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काव्यकण्ठ वासिष्ठ श्री गणपति मुनि विरचितम्

इन्द्राणी सप्तसती

षष्ठं त्रैष्टुभं शतकम् - प्रथम उपजाति स्तबकः

Indrani Saptasati - The 700 Verses Mystical work of Kavyakantha Sri Ganapati Muni

यह **उपजाति स्तबक** *इन्द्राणी सप्तशती* के अत्यन्त शक्तिशाली तान्त्रिक और योगपरक अंशों में से एक है। इसमें शचीदेवी का आवाहन **प्रचण्डचण्डी** के रूप में किया गया है—ऐसी उग्र और तेजोमयी पराशक्ति, जो धर्मविरोधी शक्तियों का संहार करती हैं, पाप का नाश करती हैं, ज्ञान को जाग्रत करती हैं और भारतभूमि की रक्षा करती हैं।


यह स्तबक इस प्रार्थना से आरम्भ होता है कि जयन्त की माता शचीदेवी की मुस्कानरूपी कोमल कोंपल ऋषियों को प्रज्ञा प्रदान करे, इन्द्र को आनन्दित करे, अन्धकार का नाश करे और दुःख से पीड़ित भारतवर्ष को शुभ-मंगल प्रदान करे। इसके बाद श्री गणपति मुनि प्रचण्डचण्डी के स्वरूप को तीन प्रकार से समझाते हैं। उन्हें विशाल आकाश में व्याप्त विद्युत् के रूप में, इन्द्र की प्रिय दिव्य सहचरी के रूप में अथवा सुषुम्नामार्ग में प्रवाहित होने वाली अन्तरंग योगशक्ति के रूप में अनुभव किया जा सकता है।


शब्द और तेज—नाद और प्रकाश—का अभेद इस स्तबक की प्रमुख शिक्षा है। मुनि घोषित करते हैं कि प्रकाश से रहित शब्द कभी नहीं होता और शब्द से रहित प्रकाश भी नहीं होता। एक ही परमशक्ति तेज के रूप में प्रकाशित होती है और शब्द के रूप में स्पन्दित होती है। उनके द्वारा सम्पन्न किए जाने वाले विभिन्न कार्यों के अनुसार ऋषियों ने उन्हें काली, तारा, प्रचण्डचण्डी, ललिता, गौरी, लक्ष्मी और छिन्नमस्ता आदि नामों से वर्णित किया है। अतः ये पृथक्-पृथक् शक्तियाँ नहीं, बल्कि एक ही पराशक्ति के विविध कार्यरूप हैं।


यह स्तबक छिन्नमस्ता-तत्त्व का गम्भीर योगार्थ भी प्रस्तुत करता है। जब सुषुम्नामार्ग में प्रवाहित होने वाली शक्ति योगबल से ऊपर उठकर मस्तक में स्थित अवरोध को भेदती है, तब ज्ञानी उस अवस्था को **शिरश्छेदन** कहते हैं। इसलिए छिन्नमस्ता केवल बाहर दिखाई देने वाला एक उग्र देवीरूप नहीं हैं। वे योगशरीर में विद्युत् के समान ऊपर उठने वाली, कपालभेद उत्पन्न करने वाली और साधक के अन्तःकरण को पूर्णतः रूपान्तरित करने वाली दिव्यशक्ति हैं।


इन श्लोकों में इस शक्ति को रेणुकादेवी और परशुराम के तत्त्व, मन्त्रशास्त्र, वैदिक मन्त्र तथा वृषाकपि-दर्शन से भी सम्बद्ध किया गया है। रेणुका, प्रचण्डचण्डी, तटित्‌शक्ति और कुण्डलिनी—ये सभी भिन्न नामों से व्यक्त होने वाली एक ही परमशक्ति के रूप हैं। मन्त्र में वे नाद के रूप में, योग में सुषुम्ना में प्रवाहित होने वाली शक्ति के रूप में, आकाश में विद्युत् के रूप में और धर्मरक्षा में उग्रदेवी के रूप में कार्य करती हैं।


अन्त में श्री गणपति मुनि प्रचण्डचण्डी से प्रार्थना करते हैं कि वे पवित्र आर्यभूमि की रक्षा के लिए आवश्यक सर्वोच्च शक्ति, सामर्थ्य और कार्यसिद्धि उन्हें प्रदान करें।


इस प्रकार यह उपजाति स्तबक शब्द और प्रकाश की एकता, तान्त्रिक देवता-स्वरूपों के समन्वय, सुषुम्ना-जागरण, कपालभेद, मन्त्रसिद्धि, आन्तरिक रूपान्तरण और भारतभूमि की रक्षा—इन सभी को एक सूत्र में प्रस्तुत करने वाली अत्यन्त गम्भीर योगमयी स्तुति है।


## इस स्तबक के मुख्य विषय


• शचीदेवी की उग्र तेजोमयी पराशक्ति प्रचण्डचण्डी के रूप में आराधना

• धर्मविरोधी शक्तियों के संहार, पापनिवारण और ज्ञानजागरण के लिए प्रार्थना

• प्रचण्डचण्डी को आकाश की विद्युत्, इन्द्र की प्रिय सहचरी और सुषुम्नागामिनी शक्ति के रूप में देखना

• शब्द और तेज को एक ही पराशक्ति की दो अभिव्यक्तियाँ मानना

• काली, तारा, ललिता, गौरी, लक्ष्मी और छिन्नमस्ता के स्वरूपों की एकता

• सुषुम्नामार्ग में शक्ति-जागरण और कपालभेद से सम्बन्धित योगरहस्य

• छिन्नमस्ता को अन्तःकरण में ऊपर उठने वाली विद्युत्-शक्ति के रूप में समझाना

• रेणुका, परशुराम, मन्त्रशास्त्र, वैदिक मन्त्र और वृषाकपि-तत्त्व के साथ शक्ति का सम्बन्ध

• मन्त्रसिद्धि और आध्यात्मिक रूपान्तरण के लिए पराशक्ति का आवाहन

• भारतभूमि की रक्षा के लिए सर्वोच्च सामर्थ्य प्रदान करने की प्रार्थना


**इन्द्रो विश्वस्य राजति — इन्द्र समस्त विश्व पर शासन करते हैं।**



॥ अथ षष्ठं त्रैष्टुभं शतकम् ॥

॥ प्रथम उपजाति स्तबकः ॥


मन्दोऽपि बोधं विदधन्मुनीनां स्वच्छोऽपि रागं त्रिदशेश्वरस्य ।

अल्पोऽपि धुन्वन्हरितां तमांसि स्मिताङ्कुरो भातु जयन्तमातुः ।।


अशेषपापौघनिवारणाय भाग्यस्य पाकाय च देवराज्ञी ।

शोकाकुलां भारतभूमिमेतां लोकस्य माता हृदये करोतु ।। ५०२


धर्मद्विषामिन्द्रनिरादराणां संहारकर्मण्यतिजागरूकाम् ।

देवीं परां देवपथे ज्वलन्तीं प्रचण्डचण्डीं मनसा स्मरामि ।। ५०३


व्याप्ता तटिद्वा गगने निगूढा नारी सुरेशानमनोरमा वा ।

शक्तिः सुषुम्नापथचारिणी वा प्रचण्डचण्डीति पदस्य भावः ।।


समस्तलोकावनिनायिकायाः सुपर्वमार्गेण शरीरवत्याः ।

मातुर्महोम्‍शम् महनीयसारं विज्ञानवन्तस्तटितं भणन्ति ।। ५०५।


निगूढतेजस्तनुरम्बिकेयं प्रचण्डचण्डी परितो लसन्ती ।

अव्यक्तशब्देन शरीरवत्याः काल्याः कवीनां वचनेषु भिन्ना ।।


शब्दं विना नैव कदापि तेजस्तेजो विना नैव कदापि शब्दः ।

शक्तिद्वयं सन्ततयुक्तमेतत्कथं स्वरूपेण भवेद्विभक्तम् ।। ५०७


एकैव शक्तिर्ज्वलति प्रकृष्टा स्वरत्यपि प्राभवतः समन्तात् ।

क्रियाविभेदादिह पण्डितानां शक्तिद्वयोक्तिस्तु समर्थनीया ।।


एकक्रियायाश्च फलप्रभेदात्पुनर्विभागः क्रियते बहुज्ञैः ।

कालीं च तारां स्वरमग्र्यमाहुः प्रचण्डचण्डीं ललितां च तेजः ।।


सम्पद्यते शब्दगतेर्हि कालः शब्दो वरेण्यस्तदभाणि काली ।

ध्यातेन शब्देन भवं तरेद्यद् बुधास्ततः शब्दमुशन्ति ताराम् ।।५१०


यदक्षरं वेदविदामृषीणां वेदान्तिनां यः प्रणवो मुनीनाम् ।

गौरी पुराणेषु विपश्चितां या सा तान्त्रिकाणां वचनेन तारा ।।५११


सम्पद्यते संहृतिरोजसा यत्प्रचण्डचण्डी तदुदीरितौजः ।

सिध्येदशेषोऽनुभवो यदोजस्यतो बुधास्तां ललितां वदन्ति ।।


प्रचण्डचण्डीं लघुना पदेन चण्डीं विदुः केचन बुद्धिमन्तः ।

एके विदः श्रेष्ठमहोमयीं तां लक्ष्मीं महत्पूर्वपदां वदन्ति ।। ५१३ ।


अतीव सौम्यं ललितेति शब्दं प्रचण्डचण्डीति पदं च भीमम् ।

देवी दधाना सुतरां मनोज्ञा घोरा च नित्यं हृदि मे विभातु ।। ५१४


प्रचण्डचण्डीं तु शरीरभाजां तनूषु योगेन विभिन्नशीर्षाम् ।

शक्तिं सुषुम्नासरणौ चरन्तीं तां छिन्नमस्तां मुनयो वदन्ति ।।


कपालभेदो यदि योगवीर्यात्सम्पद्यते जीवत एव साधोः ।

तमेव सन्तः प्रवदन्ति शीर्षच्छेदं शरीरान्तरभासि शक्तेः ।। ५१६।


उदीर्यसे निर्जरराजपत्नि त्वं छिन्नमस्ता यमिनां तनूषु ।

उज्जृम्भणे विश्वसवित्रि यस्याः कायं भवेद्वैद्युतयन्त्रतुल्यम् ।।


पितुर्नियोगात्तनयेन कृत्ते मस्ते जनन्याः किल रेणुकायाः ।

त्वमाविशः पावनि तत्कबन्धं तद्वा त्वमुक्तासि निकृत्तमस्ता ।।


छिन्नं शिरः कीर्णकचं दधानां करेण कण्ठोद्गतरक्तधाराम् ।

रामाम्बिकां दुर्जनकालरात्रिं देवीं पवित्रां मनसा स्मरामि ।। ५१९


ध्रुवो रमा चन्द्रधरस्य रामा वाग्वज्रवैरोचनदीर्घनिर्ये ।

कूर्चद्वयं शस्त्रकृशानुजाये विद्यानृपाणाम् सुरराजशक्तेः ।। ५२०


मायाद्विवारं यदि सैकवर्णा विद्यैकवर्णा यदि धेनुरेका ।

धेन्वादि सम्बोधनमस्त्रमग्नेर्विलासिनी चेति धरेन्दुवर्णा ।। ५२१


चतुष्टयेत्रान्यतमं गृहीत्वा मन्त्रं महेन्द्रस्य मनोधिनाथाम् ।

भजेत यस्तान्त्रिकदिव्यभावमाश्रित्य सिद्धीः सकलाः स विन्देत्।।


संहोत्रमित्यद्भुतशक्तियुक्तं वृषाकपेर्दर्शनमम्ब मन्त्रम् ।

यो वैदिकं ते मनुजो भजेत किञ्चिन्न तस्येह जगत्यसाध्यम् ।।


प्रचण्डचण्डि प्रमदे पुराणि पुराणवीरस्य मनोधिनाथे ।

प्रयच्छ पातुं पटुतां परां मे पुण्यामिमामार्यनिवासभूमिम् ।। ५२४


प्रपञ्चराज्ञीं प्रथितप्रभावां प्रचण्डचण्डीं परिकीर्तयन्त्यः ।

एताः प्रमोदाय भवन्तु शक्तेः उपासकानाम् उपजातयो नः ।।


॥ इति प्रथमः स्तबकः ॥

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