श्रीनृसिंहपञ्चरत्नम्
Hindi/Devanagari

Bhagavan Sri Yoga Narasimha Swamy of Ghatikachala (Sholingur)
श्री नृसिंह पञ्चरत्नम् – परिचय
श्री नृसिंह पञ्चरत्नम् घटिकाचल क्षेत्र में विराजमान भगवान् श्री योग नृसिंह स्वामी की स्तुति में काव्यकण्ठ वासिष्ठ श्री गणपति मुनि द्वारा रचित पाँच श्लोकों का एक संक्षिप्त, परंतु अत्यंत शक्तिशाली स्तोत्र है।
इस स्तोत्र की रचना का प्रसंग अत्यंत प्रेरणादायक है। 1904 में एक दिन, जिस विद्यालय में श्री गणपति मुनि शिक्षक के रूप में कार्य कर रहे थे, उस विद्यालय के प्रधानाध्यापक श्री राघवाचारी जी ने बातचीत के दौरान बताया कि वे चोळंगिपुरम् गए थे। यह क्षेत्र शोलिंगुर और घटिकाचल क्षेत्र के नाम से भी प्रसिद्ध है। उन्होंने बताया कि वहाँ उन्होंने श्री योग नृसिंह स्वामी के दर्शन किए। चूँकि मुनि उस क्षेत्र में नहीं गए थे, इसलिए राघवाचारी जी उस पवित्र स्थान का वर्णन करना चाहते थे। परंतु उनके वर्णन शुरू करने से पहले ही, किसी दिव्य शक्ति की प्रेरणा से श्री गणपति मुनि स्वयं आशुरूप से श्लोकों का गान करने लगे।
वे श्लोक केवल उस क्षेत्र का वर्णन ही नहीं करते, बल्कि भगवान् योग नृसिंह के तत्त्व, महिमा और वैभव की भी स्तुति करते हैं। वे श्लोक इस प्रकार प्रकट हुए, मानो मुनि ने स्वयं घटिकाचल के देवताओं का प्रत्यक्ष दर्शन किया हो। इस प्रकार मुनि द्वारा आशुरूप से गाए गए वे पाँच श्लोक ही श्री नृसिंह पञ्चरत्नम् के नाम से प्रसिद्ध हुए।
मुनि की दिव्य शक्ति और दिव्य दृष्टि से उसी क्षण प्रकट हुए इन श्लोकों को अत्यंत शक्तिशाली माना जाता है। भक्तों का विश्वास है कि जो लोग श्री नृसिंह की सहायता, रक्षा और अनुग्रह की कामना से भक्ति और श्रद्धा के साथ इस स्तोत्र का पारायण करते हैं, उन्हें उनका आशीर्वाद अवश्य प्राप्त होता है।
॥ काव्यकण्ठ वासिष्ठ श्रीगणपतिमु निविरचितम् श्रीनृसिंहपञ्चरत्नम् ॥
घटिकाचलमालयमादधता शरणागतरक्षणमाचरता ।
करुणाकलितेन जगत्पतिना न विना मम याति मुदं हृदयम् ।।१।।
वसतिं कुरुषे घटिकाद्रिवरं हृदयं च मदीयमदस्सदय ।
नरसिंह विहाय विभो कपटं वद कुत्र मनो भवतो रमते ।। २।।
घटिकाचलवासिनमीशमजं सततं स्मरतां क्व सतामशुभम् ।
यदि कोऽपि भवेदशुभस्य लवो रुचिराशिरुदेष्यति पाशि दिशि ।। ३॥
बहवोऽवतरा विलसन्तु मधुं द्विषतो निजविग्रहतोऽप्यधिकम् । घटिकागिरिराड्वसतौ नृहरौ करुणावति मे रमते हृदयम् ।। ४ ।।
चरणागतान्परमसात्त्विकानृषीन् करुणावलोकनिकरेण लालयन् ।
घटिकाद्रिसीमनि नृसिंहविग्रहो जगतां पतिर्वसति वासवार्चितः ।।५।।
॥ इति श्रीभगवन्महर्षिरमणान्तेवासिनो वासिष्ठस्य
नरसिंहसूनोर्गणपतेः कृता ‘श्रीनृसिंहपञ्चरत्नं’ सम्पूर्णम् ॥
