काव्यकण्ठ वासिष्ठ श्री गणपति मुनि विरचितम्
इन्द्राणी सप्तसती
द्वितीयो माणवकपादः

इस स्तबक में श्री गणपति मुनि शचीदेवी—इन्द्राणी—की आराधना उस परमशक्ति के रूप में करते हैं, जो अपनी दिव्य मुस्कान से मन के आन्तरिक मार्ग को अवरुद्ध करने वाले अन्धकार को दूर करती हैं। यह स्तबक इस प्रार्थना से आरम्भ होता है कि उनकी प्रकाशमयी मुस्कान मनोमार्ग में गुप्त रूप से स्थित दुर्जेय अज्ञान का नाश करे और पीड़ित भारतभूमि की आँखों से निरन्तर बहते हुए अश्रुओं को पोंछ दे।
दिव्यमाता की स्तुति दानवी शक्तियों का संहार करने वाली, इन्द्र की प्रिय सहचरी, स्वर्गलोक की शोभा तथा अपनी कृपा से पाप को जड़ से नष्ट करने वाली देवी के रूप में की गई है। चन्द्रमा के समान प्रकाश, शीतल कृपादृष्टि, स्वर्णिम दिव्यरूप, मनोहर वाणी और प्रेम से उमड़ती करुणा की तरंगों के माध्यम से उनके सौन्दर्य का वर्णन किया गया है। किन्तु यह सौन्दर्य केवल काव्यात्मक वर्णन नहीं है; वही बुद्धि, बल, भक्ति और आन्तरिक पवित्रता को पोषित करने वाली दिव्यशक्ति के रूप में प्रकट होता है।
अनेक नामों, सिद्धान्तों और उपासना-परम्पराओं के पीछे विद्यमान दिव्य स्त्रीशक्ति की एकता इस स्तबक के प्रमुख विषयों में से एक है। जो लोग ईश्वर को जगत् का कारण मानते हैं, वे उसी दिव्यमाता को ‘माया’ के रूप में देखते हैं। सांख्य दर्शन के अनुयायी उन्हें प्रकृति मानते हैं। योगी उनकी उपासना कुण्डलिनीशक्ति के रूप में करते हैं। पञ्चदशी विद्या के उपासक उन्हें ललिता तथा नवार्ण मन्त्र के साधक उन्हें चण्डी के रूप में पूजते हैं। श्री गणपति मुनि की दृष्टि में ये सभी लोग अलग-अलग देवियों की आराधना नहीं कर रहे हैं; वे विभिन्न मार्गों, नामों और उपासना-पद्धतियों द्वारा एक ही परमशक्ति के समीप पहुँच रहे हैं।
यह स्तबक शचीदेवी के अग्नि, सूर्य, चन्द्रमा और त्रिगुणों के साथ विश्वव्यापी सम्बन्ध को भी प्रकट करता है। सूर्य में वे सात्त्विक शक्ति के रूप में, पृथ्वी पर राजसिक शक्ति के रूप में और चन्द्रमा में तामसिक शक्ति के रूप में अभिव्यक्त होती हैं। फिर भी वे इन सभी गुणों से परे हैं। वे समस्त रूपों के माध्यम से प्रकाशित होती हुई परम तेज के रूप में पूरे विश्व में व्याप्त हैं।
अन्तिम श्लोकों में संरक्षण, विजय, निर्भयता और आन्तरिक बल के लिए गहन प्रार्थना व्यक्त होती है। कवि दिव्यमाता से विनती करते हैं कि दीर्घकालीन पराजयों के बाद वे उन्हें अपने ही पवित्र देश की रक्षा करने में समर्थ एक निर्भय सेवक के रूप में गढ़ें। इस प्रकार यह स्तबक दैवी सौन्दर्य, तत्त्वमीमांसा, मन्त्रशास्त्र, योग-संकेत और राष्ट्ररक्षा की भावना का समन्वय करने वाली महिमामयी स्तुति बन जाता है।
## इस स्तबक के मुख्य विषय
• मन के अन्धकार और आन्तरिक मार्ग की बाधाओं को दूर करने के लिए प्रार्थना
• इन्द्राणी की मुस्कान और कृपादृष्टि को ज्ञान तथा बल के स्रोत के रूप में देखना
• पीड़ित भारतभूमि की रक्षा के लिए आवाहन
• शचीदेवी को माया, प्रकृति, कुण्डलिनी, ललिता और चण्डी के रूप में पहचानना
• अनेक परम्पराओं के पीछे एक ही परमशक्ति के विद्यमान होने की शिक्षा
• सूर्य, पृथ्वी, चन्द्रमा और त्रिगुणों में अभिव्यक्त होने वाली शक्ति के रूप में उनका दर्शन
• निर्भयता, विजय और मातृभूमि की सेवा के लिए शक्ति प्रदान करने की प्रार्थना
**इन्द्रो विश्वस्य राजति — इन्द्र समस्त विश्व पर शासन करते हैं।**
॥ द्वितीयो माणवकपादः ॥
शक्ततमा शक्रवधू हासविभा मे हरतु ।
मानसमार्गावरकं जेतुमशक्यं तिमिरम् ।। २२६ ।।
भारतभूपद्मदृशो दुर्दशया क्षीणतनोः ।
बाष्पमजस्रं विगलद्वासवभामा हरतु ।। २ २७ ।।
दण्डितरक्षोजनता पण्डितगीतावनिता ।
मण्डितमाहेन्द्रगृहा खण्डितपापा जयति ।। २२८ ।।
सद्गुणसम्पत्कलितं सर्वशरीरे ललितम् ।
देवपतेः पुण्यफलं पुष्यतु मे बुद्धिबलम् ।। २२९ ।।
हासविशेषैरलसैर्दिक्षु किरन्त्यच्छसुधाम् ।
इन्द्रदृगानन्दकरी चन्द्रमुखी मामवतु ।। २३० ।।
प्रेमतरङ्गप्रतिमैः शीतलदृष्टिप्रकरैः ।
शक्रमनोमोहकरी वक्रकचा मामवतु ।। २३१।।
गाढरसैश्चारुपदैर्गूढतरार्थैर्वचनैः ।
कामकरी वृत्रजितो हेमतनुर्मामवतु ।। २३२।।
मृत्युतनुः कालतनोर्विश्वपतेः पार्श्वचरी ।
प्रेतजगद्रक्षति या सा तरुणी मामवतु ।। २३३।।
प्रेतजगत्केचिदधो लोकमपुण्यं ब्रुवते ।
शीतरुचेर्देवि परो नेतरदेतद् वदति ।। २३४ ।।
भूरियमुर्वी वसुधा वारिजवैर्येषभुवः ।
स्वर्महसां राशिरसौ येषु नरप्रेतसुराः ।। २३५।।
राजतशैलं शशिनः केचिदभिन्नं ब्रुवते ।
मृत्युयमावेव शिवावीश्वरि तेषां तु मते ।। २३६ ।।
राजतशैलः पितृभूरोषधिराडेष यदि ।
काञ्चनशैलः सुरभूर्बन्धुरसौ वारिरुहाम् ।। २३७ ।।
पावय भूमिं दधतः पावककायस्य विभोः ।
भामिनि भावानुगुणे सेवकमग्नायि तव ।। २३८ ।।
यस्य यमो भूतपतिर्बुद्धिमतस्तस्य मते ।
अग्निरुपेन्द्रो मघवा काञ्चनगर्भो भगवान् ।। २३९।।
यस्य महाकालवधूमृत्युरपि द्वे न विदः ।
त्वं शचि मेधाऽस्यमते पावकशक्तिः कमला ।। २४० ।।
नामसु भेदोऽस्तु धियामीश्वरि निष्कृष्टमिदम् ।
सूर्यधरेन्दुष्वजरे त्वं त्रितनुर्भासि परे ।। २४१।।
सात्त्विकशक्तिः सवितर्यादिमरामे भवसि ।
राजसशक्तिर्भुवि नस्तामसशक्तिः शशिनि ।। २४२।।
सर्वगुणा सर्वविभा सर्वबला सर्वरसा ।
सर्वमिदं व्याप्य जगत्कापि विभान्ती परमा ।। २४३ ।।
व्योमतनुर्निर्वपुषो देवि सतस्त्वं दयिता ।
अस्यभियुक्तैर्विबुधैरम्ब महेश्वर्युदिता ।। २४४।।
सा खलु माया परमा कारणमीशं वदताम् ।
सा प्रकृतिः साङ्ख्यविदां सा यमिनां कुण्डलिनी ।।२४५
सा ललिता पञ्चदशीमुत्तमविद्यां जपताम् ।
सा खलु चण्डी जननी साधुनवार्णं भजताम् ।। २४६ ।
सा मम शच्याः परमं कारणरूपं भवति ।
कार्यतनुर्दिवि शक्रं सम्मदयन्ती लसति ।। २४७।।
व्योमतनोः सर्वजगच्चालनसूत्रं तु वशे ।
निर्वहणे तस्य पुनर्दिव्यतनुस्त्रीत्रितयम् ।। २४८ ।।
पातुमिमं स्वं विषयं हन्त चिरान्निर्विजयम् ।
किङ्करमीशे विभयं मां कुरु पर्याप्तशयम् ।। २४९।।
चारुपदक्रीडनकैर्मातरिमैर्माणवकैः ।
चेतसि ते देवनुते प्रीतिरमोघा भवतु ।। २५० ।।
॥ इति द्वितीयः स्तबकः ॥
