काव्यकण्ठ वासिष्ठ श्री गणपति मुनि विरचितम्
इन्द्राणी सप्तसती
तृतीयमानुष्टुभं शतकम् - प्रथमः पथ्यावक्त्र स्तबकः

यह स्तबक *इन्द्राणी सप्तशती* के उन विशिष्ट अंशों में से एक है, जिनमें अत्यन्त गम्भीर दार्शनिक, आध्यात्मिक और तत्त्वमीमांसात्मक विषयों का प्रतिपादन किया गया है। श्री गणपति मुनि परमशक्ति की दिव्य मुस्कान से प्रार्थना करते हैं कि वह समस्त संशयों और भ्रम को दूर करे, क्योंकि उसी परमशक्ति से यह अद्भुत विश्व विस्तृत और अभिव्यक्त हो रहा है।
यहाँ इन्द्राणी का वर्णन केवल स्वर्ग की साम्राज्ञी के रूप में नहीं किया गया है। उन्हें समस्त जीवों, समस्त अवस्थाओं और समस्त कालों में चैतन्यरूप से व्याप्त **चित्शक्ति** के रूप में प्रकट किया गया है। मुनि परमदैव और शक्ति के बीच विद्यमान अभेद का वर्णन करते हैं। एक ही परमसत्य की स्तुति इन्द्र, ईश और वासुदेव आदि नामों से की जाती है; उसी परमशक्ति की आराधना शची, शिवा और महालक्ष्मी आदि नामों से होती है। यह भेद केवल व्यावहारिक अभिव्यक्ति के स्तर पर है; परमार्थतः सत्य एक ही है।
यह स्तबक ज्ञाता, ज्ञान, अन्तःचैतन्य और उसकी अनेक शाखाओं के बीच के सम्बन्ध का गहन विवेचन करता है। जिस प्रकार एक ही समुद्र में अनेक तरंगें उत्पन्न होती हैं, उसी प्रकार एक ही चैतन्य-सागर में अनेक व्यक्तिगत ज्ञाता प्रकट होते हैं। फिर भी उनका आधारभूत परमसत्य कभी विभाजित नहीं होता। समष्टि-चैतन्यस्वरूपिणी दिव्यमाता ब्रह्म, देवताओं अथवा व्यक्तिगत जीवों से भिन्न नहीं हैं।
श्री गणपति मुनि यह भी समझाते हैं कि अन्तःआत्मा में सूक्ष्म बीजरूप से गुप्त रूप में स्थित जीवों के माध्यम से सृष्टि किस प्रकार अभिव्यक्त होती है। अभिव्यक्ति से पूर्व समस्त जीव उनमें अविभक्त रूप से स्थित रहते हैं। विश्व को अनादि माना जाए अथवा चैतन्यशक्ति द्वारा नवीन रूप से अभिव्यक्त माना जाए—दोनों ही स्थितियों में वह उनकी ही अभिव्यक्ति है। जिस प्रकार व्यक्तिगत चैतन्य से स्वप्न उत्पन्न होते हैं, उसी प्रकार दिव्यमाता के विशाल समष्टि-चैतन्य से यह सम्पूर्ण विश्व प्रकट होता है।
इस स्तबक की सर्वोच्च दार्शनिक उद्घोषणा 220वें श्लोक में व्यक्त होती है:
“तुम ही ब्रह्म हो; तुम ही पराशक्ति हो; तुम ही समस्त देवता हो; तुम ही जीव हो; और तुम ही यह सम्पूर्ण विश्व हो। तुम्हारे अतिरिक्त कुछ भी नहीं है।”
मुनि संकेत करते हैं कि यह संसार केवल उस सर्प के समान भ्रम नहीं है, जिसकी कल्पना रस्सी में भूलवश कर ली जाती है। दिव्यमाता और जगत् का सम्बन्ध मिट्टी और घड़े के सम्बन्ध के समान है। घड़े का रूप मिट्टी पर आश्रित होता है, किन्तु वह मिट्टी से भिन्न कोई स्वतन्त्र सत्ता नहीं है। उसी प्रकार इस विश्व के समस्त नाम और रूप दिव्यमाता पर आश्रित हैं; वे उनसे पृथक् नहीं हैं।
अन्त में यह स्तबक इस प्रार्थना के साथ समाप्त होता है कि गणपति मुनि के शरीर में निरन्तर प्रवाहित होने वाली सनातन शक्ति दुःख से पीड़ित भारतवर्ष की रक्षा के लिए सक्रिय रूप धारण करे।
इस प्रकार यह स्तबक चित्शक्ति को विश्व के मूल के रूप में प्रस्तुत करते हुए ब्रह्म और शक्ति की एकता का प्रतिपादन करता है। यह इन्द्र, ईश, वासुदेव, शची, शिवा और महालक्ष्मी आदि दैवी नामों को एक ही परमसत्य की विविध अभिव्यक्तियों के रूप में समन्वित करता है। यह घोषित करता है कि सृष्टि अविभक्त चैतन्य से अभिव्यक्त होती है और सम्पूर्ण विश्व दिव्यमाता की अपनी ही विभूति है। साथ ही यह भारतवर्ष की रक्षा के लिए पराशक्ति का आवाहन करता है।
## इस स्तबक के मुख्य विषय
• इन्द्राणी को विश्व की मूलभूत चित्शक्ति के रूप में देखना
• ब्रह्म और शक्ति के अभेद का प्रतिपादन
• इन्द्र, ईश, वासुदेव, शची, शिवा और महालक्ष्मी के स्वरूपों का समन्वय
• एक ही चैतन्य-सागर में अनेक जीवचैतन्यों का तरंगों के समान प्रकट होना
• अभिव्यक्ति से पूर्व समस्त जीवों का दिव्यमाता में अविभक्त रूप से स्थित होना
• विश्व-सृष्टि को समष्टि-चैतन्य से उत्पन्न अभिव्यक्ति के रूप में देखना
• “तुम ही ब्रह्म, पराशक्ति, देवता, जीव और सम्पूर्ण विश्व हो”—यह परम अद्वैत घोषणा
• जगत् को दिव्यमाता से पृथक् न मानकर उनकी अपनी विभूति के रूप में देखना
• दुःखित भारतवर्ष की रक्षा के लिए गणपति मुनि में प्रवाहित शक्ति का आवाहन
**इन्द्रो विश्वस्य राजति — इन्द्र समस्त विश्व पर शासन करते हैं।**
॥ अथ तृतीयमानुष्टुभं शतकम् ॥
॥ प्रथमः पथ्यावक्त्र स्तबकः ॥
हसितं तन्महाशक्तेरस्माकं हरतु भ्रमम् ।
यत एव महच्चित्रं विश्वमेतद्विजृम्भते ।। २०१।।
राजन्ती सर्वभूतेषु सर्वावस्थ ासु सर्वदा ।
माता सर्गस्य चित्पायात् पौलोमी भारतक्षितिम् ।। २०२
धर्मिज्ञानं विभोस्तत्त्वं धर्मो ज्ञानं सवित्रि ते ।
व्यवहृत्यै विभागोऽयं वस्त्वेकं तत्त्वतो युवाम् ।। २०३।।
इन्द्रेशवासुदेवाद्यैः पदैः सङ्कीर्त्यते विभुः ।
शची शिवा महालक्ष्मीप्रमुखैर्भवती पदैः ।। २०४।।
अन्तरं वस्तुनो ज्ञातृ तच्छक्तं परिचक्षते ।
शाखाः समन्ततो ज्ञानं शक्तिं सङ्कीर्तयन्ति ताम् ।। २०५
अन्तरस्य च शाखानामैक्यं निर्विषयस्थितौ ।
विषयग्रहणेष्वेव सविभागः प्रदृश्यते ।। २०६ ।।
स्यादेवं विषयापेक्षी शाखानामन्तरस्य च ।
अविभक्तैकरूपाणां विभागो हरितामिव ।। २०७।।
लक्ष्यमन्तर्वयं चक्रे ध्यायामो यत्र निष्ठिताः ।
अन्तरीभावतस्तस्य नान्तरं तु विलक्षणम् ।। २०८ ।।
अहङ्कृतेर्वयं नान्ये यत्राहङकृतिसम्भवः ।
सम्पद्येतान्तरं तत्र ज्ञानस्य ज्ञातृतावहम् ।। २०९।।
अन्तरावर्तभूयस्त्वादेकस्मिन् बोधसागरे ।
बोद्धारो बहवोऽभूवन् वस्तु नैव तु भिद्यते ।। २१० ।।
चिद्रूपे मातरेवं त्वं परस्माद्ब्रह्मणो यथा ।
न देवि देवतात्मभ्यो जीवात्मभ्यश्च भिद्यसे ।। २११ ।।
समस्तभूतबीजानां गूढानामन्तरात्मनि ।
तवोद्गारोऽयमाकाशो मातस्सूक्ष्मरजोमयः ।। २१२ ।।
न सर्वभूतबीजानि वस्तूनि स्युः पृथक् पृथक् ।
त्वयि प्रागविभक्तानि बभूवुरिति विश्रुतिः ।। २१३ ।।
यथाम्बस्मृतिबीजानां प्रज्ञायामविशेषतः ।
तथा स्याद्भूतबीजानामविभक्तस्थितिस्त्वयि ।। २१४ ।
नाणूनि भूतबीजानि प्राक्सर्गात्त्वयि संस्थितौ ।
चितिशक्तयात्मकान्येव निराकाराणि सर्वथा ।। २१५।।
अनादि चेदिदं विश्वं स्मरण्णात्तव सर्जनम् ।
सादि चेदादिमः सर्गो वक्तव्यस्तव कल्पनात् ।। २१६ ।
विधातुं शक्नुयात्संविदभूतस्यापि कल्पनम् ।
कल्पितस्यैकदा भूयः सर्जनावसरे स्मृतिः ।। २१७।।
चितेरस्मादृशां वीर्यं स्वप्ने चेद्विश्वकारणम् ।
चितेस्समष्टिभूतायाः प्रभावे संशयः कुतः ।। २१८ ।।
मातस्समष्टिचिद्रूपे विभूतिर्भुवनं तव ।
इह व्यष्टि शरीरेषु भान्ती तदनुपश्यसि ।। २१९।।
त्वं ब्रह्म त्वं पराशक्तिस्त्वं सर्वा अपि देवताः ।
त्वं जीवास्त्वं जगत्सर्वं त्वदन्यन्नास्ति किञ्चन ।। २२०
सती चिदम्ब नैव त्वं भावाभावविलक्षणा ।
शक्तिशक्तिमतोर्भेददर्शनादेष विभ्रमः ।। २२१ ।।
तवाम्ब जगतश्चास्य मृत्तिकाघटयोरेव ।
सम्बन्धो वेदितव्यः स्यान्न रज्जुफणिनोरिव ।। २२२ ।।
त्वं शक्तिरस्यविच्छिन्ना भावैरात्मविभूतिभिः ।
अन्तरास्तु महेन्द्रस्य शक्तस्य प्रतिबिम्बवत् ।। २२३ ।।
शक्तिर्गणपतेः काये प्रवहन्ती सनातनी ।
भारतस्य क्रियादस्य बाध्यमानस्य रक्षणम् ।। २२४ ।।
इमानि तत्त्ववादीनि वासिष्ठस्य महामुनेः ।
पथ्यावक्त्राणि सेवन्तामनन्तामभवां चितिम् ।। २२५।।
॥ इति प्रथमः स्तबकः ॥
