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काव्यकण्ठ वासिष्ठ श्री गणपति मुनि विरचितम्

इन्द्राणी सप्तसती

चतुर्थो मधुमती स्तबकः

Indrani Saptasati - The 700 Verses Mystical work of Kavyakantha Sri Ganapati Muni

“मधुमतीपादः” नामक इस अष्टम स्तबक के साथ *इन्द्राणी सप्तशती* का द्वितीय औष्णिह शतक पूर्ण होता है।


“मधुमती” नाम मधुरता, अमृतमयता और मधु के समान प्रवाहित होने वाली दिव्य वाणी का संकेत करता है। इस सम्पूर्ण स्तबक में श्री गणपति मुनि बार-बार “मम शची शरणम्—शची ही मेरी शरण हैं” इस भाव से शचीदेवी—इन्द्राणी—का आश्रय ग्रहण करते हैं।


यह स्तबक इस प्रार्थना से आरम्भ होता है कि हरि की प्रिय सहचरी की मुस्कान समस्त दिशाओं में आनन्द का विस्तार करे और भारतभूमि को पाप, दुःख तथा वेदना से बहने वाले आँसुओं से मुक्त करे। इन्द्राणी की स्तुति देवताओं के अधिपति इन्द्र की महान सहधर्मचारिणी, अपरिमित करुणा से परिपूर्ण देवी, लोकों के सौन्दर्य, समस्त ज्योतियों की ज्योति, ज्ञानियों के हृदय में प्रकाशित होने वाले अन्तरंग दीप तथा सूर्य, चन्द्रमा, नक्षत्रों और आकाश को प्रकाशित करने वाली परमशक्ति के रूप में की गई है।


इसके बाद शचीदेवी की आराधना उस सूक्ष्म विश्वतेज के रूप में की जाती है, जो सम्पूर्ण विशाल आकाश में व्याप्त है। उनके प्रकाश का एक अत्यन्त सूक्ष्म कण भी अन्धकार को दूर करने वाले दीपक, मेघ में चमकने वाली विद्युत्, शत्रुशक्तियों का नाश करने वाले वज्रायुध और हृदय को मोहित करने वाली सौम्य मुस्कान के रूप में प्रकट हो सकता है। इस प्रकार उनकी शक्ति मधुरता और महाबल, सौन्दर्य और संरक्षण, कोमलता और उग्र दैवी सामर्थ्य—इन सभी रूपों में अभिव्यक्त होती है।


मध्य के श्लोकों में उनके दिव्यरूप का अत्यन्त सुन्दर ध्यान मिलता है। वे नित्ययौवना हैं, मृत्युरहित हैं, जरा और क्षय से परे हैं, वीर पुत्रों की जननी हैं और अपने अधरों में अमृत धारण करने वाली देवी हैं। देवताओं के स्वामी भी उनके चरणों की उपासना करते हैं। उनकी श्वेत मुस्कान, नील-कृष्ण केश और अरुणवर्ण चरण प्रतीकात्मक रूप से सत्त्व, तमस् और रजस्—इन तीन गुणों का संकेत करते हैं। रूप से कृश और सुकुमार दिखाई देने पर भी वे अपने गर्भ में तीनों लोकों को धारण करने वाली सम्पूर्ण जीवजगत् की जगन्माता हैं।


अन्तिम श्लोक उनके परस्पर-विरोधी प्रतीत होने वाले गुणों से सम्पन्न अद्भुत स्वरूप को प्रकट करते हैं। वे मन से अचल हैं, वाणी में स्थिर हैं, किन्तु उनकी दृष्टि चंचल है। उनके हाथ और वचन कोमल हैं, फिर भी शक्ति में वे कठोर और अजेय हैं। उनकी भुजाएँ लताओं के समान कोमल हैं, परन्तु उनमें अपरिमित और प्रचण्ड पराक्रम विद्यमान है। अत्यन्त सुकुमार दिखाई देने पर भी सम्पूर्ण विश्व में उनकी शक्ति के समान दूसरी कोई शक्ति नहीं है। वे अपने चरणों की भक्तिपूर्वक उपासना करने वाले भक्त पर असीम करुणा बरसाती हैं, किन्तु दुष्टों के प्रति कठोर रहती हैं।


यह स्तबक इस प्रार्थना के साथ समाप्त होता है कि अमरलोक के अधिपति की प्रिय सहचरी भारतभूमि की रक्षा के लिए गणपति मुनि को शक्ति प्रदान करें। मुनि विनती करते हैं कि नित्ययौवना देवसाम्राज्ञी इन मधुर और मधु के समान प्रवाहित होने वाले श्लोकों को सुनकर अपनी कृपा प्रदान करें।


इस प्रकार यह अष्टम स्तबक शरणागति, मधुरता, दिव्य प्रकाश, विश्वरूप, रक्षणशक्ति, मातृकरुणा और राष्ट्रसेवा की भावना का सुन्दर समन्वय करने वाली महिमामयी स्तुति है। इसके साथ *इन्द्राणी सप्तशती* का द्वितीय औष्णिह शतक पूर्ण होता है।


## इस स्तबक के मुख्य विषय


• भारतभूमि से पाप, दुःख और आँसुओं को दूर करने के लिए प्रार्थना

• शचीदेवी को बार-बार परम शरण के रूप में स्वीकार करना

• सूर्य, चन्द्रमा, नक्षत्रों, आकाश और हृदय को प्रकाशित करने वाली ज्योति के रूप में उनकी स्तुति

• उनके सूक्ष्म तेज को दीपक, विद्युत्, वज्रायुध और मुस्कान के रूप में देखना

• उनके नित्ययौवन, अमृतस्वरूप, सौन्दर्य और मातृत्व का ध्यान

• श्वेत मुस्कान, नील-कृष्ण केश और अरुण चरणों को त्रिगुणों के प्रतीक रूप में देखना

• कोमल होते हुए भी अपरिमित शक्तिसम्पन्न और सौम्य होते हुए भी उग्रस्वरूपिणी देवी के विरोधाभासी गुणों का वर्णन

• भारतभूमि की रक्षा के लिए गणपति मुनि को शक्ति प्रदान करने की प्रार्थना

• *इन्द्राणी सप्तशती* के द्वितीय औष्णिह शतक की समाप्ति


॥ चतुर्थो मधुमती स्तबकः ॥


दिशि दिशि प्रसरद्द्रुचितमोदमनम् ।

हरतु मे दुरितं हरिवधूहसितम् ।। १७६ ।।


हरतु दुःखभरप्रसृतमश्रुजलम् ।

भरतभूसुदृशो बलजितो रमणी ।। १७७।।


अतितरां महिता सुरपतेर्वनिता ।

करुणया कलिता मम शची शरणम् ।। १७८ ।।


त्रिभुवनक्षितिराड्भुवनभूषणभा ।

अखिलभासकभा मम शची शरणम् ।। १७९ ।।


सततयुक्तसुधीहृदयदीपकभा ।

निखिलपाचकभा मम शची शरणम् ।। १८० ।।


रविविरोचकभा शशिविराजकभा ।

भगणशोभकभा मम शची शरणम् ।। १८१ ।।


गगनखेलकभा सकलचालकभा ।

अभयदाऽतिशुभा मम शची शरणम् ।। १८२ ।।


रुचिलवङ्गतया यदनघांशुनिधेः ।

हृततमोभवनं भवति दीपिकया ।। १८३।।


स्फुरति चारु यतः किरणमेकमिता ।

जलदसौधतले मुहुरियं चपला ।। १८४।।


भवति यद्युतितः कमपि भागमितः ।

पविररातिहरः प्रहरणेशपदम् ।। १८५।।


भवति यत्सुरुचेरणुतमांशमिता ।

युवमनोमदनी सुवदनास्मितभा ।। १८६।।


विततसूक्ष्मतनुर्महति सा गगने ।

परमपूरुषभा मम शची शरणम् ।। १८७ ।।


अमरनाथसखी रुचिनिधानमुखी ।

अमृतवर्षकदृङ मम शची शरणम् ।। १८८ ।।


अविधवा सततं युवतिरेव सदा ।

अनघवीरसुता मम शची शरणम् ।। १८९ ।।


अमृतवत्यधरे सुरधरापतये ।

चरणयोर्भजते मम शची शरणम् ।। १९० ।।


स्मितलवेषु सिता शिरसिजेष्वसिता ।

चरणयोररुणा बहिरपि त्रिगुणा ।। १९१ ।।


कपटचन्द्रमुखी प्रकृतिरिन्द्रसखी ।

मृतिजरारहिता मम शची शरणम् ।। १९२ ।।


कृशतमेप्युदरे त्रिभुवनं दधती ।

जनिमतां जननी मम शची शरणम् ।। १९३ ।।


स्थिरतरा मनसि स्थिरतमा वचसि ।

नयनयोस्तरला मम शची शरणम् ।। १९४ ।।


मृदुतरा करयोर्मृदुतमा वचसि ।

भुजबले कठिना मम शची शरणम् ।। १९५।।


मृदुलबाहुलताऽप्यमितभीमबला ।

असुरदर्पहरी मम शची शरणम् ।। १९६ ।।


अबलयाऽपि यया न सदृशोऽस्ति बले ।

जगति कश्चिदसौ मम शची शरणम् ।। १९७ ।।


अतितरां सदया पदरते मनुजे ।

खलजने परुषा मम शची शरणम् ।। १९८ ।।


गणपतिं कुरुताद्भरतभूम्यवने ।

अमरभूमिपतेः प्रियतमा सबलम् ।। १९९ ।।


मधुरशब्दततीर्मधुमतीरजरा ।

गणपतेश्शृणुयात्सुरपतेस्तरुणी ।। २०० ।।


॥ इति श्री भगवन्महर्षिरमणांतेवासिनो वासिष्ठस्य

नरसिंहसूनोः गणपतेः कृता इन्द्राणी सप्तशती

द्वितीयं औष्णिहं शतकं सम्पूर्णम् ॥

॥ इन्द्रो विश्वस्य राजति ॥

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