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शिवगीतम्

Hindi/Devanagari

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Bhagavan Siva - The Father of The Universe

शिव गीतम् – परिचय

समस्त विश्व में विराजमान परम सत्यस्वरूप और नित्य रक्षक भगवान् शिव की स्तुति में काव्यकण्ठ वासिष्ठ श्री गणपति मुनि द्वारा रचित यह शिव गीतम् एक गंभीर और भक्तिपूर्ण स्तोत्र है।


इस स्तोत्र में शिव की आराधना सामान्य इन्द्रियों से परे, सूक्ष्म और निराकार परम तत्त्व के रूप में की गई है। साथ ही, उन्हें ध्यान में ग्रहण किए जा सकने वाले प्रकाशमय दिव्य रूप के रूप में भी स्तुति की गई है। इस प्रकार यह स्तोत्र शिव के दो स्वरूपों को सुंदर रूप से प्रस्तुत करता है — एक ओर वे गुणरहित, सर्वव्यापी परब्रह्मस्वरूप हैं, और दूसरी ओर लोकों की रक्षा तथा अनुग्रह के लिए प्रकट होने वाले मंगलमय परमेश्वर हैं।


इस गीत में शिव को वेद और तंत्र में स्तुत विश्वशक्तियों के साथ एकरूप दिखाया गया है। रुद्र, हर, ईशान, भूतेश और समस्त भूतों के अधिपति के रूप में उनकी महिमा व्यक्त होती है। उनकी दिव्य सहचरी माया को समस्त जगतों की माता और सृष्टि को प्रकट करने वाली शक्ति के रूप में वर्णित किया गया है।


संक्षिप्त होते हुए भी गहन श्लोकों के माध्यम से शिव गीतम् भक्ति, वेदान्तज्ञान, योगध्यान और शिव के परमातीत तथा सर्वान्तर्यामी स्वरूप की दृष्टि को एक साथ जोड़ता है। यह भगवान् शिव की कृपा से शरण, रक्षा, आंतरिक स्पष्टता और विजय की कामना करने वाली एक पवित्र प्रार्थना है।


॥ काव्यकण्ठ वासिष्ठ श्रीगणपतिमुनिविरचितम् शिवगीतम् ॥


उद्दीप्यत् किरणं चित्रं श्रीशरणम् ।

कामारेश्चरणं भूयान्नः शरणम् ॥१॥


सत्यः कोऽपि शिवो नित्यः पालयिता ।

मध्ये यो जगतां स ध्येयः सततम् ।। २ ।।


नास्त्येतस्य वपुर्वस्त्ये क्वापि न सः ।

मत्याऽभाणि बुधैः सत्याधारपदम् ।। ३ ।।


उक्तं सूक्ष्मतमं द्वेधैकं परमम् ।

रूपं रूपतया किं च स्थानतया ।। ४ ।।


सोऽणुः स्यादणुतो धातैषां जगताम् ।

तच्छक्तिर्महतो विज्ञेया महती ।। ५।।


गत्वा तिष्ठति ना यत्स्वं हार्दपदम् ।

अग्राह्यस्य विभोस्तस्य ध्यानमिदम् ।। ६।।


आत्मानं जगतां राजानं पितरम् ।

आचार्यं च मुहुः सङ्गायामि हरम् ।। ७।।


दीप्यन्तं दिवि तं लोके सर्वभुजम् ।

भूतेशं प्रणुमो मायाकान्तमजम् ।।८।।


दृश्ये विश्वतनुं पारे निर्वपुषम् ।

गायामः परमं भक्तज्ञानपुषम् ।।९।।


अष्टौ ते तनवः त्रातर्विश्वमिदम् ।

वक्त्येतद्भवते माहात्म्यं विशदम् ।। १० ।।


सर्वेषां जगतां माता देवनुता ।

ईशान त्रिगुणा माया ते दयिता ।। ११ ।।


शक्त्यासौ भुवनं सृष्ट्वा पातुमिदम् ।

हैमं दिव्यवपुर्जग्राहाभयदम् ।। १२ ।।


सूक्ष्मं स्यादगुणं हैमं स्यात्सगुणम् ।

देवस्यादिविभोरेवं द्वे वपुषी ।। १३ ।।


भाषामात्रवपुः पूर्वं स्यादवपुः ।

अन्यद्बुद्धिमतां ध्यानग्राह्यवपुः ।।१४।।


बिभ्रद्भाति जगत्साम्राज्यं गगने ।

हैमोऽसौ पुरुषः सिद्धानां भुवने ।। १५।।


इन्द्रो वेदविदां भाषायां सपरः ।

नाथस्तन्त्रविदां व्याहारेषु हरः ।। १६ ।।


प्रत्युष्णांशुतया तन्वा बिम्बितया ।

प्रत्यण्डं प्रभुतां धत्ते सोऽद्भुतया ।। १७ ।।


अभ्रे राजति यो बिभ्राणो भुवनम् ।

शुभ्रागे च विभुः सभ्राजिष्णुयशाः ।। १८ ।।


गौरोऽयं गगने शुक्लः शुभ्रनगे ।

एकेयं तु भिदा मायारूपकृता ।।१९।।


रुद्रः शुक्लगिरावग्निर्वा स पुमान् ।

ईशो व्योग्नि लसन्निन्द्रो वा सुमहान् ।। २० ।।


हैमं भूतपते शुक्लं वा शिव ते ।

रूपं यः स्मरति प्राज्ञोऽयं जयति ।। २१ ।।


अभ्रे ये मरुतः शुभ्रे भूभृति ते ।

क्लेशानां दमना ईशान प्रमथाः ।। २२ ।।


दासोऽहं मरुतः पातारो जगतः ।

भूता वा भवतां स्तोता पापहृताम् ।। २३ ।।


पायान्मामभितस्तिष्ठन्तं तपसि ।

बिभ्राणः स शिवः कारुण्यं मनसि ।। २४ ।।


गातारं गणपं गायत्रैर्मुकुलैः ।

ईशो यो जयतात्सर्वैश्चापि बलैः ।। २५।।


।। इति श्रीभगवन्महर्षिरमणान्तेवासिनो वासिष्ठस्य नरसिंहसूनोर्गणपतेः

कृतिः शिवगीतं समाप्तम् ।।

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