रमणगीतम्
Hindi/Devanagari

Bhagavan Sri Ramana Maharshi - Beloved Gurudev of Sri Ganapati Muni
रमण गीतम् – परिचय
रमण गीतम् काव्यकण्ठ वासिष्ठ श्री गणपति मुनि द्वारा अपने आराध्य गुरु भगवान् श्री रमण महर्षि की स्तुति में रचित एक संक्षिप्त, परंतु अत्यंत मधुर संस्कृत स्तोत्र है।
इस गीत में गणपति मुनि, रमण मुनि के निर्मल और पवित्र चरणों की भक्तिपूर्वक आराधना करते हैं। उनके चरण उन सभी भक्तों के लिए शरणस्थान के रूप में वर्णित हैं जो विनम्रता से उन्हें प्रणाम करते हैं। इस स्तोत्र में भगवान् रमण पवित्र अरुणाचल पर्वत पर विराजमान एक प्रकाशमान आध्यात्मिक महापुरुष के रूप में चित्रित किए गए हैं। उनकी कृपा अहंकार को दूर करती है, हृदय को पवित्र बनाती है और भक्तों को संसार-सागर से पार करा सकती है।
रूप में संक्षिप्त होने पर भी, रमण गीतम् गहरी भक्ति, शरणागति और गुरु-भक्ति से परिपूर्ण है। इसमें भगवान् रमण केवल एक महात्मा के रूप में ही नहीं, बल्कि परम आध्यात्मिक शरणस्थान, आंतरिक आनंद के मूलस्वरूप और मुक्ति की कामना करने वाले साधकों के करुणामय मार्गदर्शक के रूप में दर्शाए गए हैं।
॥ काव्यकण्ठ वासिष्ठ श्रीगणपतिमुनि विरचितम् रमणगीतम् ॥
रमणमुनिविमलतरचरणे
भज मनुज नमदखिलनरनिकरशरणे
सुमविशिख समरपरहृदयमदहरणे
यदि कुतुकमधुना ते ॥१॥
रमणमुनि...
अनिशमपि विनमदलिवलिते
भज मनुज ननु मनसि नवजलज ललिते
विविधकवि जनवचनजटिलरुचिकलिते
गिरिशिखरमणिभूते ।। २॥
रमणमुनि…
निरतिशयनिखिलसुखनिलये
विनतजन भरणधृतकनकमयवलये
भवजलधि तरणविधितरलहृदि वलये
बहुमहिमसमुपेते ।। ३ ।।
रमणमुनि...
जननमृतिरहितजनविनुते
कलिकलुष जनकमपि हृदयमिह मनुते
परमसुख परवशितपदनिहितविनते
मम विजितजलजाते ।।४।।
रमणमुनिविमलतरचरणे
भज मनुज नमदखिलनरनिकरशरणे
सुमविशिख समरपरहृदयमदहरणे
यदि कुतुकमधुना ते ॥
॥ इति श्रीभगवन्महर्षिरमणान्तेवासिनो वासिष्ठस्य
नरसिंहसूनोर्गणपतेः कृता ‘रमणगी तम्’ सम्पूर्णम् ॥
