काव्यकण्ठ वासिष्ठ श्री गणपति मुनि विरचितम्
इन्द्राणी सप्तसती
तृतीयो मणिराग स्तबकः

यह स्तबक पुरन्दर इन्द्र की प्रिय साम्राज्ञी शचीदेवी—इन्द्राणी—के दिव्य स्वरूप का पवित्र वर्णन करने वाला **दिव्यरूप-वर्णन** है। श्री गणपति मुनि इस प्रार्थना के साथ स्तबक का आरम्भ करते हैं कि समस्त ज्योतियों को निरन्तर शान्ति प्रदान करने वाली उनकी निर्मल मुस्कान की एक अत्यन्त सूक्ष्म प्रकाश-किरण भी उनके पाप को दूर कर दे। इसके बाद वे देवी का आवाहन सज्जनों के दुःखों का नाश करने वाली और भारतवर्ष की पीड़ा को दूर करने वाली करुणामयी माता के रूप में करते हैं।
इन श्लोकों में दिव्यमाता के कमलचरणों से लेकर उनके मस्तक तक प्रत्येक अंग को दिव्यशक्ति का अधिष्ठान मानकर उसकी उपासना की गई है। उनके चरण तेजस्वी, सुन्दर, देवताओं द्वारा पूजित और प्रणाम करने वालों के पापों को नष्ट करने वाले पवित्र आश्रय के रूप में स्तुत किए गए हैं। उनकी जंघाएँ, कटि, नाभि, भुजाएँ, कण्ठ, मुख, नेत्र, नासिका, कपोल, कान, ललाट, अधर, मुस्कान और केश—इन सबका अत्यन्त कोमल और उत्कृष्ट काव्यचित्रों के माध्यम से वर्णन किया गया है। किन्तु यह केवल शारीरिक सौन्दर्य का वर्णन नहीं है; देवी का प्रत्येक अंग किसी न किसी विश्वतत्त्व को अभिव्यक्त करता है।
उनके कटिप्रदेश की तुलना पृथ्वी के विस्तार से, मध्यभाग की आकाश के व्यापक फैलाव से और नाभि की समस्त लोकों के केन्द्रबिन्दु से की गई है। उनके स्तनों को अमृतमय पोषण धारण करने वाले स्वर्णपात्रों के रूप में वर्णित किया गया है। कवि देखते हैं कि उनमें लोकों का पालन करने वाली शक्ति और सृष्टि की रक्षा के लिए इन्द्र को सामर्थ्य प्रदान करने वाली महाशक्ति निहित है। पुष्पमालाओं के समान कोमल उनकी भुजाएँ विरोधी शक्तियों का संहार करने वाले प्रचण्ड पराक्रम से भी सम्पन्न हैं।
यह स्तबक शचीदेवी को **त्रिगुणात्मिका प्रकृति** के रूप में भी प्रस्तुत करता है। उनकी मुस्कान का श्वेत वर्ण सत्त्व का, नील-कृष्ण केश तमस् का और अरुण अधर रजस् का प्रतीक हैं। वे स्वर्गलोक के समस्त सौन्दर्य की सारस्वरूपिणी, इन्द्र के नेत्रों का परम सौभाग्य और भारतवर्ष की रक्षा के लिए नरसिंह के पुत्र श्री गणपति मुनि को समर्थ बनाने वाली जगन्माता के रूप में पूजित होती हैं।
इस प्रकार यह स्तबक केवल दिव्यमाता के शारीरिक सौन्दर्य का वर्णन नहीं करता। यह उनके प्रत्येक अंग में निहित विश्वशक्ति, पोषणतत्त्व, संरक्षण-सामर्थ्य, त्रिगुणमयी प्रकृति और परम मातृत्व को प्रकट करता है। इसमें सौन्दर्य ही शक्ति, कोमलता ही पराक्रम और दिव्यरूप ही विश्वरूप के रूप में दिखाई देता है।
## इस स्तबक के मुख्य विषय
• इन्द्राणी के दिव्य स्वरूप का पवित्र अंग-वर्णन
• पापों का नाश करने वाले आश्रय के रूप में उनके कमलचरणों की उपासना
• उनके शरीर के प्रत्येक अंग में विश्वतत्त्वों का प्रतीकात्मक दर्शन
• लोकों का पालन और संरक्षण करने वाली दिव्यशक्ति के रूप में उनकी स्तुति
• कोमल सौन्दर्य के ही अपरिमित शक्ति के रूप में प्रकट होने की शिक्षा
• श्वेत मुस्कान, नील केश और अरुण अधरों के माध्यम से त्रिगुणमयी प्रकृति का दर्शन
• भारतवर्ष की रक्षा के लिए श्री गणपति मुनि को शक्ति प्रदान करने की प्रार्थना
**इन्द्रो विश्वस्य राजति — इन्द्र समस्त विश्व पर शासन करते हैं।**
॥ तृतीयो मणिराग स्तबकः ॥
ज्योतिषां नृपतिः सकलानां शान्तिमेव सदाभिदधानः ।
निर्मलो हरतात्सुरराज्ञी मन्दहासलवो मम पापम् ।। ४५१ ।।
दुष्टलोकदविष्ठपदाब्जा शिष्टशोकनिवारणदक्षा ।
नाकलोकमहीपतिरामा भारतस्य धुनोत्वसुखानि ।। ४५२ ।।
देवमौलिमणीकिरणेभ्यो विक्रमं स्वयमेव ददाना ।
देवराजवधूपदपद्म श्रीस्तनोतु सदा मम भद्रम् ।। ४५३ ।।
देवि ते वदनं बहुकान्तं साक्षि तत्र पुरन्दरचेतः ।
अम्ब ते चरणावतिकान्तावत्र साक्षि मनः स्मरतां नः ।। ४५४।।
भासुरं सुरसंहतिवन्द्यं सुन्दरं हरिलोचनहारि ।
पावनं नतपापविद ारि स्वर्गराज्ञि पदं तव सेवे ।। ४५५।।
जङ्घिके जयतस्तव मातः सङ्घ एव रुचां यदधीनः ।
वासवस्य दृशां च सहस्रं यद्विलोकनलोभविनम्रम् ।। ४५६ ।।
सक्थिनी तव वासवकान्ते रामणीयकसारनिशान्ते ।
वन्दते विनयेन ममेयं वन्दिनस्तव पावनि वाणी ।। ४५७।।
इन्द्रनारि कटिस्तव पृथ्वीमण्डलस्यतुला महनीये ।
मध्यमो नभसः प्रतिमानं भोगिनां भुवन स्य च नाभिः ।। ४५८ ।।
धीरतां कुरुते विगतासुं सा सुपर्वपतेर्निशिताग्रा ।
सा तवाम्ब मनोभवशस्त्री रोमराजिरघं मम हन्तु ।। ४५९।।
रोमराजिभुजङ्गशिशुस्ते देवि देवपतेर्हृदयस्य ।
दंशनेन करोत्ययि मोहं जीविताय चिराय विचित्रम् ।। ४६० ।।
पूर्णहेमघटाविव शक्रावाहितां दधतावयि शक्तिम् ।
विश्वपोषणकर्मणि दक्षावम्ब दुग्धधरौ जयतस्ते ।। ४६१।।
लोकमातरुरोरुहपूर्णस्वर्णकुम्भगता तव शक्तिः ।
लोकपालनकर्मणि वीर्यं देवि वज्रधरस्य बिभर्ति ।। ४६२।।
अक्षयामृतपूर्णघटौ ते शक्रपत्नि कुचौ तव पीत्वा ।
लोकबाधकभीकररक्षो धूनने प्रबभूव जयन्तः ।। ४६३ ।।
हस्तयोस्तव मार्दवमिन्द्रो भाषतां सुषमामपि देवः ।
दातृतामनयोर्मुनिवर्गो वर्णयत्यजरे पटुतां च ।। ४६४।।
पुष्पमाल्यमृदोरपि बाहोः शक्तिरुग्रतमाशरनाशे ।
दृश्यते जगतामधिपे ते भाषतां तव कस्तनुतत्त्वम् ।। ४६५।।
कम्बुकण्ठि तवेश्वरि कण्ठस्तारहारवितानविराजी ।
देवराड्भुजलोचनपथ्यो देवि मे भणताद्बहुभद्रम् ।। ४६६ ।।
आननस्य गभस्तिनिधेस्ते रामणीयकमद्भुतमीष्टे ।
अप्यमर्त्यनुताखिलसिद्धेर्वासवस्य वशीकरणाय ।। ४६७।।
न प्रसन्नमलं रविबिम्बम् चन्द्रबिम्बमतीव न भाति ।
सुप्रसन्नमहोज्वलमास्यं केन पावनि ते तुलयामः ।। ४६८ ।।
लोचने तव लोकसवित्रि ज्योतिषश्शवसश्चनिधाने ।
वक्तुमब्जसमे ननु लज्जे धोरणीमनुसृत्य कवीनाम् ।। ४६९।।
आयतोज्ज्वलपक्ष्मलनेत्रा चम्पकप्रसवोपमनासा ।
रत्नदर्पणरम्यकपोला श्रीलिपिद्युतिसुन्दरकर्णा ।। ४७० ।।
अष्टमीशशिभासुरभाला विष्टपत्रयचालकलीला ।
स्मेरचारुमुखी सुरभर्तुः प्रेयसी विदधातु शिवं मे ।। ४७१।।
मन्दहासलवेषु वलक्षा मेचका चिकुरप्रकरेषु ।
शोणतामधरे दधती सा रक्षतु प्रकृतिस्त्रिगुणा नः ।। ४७२।।
सर्वलोकवधूजनमध्ये यां श्रुतिस्सुभगामभिधत्ते ।
या दिवो जगतो रुचिसारस्तां नमामि पुरन्दररामाम् ।। ४७३ ।।
स्वर्गभूपतिलोचनभाग्यश्रीश्शरीरवती जलजाक्षी ।
भारतस्य करोतु समर्थं रक्षणे नरसिंहतनूजम् ।। ४७४ ।।
लोकमातुरिमे रमणीयाः पाकशासनचित्तरमण्याः ।
अर्पिताः पदयोर्विजयन्तां सत्कवेः कृतयो मणिरागाः ।। ४७५।।
॥ इति तृतीयस्तबकः ॥
