श्रीपवनाष्टकम्
Hindi/Devanagari

Pavana, The Vāyu - The Supreme God of Life-breath of the universe.
श्री पवनाष्टकम् – परिचय
श्री पवनाष्टकम् दिव्य पवन अर्थात् वायुदेव की स्तुति में काव्यकण्ठ वासिष्ठ श्री गणपति मुनि द्वारा रचित आठ सुंदर श्लोकों का स्तोत्र है। यहाँ वायु को केवल भौतिक हवा के रूप में नहीं, बल्कि समस्त विश्व के प्राणस्वरूप के रूप में देखा गया है।
इस स्तोत्र में वायुदेव को समस्त जगत् के प्राण के रूप में, विशाल आकाश में स्वतंत्र रूप से विचरण करते हुए, परमेश्वर की आज्ञा से दिन-रात सभी जीवों का पोषण करने वाली दिव्य शक्ति के रूप में स्तुत किया गया है। कवि अत्यंत प्रेमपूर्वक अपने वचनों को वायुदेव को समर्पित करते हैं और उन्हें थके हुए यात्री को दिए जाने वाले अमृत के समान मानते हैं। इस स्तोत्र में वाणी को भी एक पवित्र कन्या के रूप में चित्रित किया गया है — जिसे संस्कारित और अलंकृत करके आकाशनाथ वायुदेव को समर्पित किया जा रहा है।
इस स्तोत्र का दूसरा भाग अधिक ध्यानमय भाव में प्रवाहित होता है। वायुदेव को समस्त विश्व के प्रिय, प्रत्येक शरीर में चेतना को संचालित करने वाली अदृश्य शक्ति, और उस विशाल आकाश में विचरण करने वाली महान उपस्थिति के रूप में स्तुत किया गया है, जहाँ पक्षी विहार करते हैं और तारे फूलों की भाँति चमकते हैं। यह स्तोत्र यह गहरा आध्यात्मिक संकेत भी देता है कि मन की वृत्तियों को पार करके वायुदेव का ध्यान करने वाला साधक अमृतस्वरूप परमसत्य का दर्शन कर सकता है।
श्री पवनाष्टकम् का प्रतिदिन पाठ करने से वाणी पवित्र होती है, मन शांत होता है, प्राणशक्ति बलवान होती है, रोग-निवारण प्राप्त होता है और अंतःकरण में नया उत्साह जागृत होता है — ऐसी मान्यता है। इससे भक्त का संबंध समस्त जीवों में प्रवाहित होने वाली विश्वप्राणशक्ति से और अधिक गहरा होता है। नियमित पाठ साधक को स्पष्टता, उत्साह, भक्ति और अंतर्मन के विस्तार का अनुभव कराता है तथा यह स्मरण दिलाता है कि विश्व में प्रवाहित वही दिव्य प्राण हमारे भीतर भी विद्यमान है।
इस प्रकार श्री पवनाष्टकम् केवल भौतिक वायु की स्तुति करने वाला स्तोत्र नहीं है। यह जीवन प्रदान करने वाली, शुद्ध करने वाली और मुक्ति के मार्ग की ओर ले जाने वाली दिव्य उपस्थिति — विश्वप्राणस्वरूप वायुदेव — को अर्पित एक पवित्र प्रार्थना है।
॥ काव्यकण्ठ वासिष्ठ श्रीगणपतिमु निविरचितम् श्रीपवनाष्टकम् ॥
पूर्वचतुष्कम्
प्राणं प्रपञ्चस्य समीरमीडे नभः समन्तादपि गाहमानम् ।
स एष मे स स्तुतिमस्तु वाचं पितेव कन्यां परिरभ्य हृष्टः ।।१।।
विश्वोपकाराय विभोर्निदेशादहर्निशं गन्धवह प्रयासि ।
श्रान्तोऽसि मन्ये पिब मे वचांसि सुधां जनस्तक्रमिवाध्वखिन्नः ।।२।।
कन्यामिवास्मभ्यमुदारशीलां मनोरमां सम्प्रददौ गिरं यः ।
तां वायवे सम्प्रति दर्शयामो विवर्धितां साधु विभूषितां च ।। ३ ।।
सत्यं दुकूलं परिदेहि वाणि विधाय दूरे वितथं कुचेलम् ।
मात्वज्जुगुप्सां गगनस्य नाथः कार्षीन्निजं पार्श्वमुपागतायाः ।। ४।।
उत्तरचतुष्कम्
विश्वप्रियमेकं प्राणं पवन त्वाम् ।
न स्तौति सचेताः को नाम शरीरी ॥ ५॥
खेलत्खगवर्गं तारासुमचित्रम् ।
उद्यानमिदं ते खं वात विशालम् ।। ६ ।।
ब्रह्माहुरयि त्वां मिथ्यात्वयि नेदम् ।
मुक्ता भवता चेत्सेयं गतिदी क्षा ।। ७ ।।
वृत्तीः परिभूय श्वभ्रे विचरन्तम् ।
पश्यन्ननिल त्वां पश्येदमृतं ना ॥८॥
॥ इति श्रीभगवन्महर्षिरमणान्तेवासिनो वासिष्ठस्य
नरसिंहसूनोर्गणपतेः कृता ‘श्रीपवनाष्टकम्’ सम्पूर्णम् ॥
