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इन्द्रविंशतिः

Hindi/Devanagari

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Indra- The Sovereign Supreme King of The Universe

इन्द्र विंशति – संक्षिप्त परिचय

इन्द्र विंशति भगवान इन्द्र की स्तुति में काव्यकण्ठ वासिष्ठ श्री गणपति मुनि द्वारा रचित बीस श्लोकों का एक स्तोत्र है। पाँच-पाँच श्लोकों के चार वर्गों में विभाजित इस स्तोत्र में इन्द्र को देवताओं के परम नायक, शत्रुशक्तियों का संहार करने वाले महावीर, बल प्रदान करने वाले देवता, लोकों के रक्षक और प्रकृति की शक्तियों के दिव्य अधिपति के रूप में स्तुति की गई है।


आरम्भिक श्लोक गहन भक्तिभाव से परिपूर्ण हैं। इन्द्र को देवताओं के राजा के रूप में स्तुति करते हुए कवि उनकी उपासना को भय और अन्तःकरण की अशुद्धियों को दूर करने वाली औषधि के समान मानते हैं। आगे के श्लोकों में वर्षा, गर्जन, बिजली, आकाश और अपार दिव्य शक्ति के साथ इन्द्र के सम्बन्ध का चित्रण किया गया है। यहाँ इन्द्र को केवल एक पौराणिक देवता के रूप में नहीं, बल्कि तीनों लोकों को धारण करने वाली तथा अजेय प्रतीत होने वाली शक्तियों को भी परास्त करने वाली दिव्य शक्ति और सार्वभौम प्रभुत्व के प्रतीक के रूप में देखा गया है।


अन्तिम भाग में श्री गणपति मुनि इन्द्र का और भी गहन आध्यात्मिक दृष्टि से दर्शन करते हैं। उनके यश का गान किया जा सकता है, परन्तु उनके वास्तविक स्वरूप को ध्यान में सहजता से ग्रहण नहीं किया जा सकता और उनके तत्त्व को बुद्धि द्वारा पूर्णतः परिभाषित भी नहीं किया जा सकता। संसार में दिखाई देने वाला यह स्थूल भौतिक रूप उनके विश्वरूप की एक अभिव्यक्ति के रूप में संकेतित है; समस्त प्राणियों को धारण करने वाली पृथ्वी को भी उनकी महिमा के एक स्वरूप के रूप में स्तुति की गई है।


स्तोत्र के अन्त में इन्द्र से प्रार्थना की गई है कि वे भक्त को समृद्धि, संतोष, स्वाधीनता की भावना और आनन्द से परिपूर्ण हृदय प्रदान करें।


॥ काव्यकण्ठ वासिष्ठ श्रीगणपतिमुनि विरचितम् इन्द्रविंशतिः ॥


प्रथमो वर्गः

अखिलनायकं मखभुजां वरम् ।

अरिविदारणं हरिहयं भजे ॥१॥


मधुमुचामृचां परिचयी वृषा ।

रसकिरां गिरां भवतु लोकिता ।। २।।


अमरराज मे त्रिमलवारणे ।

भजनमेव ते भवतु भेषजम् ।। ३ ।।


प्रतिभये गदे प्रतिभटे पटौ ।

वरद तारणं तव निषेवणम् ॥४॥


अयमिहाश्रितो भयहरेन्द्र ते ।

मधुरपद्यभृन्नधुरि खिद्यतु ।।५।।



द्वितीयो वर्गः

वृत्रमयि भृन्दन्नुत्सृजसि नीरम् ।

उत्सवसमेतो गर्जसि गभीरम् ।। ६ ।।


उग्रतरनादं दीप्ततरभासम् ।

अप्सु विहरन्तं देवविभुमीडे ॥ ७॥


वज्रधरकीली भाति भुवि पाता ।

भूरि बलशाली त्वं नभसि नेता ॥ ८ ॥



मन्थनत आसीदेष इह यज्ञे ।

घर्षणविशेषाद्व्योमनि स जज्ञे ।।९।।

भूरिमहिमाढ्यम् सन्मुनिभिरीड्यम् ।

त्रातसुरचक्रं सन्नमतशक्रम् ।। १० ।।



तृतीयो वर्गः

असुरधिपिण्डं तटिदधिभूतम् ।

अयममराणां पतिरधिदैवम् ।। ११ ।।


जगदयमेतत्प्रभवति भर्तुम् ।

जगदरिदर्याक्षयमपि कर्तुम् ।।१२।।


अयमधिनाथो भवति बलस्य ।

अत उचितोऽस्य प्रभुरखिलस्य ।। १३ ।।


नरसुरदैत्यान्वितमपि नूनम् ।

बलविभवेऽस्मात्रिभुवनमूनम् ।। १४ ।।


अयमतिमत्तैः करिभिरजय्यम् ।

घटयति सिंहं मृगशिशुजय्यम् ।। १५।।



चतुर्थो वर्गः

राकाशशिकीर्ति पाकासुरशत्रुम् ।

आकाशमहीशं शोकापहमीडे ।। १६ ।।


निर्जित्य समस्तान् भावानपि जिष्णो ।

सम्राड् भुवनानां आसीः प्रभविष्णो ।। १७ ।।


जानामि मरुत्त्वन् गानाय यशस्ते ।

ध्यानाय न रूपं ज्ञानाय न तत्त्वम् ।। १८ ।।


लोके स्थितिभाजां यत्ते घनमूर्तिः ।

धात्री निखिलानां सेयं तव कीर्तिः ।। १९ ।।


तुष्टिं बहुवित्तां स्वाराडनियत्ताम् ।

आनन्दितचित्तां भक्तस्य विधत्ताम् ।। २० ।।


॥ इति श्रीभगवन्महर्षिरमणान्तेवासिनो वासिष्ठस्य

नरसिंहसूनोर्गणपतेः कृता इन्द्रविंशतिः समाप्ता ॥

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