काव्यकण्ठ वासिष्ठ श्री गणपति मुनि विरचितम्
इन्द्राणी सप्तसती
चतुर्थो मेघवितान स्तबकः

यह स्तबक शचीदेवी को **‘तटित्शक्ति’**—इन्द्र की दिव्य विद्युत्-शक्ति—के रूप में प्रकट करता है। उनका दर्शन मेघों, आकाश, जीवनशक्ति, यान्त्रिक और तकनीकी प्रक्रियाओं, प्राण तथा सूक्ष्म योगशरीर में प्रवाहित होने वाली शक्ति के रूप में किया गया है। श्री गणपति मुनि उनकी दिव्य मुस्कान का आवाहन करते हुए प्रार्थना करते हैं कि वह समस्त मलिनताओं को दूर कर दे। वे त्रिलोकजननी इन्द्राणीदेवी से दुःखग्रस्त भारतभूमि की रक्षा करने की विनती करते हैं।
आरम्भिक श्लोकों में उनके विश्वरूप का वर्णन मेघमण्डल में चमकती विद्युत् के रूप में किया गया है। उनकी बिजली सुन्दर युवतियों की मनोहर चेष्टाओं के समान आकर्षक है, किन्तु उसी समय अपरिमित शक्ति से युक्त और भयंकर भी है। वह विद्युल्लता इन्द्र को आनन्द प्रदान करती है, विरोधी शक्तियों को दबाती है, अन्धकार को दूर करती है, भक्तों के पापों को शान्त करती है और वायुमार्ग में प्रकाशित होती हुई संचरण करती है।
इस स्तबक में एक विशेष आधुनिक दृष्टि भी दिखाई देती है। दीपों, पंखों, यन्त्रों तथा अनेक अद्भुत यान्त्रिक क्रियाओं को कवि शचीदेवी की विद्युत्-किरणों की अभिव्यक्ति के रूप में देखते हैं। इसलिए वे केवल स्वर्गलोक से सम्बन्धित कोई पौराणिक देवी नहीं हैं, बल्कि विद्युत्, गति, जीवन, वाणी, श्रवण, दृष्टि और मानव के समस्त क्रियाकलापों के पीछे कार्य करने वाली जीवंत दिव्यशक्ति हैं।
इसके बाद यह स्तबक अन्तर्मुखी योगविषयों में प्रवेश करता है। अनुशासित साधना करने वाले योगियों के सूक्ष्म सुषुम्नामार्ग में वे **कुलकुण्ड की ज्वाला** के रूप में प्रज्वलित होती हैं। उनकी किरणें मस्तक में स्थित चन्द्रतत्त्व को पिघलाकर अमृतधारा को सम्पूर्ण शरीर में प्रवाहित करती हैं। यह अमृतप्रवाह शरीर को शुद्ध करता है और उसे दिव्य आनन्दावेग से भर देता है। किन्तु कवि केवल योगानन्द की ही कामना नहीं करते; वे प्रार्थना करते हैं कि देवी उन्हें दुःखित मातृभूमि की रक्षा करने के लिए निर्मल प्रज्ञा और ऐसा कर्ममार्ग प्रदान करें, जो कभी विफल न हो।
अन्तिम श्लोकों में उनकी शक्तिधाराओं को विभिन्न दिशाओं से सम्बद्ध किया गया है। वरुण की दिशा से वे गहन आध्यात्मिक आनन्दमत्तता प्रदान करती हैं, जबकि इन्द्र की दिशा से तीक्ष्ण और कार्यसिद्धि कराने वाली बुद्धि देती हैं। कवि प्रार्थना करते हैं कि आनन्द के लिए वे शुद्ध सुषुम्नामार्ग में ऊपर उठें और प्रज्ञाबल के लिए अमृतमार्ग में प्रवाहित हों।
वे दिव्यमाता से विनती करते हैं—भारतवर्ष की रक्षा करने वाला सही और अवश्य सफल होने वाला उपाय प्रकट करें; मुझे समर्थ, भक्तिपरायण और दिव्य कार्य में विजयी बनाएँ।
इस प्रकार यह स्तबक शचीदेवी को विद्युत्, प्राण, गति, तकनीकी शक्ति, कुण्डलिनी, अमृतप्रवाह और कार्यसिद्धि प्रदान करने वाली प्रज्ञाशक्ति के समन्वित स्वरूप में प्रस्तुत करने वाली एक विशिष्ट योगमयी स्तुति है।
## इस स्तबक के मुख्य विषय
• शचीदेवी को दिव्य विद्युत्-शक्ति—तटित्शक्ति—के रूप में देखना
• उनकी विद्युत् को सौन्दर्य, प्रचण्ड शक्ति, संरक्षण और शुद्धि के स्वरूप में वर्णित करना
• बिजली, दीप, पंखों, यन्त्रों और गतिशक्ति के पीछे कार्य करने वाली दिव्यशक्ति के रूप में इन्द्राणी का दर्शन
• वृक्षों, पशुओं, मनुष्यों, वाणी, श्रवण और दृष्टि को चेतना प्रदान करने वाली शक्ति के रूप में उनकी स्तुति
• कुलकुण्ड की ज्वाला और सुषुम्नामार्ग में जाग्रत होने वाली योगशक्ति के रूप में उनका दर्शन
• उनकी जाग्रत किरणों से मस्तक से सम्पूर्ण शरीर में प्रवाहित होने वाली अमृतधारा
• केवल योगानन्द ही नहीं, बल्कि व्यावहारिक और निर्मल प्रज्ञा की प्राप्ति के लिए प्रार्थना
• भारतभूमि की रक्षा का अचूक और उचित मार्ग प्रकट करने का आवाहन
• दिव्यसेवा में शक्तिशाली, भक्तिपरायण और सफल बनाने की प्रार्थना
**इन्द्रो विश्वस्य राजति — इन्द्र समस्त विश्व पर शासन करते हैं।**
॥ चतुर्थो मेघवितान स्तबकः ॥
अमरक्षितिपालकचेतो मदनं सदनं शुचितायाः ।
स्मितमादिवधूवदनोत्त्थं हरतादखिलं कलुषं मे ।। ४७६।।
सुतरामधनामतिखिन्ना मधुना बहुलं विलपन्तीम् ।
परिपातु जगत्त्रयनेत्री भरतक्षितिमिन्द्रपुरन्ध्री ।। ४७७ ।।
स्थलमेतदमर्त्यनृपाल प्र मदे तव मेघवितानम् ।
अयि यत्र परिस्फुरसीशे तटिदुज्ज्वलवेषधरा त्वम् ।। ४७८ ।।
तटिता तव भौतिकतन्वा जितमम्बुधरे विलसन्त्या ।
उपमा भुवि या ललितानां युवचित्तहृतां वनितानाम् ।। ४७९ ।।
स्फुरितं तव लोचनहारि स्तनितं तव धीरगभीरम् ।
रमणीयतया मिलित ा ते शचि भीकरता चपलायाः ।। ४८० ।।
चपले शचि विस्फुरसीन्द्रं घनजालपतिं मदयन्ती ।
दितिजातमवग्रहसंज्ञं जनदुःखकरं दमयन्ती ।। ४८१।।
प्रभुमभ्रपतिं रमयन्ती दुरितं नमतां शमयन्ती ।
हरितां तिमिराणि हरन्ती पवमानपथे विलसन्ती ।। ४८२ ।।
अलघुस्तनितं विदधाना बलमुग्रतमं च दधाना ।
हृदयावरकं मम माया पटलं तटिदाशु धुनोतु ।। ४८३।।
सुरपार्थिवजीवितनाथे निखिले गगने प्रवहन्त्याः ।
तटितस्तव वीचिषु काचिच्चपला लसतीह पयोदे ।। ४८४।।
विबुधप्रणुते धनिकानां भवनेषु भवन्त्ययि दीपाः ।
पटुयन्त्रबलादुदितानां तव देवि लवाः किरणानाम् ।। ४८५।।
व्यजनानि च चालयसि त्वं बत सर्वजगन्नृपजाये ।
विबुधोऽभिदधात्वथवा को महतां चरितस्य रहस्यम् ।। ४८६।।
इह चालित ईड्यमनीषैः अयि यन्त्रविशेषविधिज्ञैः ।
बहुलाद्भुतकार्यकलापः तटितस्तव मातरधीनः ।। ४८७।।
अचरस्तरुगुल्मलतादिः सकलश्च चरो भुवि जन्तुः ।
अनिति प्रमदे सुरभर्तुः तटितस्तव देवि बलेन ।। ४८८ ।।
मनुते निखिलोऽपि भवत्या मनुजोऽनिति वक्तिशृणोति ।
अवलोकयते च भणामः किमु ते जगदम्ब विभूतिम् ।। ४८९।।
अतिसूक्ष्मपवित्रसुषुम्ना पथतस्तनुषु प्रयतानाम् ।
कुलकुण्डकृशानुशिखा त्वं ज्वलसि त्रिदशालयनाथे ।। ४९० ।।
इतरो न सुरक्षितिपालात् कुलकुण्डगतो ज्वलनोऽयम् ।
इतरेन्द्रविलासिनि न त्वत् कुलकुण्डकृषानुशिखेयम् ।। ४९१ ।।
कुलकुण्डकृशानुशिखायाः किरणैः शिरसि स्थित एषः ।
द्रवतीन्दुरनारतमेतद् वपुरात्ममयं विदधानः ।। ४९२ ।।
मदकृद्बहुलामृतधारा परिपूतमिदं मम कायम् ।
विदधासि भजन्मनुजाप्ते कुलकुण्डधनंजयदीप्ते ।। ४९३ ।।
शिरसीह सतः सितभानोरमृतेन वपुर्मदमेति ।
हृदि भात इनस्य च भासा मतिमेतु परां शचि चेतः ।। ४९४।।
मम योगमदेन न तृप्तिर् निजदेशदशाव्यथितस्य ।
अवगन्तुमुपायममोघं शचि भासय मे हृदि भानुम् ।। ४९५।।
विदितः प्रमदस्य विधातुः शशिनो जनयित्रि विलासः ।
अहमुत्सुक ईश्वरि भानोर् विभवस्य च वेत्तुमियत्ताम् ।। ४९६ ।।
वरुणस्य दिशि प्रवहन्ती मदमम्ब करोषि महान्तम् ।
दिशि वज्रभृतः प्रवहन्ती कुरु बुद्धिमकुण्ठितसिद्धिम् ।। ४९७ ।।
अमलामधिरुह्य सुषुम्नां प्रवहस्यधुनाम्ब मदाय ।
अमृतामधिरुह्य च किञ्चित् प्रवहेश्वरि बुद्धिबलाय ।। ४९८।।
भरतक्षितिरक्षणकर्मण्यभिधाय मनोज्ञमुपायम् ।
अथ देवि विधाय च शक्तं कुरु मां कृतिनं शचि भक्तम् ।। ४९९
नरसिंहसुतेन कवीनां विभुना रचितैः कमनीयैः ।
परितृप्यतु मेघवितानैः मरुतामधिपस्य पुरन्ध्री ।। ५०० ।।
॥ इति श्रीभगवन्महर्षिरमणांतेवासिनो वासिष्ठस्य
नरसिंहसूनोः गणपतेः कृता इन्द्राणी सप्तशती
पञ्चमं पाङ्क्तम् शतकं समाप्तम् ॥
इन्द्रो विश्वस्य राजति ॥
