस पवित्र क्षेत्र का दर्शन नहीं किया था, इसलिए राघवाचारी जी उस क्षेत्र का वर्णन करना चाहते थे। परंतु उनके वर्णन आरंभ करने से पहले ही, दिव्य शक्ति की प्रेरणा से श्री गणपति मुनि ने सहज स्फूर्ति से श्लोकों का गान आरंभ कर दिया।
वे श्लोक केवल उस क्षेत्र का वर्णन ही नहीं करते थे, बल्कि भगवान् योग नृसिंह स्वामी के तत्त्व, महिमा और वैभव की भी स्तुति करते थे। वे श्लोक ऐसे प्रकट हुए मानो मुनि ने घटीकाचल के देवताओं का स्वयं प्रत्यक्ष दर्शन किया हो। इस प्रकार उनसे आशु रूप में प्रवाहित हुए पाँच श्लोक श्री नृसिंह पञ्चरत्नम् के नाम से प्रसिद्ध हुए। उसी दिव्य अवस्था में, श्री योग नृसिंह स्वामी की अधिष्ठान देवी और प्रिय सहचरी के रूप में विराजमान भगवती अमृताम्बा की स्तुति करते हुए मुनि ने पाँच और श्लोकों का भी गान किया।
इस स्तोत्र में श्री अमृताम्बा को घटीकाचल के शिखर पर प्रकाशित होने वाली परम दिव्य उपस्थिति के रूप में आराधित किया गया है। उन्हें महर्षियों के मन का अमृत, श्री नृसिंह स्वामी के नेत्रयुगल का अमृत, और कवियों की जिह्वा का अमृत कहा गया है। वेद और आगम के वाक्यसमूह जिस परम निधि की खोज करते हैं, नेत्रों के लिए प्रत्यक्ष महाभाग्य, और नरकेसरी भगवान् नृसिंह के हृदय को आनंदित करने वाली दिव्य माता के रूप में यह स्तोत्र उनका अत्यंत सुंदर चित्रण करता है।
मुनि की दिव्य दृष्टि और आध्यात्मिक शक्ति से सहज रूप में प्रकट हुआ श्री अमृताम्बा पञ्चरत्नम् एक पवित्र और शक्तिशाली स्तोत्र माना जाता है। श्रद्धा और भक्ति के साथ इस स्तोत्र का पारायण करने वाले भक्त भगवती अमृताम्बा और भगवान् श्री योग नृसिंह स्वामी की रक्षा, करुणा और अनुग्रह प्राप्त करते हैं — ऐसा विश्वास किया जाता है।
॥ काव्यकण्ठ वासिष्ठ श्रीगणपतिमुनि विरचितम् श्रीअमृताम्बापञ्चरत्नम् ॥
भाग्येन भूमिभाजाममृताम्बा नाम बिभ्रती वसति ।
घटिकाचलस्य शिखरे दयिता दैत्यदलनस्य ।॥१॥
सुतरां करुणाकलितं विदधन्नरसिंहमानसं चलितम् ।
घटिकाचलेऽतिललितं किमपि परं दैवतं जयति ।। २ ।।
अमृतं मुनीन्द्रमनसाममृतं नरसिंहनयनयुगलस्य ।
अमृतं कविरसनानां घटिकाद्रौ धाम परमस्ति ।। ३।।
सेवितुमतीव योग्यं निगमागमवाक्यसञ्चयैर्मृग्यम् ।
तनुबद्धमक्षिभाग्यं नृहरेर्घटिकाचले जयति ।।४॥
निवसत्यमरेन्द्रसुन्दरी कबरीलालितपादधूलिका ।
नरकेसरिचित् तडोलिका घटिकाद्रौ जलराशिबालिका ।।५।।
।। इति श्रीभगवन्महर्षिरमणान्तेवासिनो वासिष्ठस्य. नरसिंहसूनोर्गणपतेः
कृतिः श्रीअमृताम्बापञ्चरत्नं समाप्तम् ।।
