श्रीत्रिपुरसुन्दरीगीतम्
Hindi/Devanagari

Bhagavati Tripura Sundari - The Supreme Power of Consciousness
श्री त्रिपुरसुन्दरी गीतम् – परिचय
श्री त्रिपुरसुन्दरी गीतम् परम दिव्यमाता, सौन्दर्य, करुणा, मंगल और दिव्यशक्ति की स्वरूपिणी श्री त्रिपुरसुन्दरी देवी की स्तुति में काव्यकण्ठ वासिष्ठ श्री गणपति मुनि द्वारा रचित एक संक्षिप्त और सुन्दर स्तोत्र है।
इस गीत में देवी के दिव्य रूप का अत्यन्त मनोहर काव्यात्मक वर्णन किया गया है — मेघ के समान श्यामल केश, कमल के समान प्रकाशित मुख, कोमल मुस्कान, सुकुमार अंग और कान्तिमय दिव्यस्वरूप आदि का इसमें सुन्दर चित्रण मिलता है। फिर भी यह स्तोत्र केवल बाह्यरूप-सौन्दर्य का वर्णन नहीं है। इन रूप-चित्रों के माध्यम से कवि त्रिपुरसुन्दरी देवी को दिव्य सौन्दर्य, करुणा और आध्यात्मिक शक्ति की सजीव सन्निधि के रूप में प्रकट करते हैं।
अन्तिम श्लोक में देवी को त्रिपुरवैरी भगवान् शिव के जीवनाधार के रूप में स्तुति करते हुए भक्तिपूर्वक प्रार्थना की गई है — “श्री त्रिपुरसुन्दरी मेरे हृदय में प्रकाशित हों।” इस प्रकार यह गीत देवी के दिव्य रूप का काव्यात्मक दर्शन ही नहीं, बल्कि उनकी अन्तरंग सन्निधि को पाने की आत्मीय प्रार्थना भी है।
॥ काव्यकण्ठ वासिष्ठ श्रीगणपतिमुनि विरचितम् श्रीत्रिपुरसुन्दरीगीतम् ॥
सजलतोयदश्यामकुन्तला ।
कुन्दमालया रचितशेखरा ।।१।।
अमृतभानुना सरसिजेन च ।
तुलितमाननं मञ्जु बिभ्रती ।। २।।
चारुनासिकाभूषणत्विषा ।
चन्द्रिकाच्छया सह लसत् स्मिता ।। ३ ।।
गण्डयुग्मके नातिशोभिना ।
पाण्डुपाण्डुनाऽऽराधितस्मरा ।।४।।
नीलनीरजच्छदविलोचना ।
श्रीयुगोपमश्रवणशालिनी ।।५।।
दर्पणाक्षिपद्भालभासुरा ।
लघुविशेषकं तत्र बिभ्रती ।। ६ ।।
कुण्डलप्रभामण्डितांसका ।
पञ्चसायकोत्साहवर्धिनी ।।७।।
पल्लवाधरा शुक्लदन्तिका ।
फुल्लतां सदा बिभ्रती मुखे ॥८॥
चापसुन्दरारालझिल्लिका ।
अलसहासभाविजितमल्लिका ।।९।।
कम्बुकन्धरा कनकमालिनी ।
बिसनिभप्रभे बिभ्रती भुजे ।। १० ।।
अरुणकञ्जभौ बिभ्रती करौ ।
तुङ्गपीवरस्तनविशोभिनी ।। ११ ।।
सिंहमध्यमा निम्ननाभिका ।
मन्मथायुधद्रोमराजिका ।। १२ ।।
नागनासिका सुन्दरोरुका ।
चारुजङ्घिका कोमलाङ्घ्रिका ।। १३।।
सुमशराह्वयब्रह्मनिर्मिता ।
सालभञ्जिका जङ्गमा यथा ।। १४ ।।
सरसिजाटवीमध्यचारिणीम् ।
नाभिजन्मनश्चारुहासिनीम् ।। १५ ।।
पुष्पधन्विनः प्रियमृगीदृशम् ।
पाकशासनप्राणनायिकाम् ।। १६ ।।
उर्वशीमुखं सुरवधूजनम् ।
रूपसम्पदा जितवती सती ।। १७ ।।
त्रिपुरवैरिणो जीवितेश्वरी ।
त्रिपुरसुन्दरी हृदि चकास्तु मे ।। १८ ।।
।। इति श्रीभगवन्महअर्षिरमणान्तेवासिनो वासिष्ठस्य नरसिंहसूनोर्गणपतेः
कृतिः श्रीत्रिपुरसुन्दरीगीतं समाप्तम् ।।
