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काव्यकण्ठ वासिष्ठ श्री गणपति मुनि विरचितम्

इन्द्राणी सप्तसती

द्वितीयो मनोरमा स्तबकः

Indrani Saptasati - The 700 Verses Mystical work of Kavyakantha Sri Ganapati Muni

इस स्तबक में शचीदेवी—इन्द्राणी—का दर्शन उस महाविश्वजननी के रूप में किया गया है, जिनका दिव्य शरीर स्वयं अनन्त आकाश-विस्तार है। प्रार्थना की गई है कि उनकी मुस्कान आक्रमणकारी पापशक्तियों का नाश करे और प्रचुर शुभ-मंगल प्रदान करे। कवि करुणामयी दिव्यमाता से विनती करते हैं कि वे भारतभूमि को समृद्ध, तेजस्वी और अक्षय कीर्ति-वैभव से प्रकाशित करें।


दिव्यमाता का **विश्वरूप-दर्शन** ही इस स्तबक का प्रमुख भाव है। कवि घोषित करते हैं कि उनका कोई पृथक् निवास या भवन नहीं है, क्योंकि समस्त लोक और सभी देवालय उनके दिव्य शरीर के भीतर ही स्थित हैं। उनके शरीर को **‘पुष्कर’**—अनन्त और प्रकाशमय महाविस्तार—कहा गया है। उस विराट् विस्तार में असंख्य सूर्य, चन्द्रमा, ग्रह और लोक समाए हुए हैं। सामान्य मन उनकी शक्ति का परिमाण नहीं कर सकता और परम अन्तर्दृष्टि से रहित व्यक्ति उनके वास्तविक स्वरूप का दर्शन नहीं कर सकता। फिर भी हमारे चारों ओर व्याप्त आकाश के रूप में वे हमसे अत्यन्त निकट हैं।


श्री गणपति मुनि बताते हैं कि जिसे लोग “विश्व” कहते हैं, वह वास्तव में उनका अपरिमित दिव्य शरीर ही है। जो कुछ दृश्य विषय के रूप में दिखाई देता है, वह सब उन्हीं से प्रकट होता है। नक्षत्रों से भरा यह विशाल आकाश भी उनकी अभिव्यक्ति का केवल एक अंश है। ऋषियों ने इस महान प्रकाश-विस्तार को **महोजगत्**—तेजोमय महान लोक—कहा है।


इस स्तबक में एक सूक्ष्म वेदान्तिक और उपनिषद्-दृष्टि भी प्रस्तुत की गई है। जो परम सत्ता स्वयं किसी अन्य आधार पर आश्रित हुए बिना सम्पूर्ण दृश्य सृष्टि की आधारभूता है, उसे ‘सत्यलोक’ और ‘परमपुरुष’ कहा गया है। प्राचीन ऋषियों ने इस विश्व-विस्तार को ‘आपः’ कहा तथा श्रुति ने उसे ‘विराट्’ नाम से भी निरूपित किया है। उन्हें विराट्पुरुष की वधू कहा जाए अथवा किसी अन्य अभिव्यक्ति में पुरुष कहा जाए—दोनों नाम उनके परम विश्वरूप को ही उचित रूप से सूचित करते हैं।


स्त्री और पुरुष की धारणा से सम्बन्धित एक महत्त्वपूर्ण शिक्षा भी इस स्तबक में मिलती है। जीवों का अन्तःस्थ सत्य न स्त्री है और न पुरुष। स्त्री-पुरुष का भेद केवल देह के रूपों से सम्बन्धित है। आकाश परमेश्वर की शक्ति को धारण करता है और समस्त लोकों के बीजों को अपने भीतर सँजोए रहता है; इसलिए उसका वर्णन स्त्रीरूप और पुरुषरूप दोनों में किया जा सकता है। इस प्रकार शचीदेवी सामान्य लिंगभेदों से परे हैं, फिर भी सुन्दर विश्व-साम्राज्ञी के रूप में अभिव्यक्त होती हैं।


अन्त में यह स्तबक एक हृदयस्पर्शी प्रार्थना के साथ समाप्त होता है कि दिव्यमाता की किरणें देहरूपी गुहा में प्रवेश करें और भारतभूमि की रक्षा रूपी अपने दिव्य कार्य को सम्पन्न करने के लिए गणपति मुनि को तेजस्वी तथा शक्तिशाली बनाएँ।


इस प्रकार यह स्तबक दिव्यमाता के अनन्त व्योमशरीर, विश्वरूप, वेदान्ततत्त्व, स्त्री-पुरुष भेद से परे उनके स्वरूप और भारतवर्ष की रक्षा के लिए आवश्यक दिव्यशक्ति का गम्भीर समन्वय प्रस्तुत करने वाली महिमामयी स्तुति है।


## इस स्तबक के मुख्य विषय


• शचीदेवी की मुस्कान से पाप का नाश और शुभ-मंगल की प्राप्ति के लिए प्रार्थना

• भारतभूमि को अक्षय सम्पदा, तेज और कीर्ति प्रदान करने का आवाहन

• समस्त लोकों और देवालयों को अपने भीतर धारण करने वाले विश्वशरीर के रूप में इन्द्राणी का दर्शन

• उनके शरीर को **‘पुष्कर’**—अनन्त प्रकाश-विस्तार—के रूप में वर्णित करना

• असंख्य सूर्य, चन्द्रमा, ग्रह और लोक उनके भीतर स्थित हैं—यह उद्घोषणा

• सम्पूर्ण विश्व को उनके अपरिमित दृश्यरूप के रूप में देखना

• उन्हें विराट्, सत्यलोक और परम विश्वतत्त्व के साथ एकीकृत करना

• जीवों के अन्तःस्थ सत्य को स्त्री-पुरुष भेद से परे बताना

• भारतवर्ष की रक्षा के लिए गणपति मुनि को उनकी दिव्य किरणों द्वारा शक्तिशाली बनाने की प्रार्थना


**इन्द्रो विश्वस्य राजति — इन्द्र समस्त विश्व पर शासन करते हैं।**



॥ द्वितीयो मनोरमा स्तबकः ॥


हसितमाततायिपातक प्रमथनप्रसिद्धविक्रमम् ।

अमरभूमिपालयोषितो मम करोतु भूरिमङ्गलम् ।। ४२६ ।।


करुणया प्रचोदिता क्रियाद् भरतभूमिमक्षयश्रियम् ।

चरणकञ्जराजदिन्दिरा सुरनरेश्वरस्य सुन्दरी ।। ४२७।।


न भवनं न वा जगत् पृथक् निवसनाय ते सुरार्चिते ।

यदखिलानि विष्टपानि ते वपुषि सर्वमन्दिराणि च ।। ४२८ ।।


मतिदविष्ठसीमभासुरं तव शरीरमेव पुष्करम् ।

परमपूरुषस्य वल्लभे भुवनमेकमुच्यते बुधैः ।। ४२९।।


तरणयस्सुधांशवस्तथा सह भुवा ग्रहाः सहस्रशः ।

अयि जगन्ति विस्तृतानि ते वपुषि पुष्करे जगत्यजे ।। ४३०।।


बहुभिरुष्णभानुभिर्हृतात् बहुभिरिन्दुभिर्वशीकृतात् ।

वियति लोकजालधात्रि ते शतगुणं बलं प्रशिष्यते ।। ४३१ ।।


न विभुरेककस्य भास्वतो विभवमेव ना प्रभाषितुम् ।

किमुत ते दधासि योदरे द्युतिमतां शतानि तादृशाम् ।। ४३२।।


इह विहायसा शरीरिणीम् अतिसमीपवासिनीमपि ।

न खलु कोऽपि लोकितुं प्रभुर्भगवतीं परामयुक्तधीः ।। ४३३ ।।


तदिदमुच्यते जनो जगद् वपुरमेयमादिदेवि ते ।

जनयते यतोऽखिलं दृशोर्विषयभूतमेतदाततम् ।। ४३४।।


बहुलतारकागणैर्युतं किमपि खं तवेह वर्ष्मणि ।

शचि विभज्य भाषयैकया सुकवयो महोजगद्विदुः ।। ४३५।।


इदमिनेन्दुभूविलक्षणैः दिनकरैस्सुधाकरैर्ग्रहैः ।

बहुजगद्भिरन्वितं महो जगदशेषधात्रि नैककम् ।। ४३६।।


अजरमव्ययं सनातनं मुनिजनैकवेद्यवैभवम् ।

न भवतीं विना तपोजगत् पृथगशेषनाथनायिके ।। ४३७।।


सकलदृश्यमूलकारणं तव च संश्रयो निराश्रयः ।

जननि सत्यलोक संज्ञया परमपूरुषोऽभिधीयते ।। ४३८ ।।


अयि पुरातनर्षिभाषया गगनमेतदाप ईरिताः ।

अथ यदासुवीर्यमुज्झितं भगवतस्त्वमेव तत्परे ।। ४३९।।


शचि विराड्भवत्यभाषत श्रुतिरपीदमेव नाम ते ।

विततविश्वविग्रहात्मनि प्रथितमेतदाह्वयं परम् ।। ४४०।।


उपनिषद्गिरा विराड्वधूः पुरुष एष भाषयान्यया ।

उभयथापि साधु तत्पदं भवति ते न संशयास्पदम् ।। ४४१ ।।


न वनिता न वा पुमान् भवेज्जगति योऽन्तरश्शरीरिणाम् ।

तनुषु लिङ्गभेददर्शनात् तनुमतश्च लिङ्गमुच्यते ।। ४४२।।


अखिलनाथवीर्यधारणाद् गगनभूमिरङ्गनामता ।

सकललोकबीजभृत्त्वतो गगनदेश एष पूरुषः ।। ४४३।।


स्फुटविभक्तगात्रलक्ष्मणां नियतवादिनामदर्शनात् ।

न पुरुषो वियद्यथा वयं न वनिता वियद्यथैव नः ।। ४४४।।


अभिविमानतोऽथ वा शची विबुधराजयोर्विलक्षणात् ।

वरविलासिनी वियत्तनुः सदविकारमुत्तमः पुमान् ।। ४४५।।


हृदयमल्पमप्यदो जनन्यनवमं विशालपुष्करात् ।

विमलदेहदुर्गमध्यगं सकलराज्ञि सौधमस्तु ते ।। ४४६।।


विकसितं निजांशुवीचिभिर्हृदयमालयं विशाम्ब मे ।

विकचमुष्णभानुभानुभिर्दशशतच्छदं यथा रमा ।। ४४७ ।।


हृदयसाधुसौधशायिनीं नयनरम्यहर्म्यचारिणीम् ।

भुवनराजचित्तमोहिनीं नमत तां परां विलासिनीम् ।। ४४८ ।।


तव परे मरीचिवीचयस्तनुगुहां प्रविश्य विश्रुते ।

भरतभूमिरक्षणोद्यतं गणपतिं क्रियासुरुज्ज्वलम् ।। ४४९।।


गणपतेर्मनोरमा इमाः सुगुणवेदिनां मनोरमाः ।

अवहिता शृणोतु सादरं सुरमहीपतेर्मनोरमाः ।। ४५०।।


॥ इति द्वितीयः स्तबकः ॥

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