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काव्यकण्ठ वासिष्ठ श्री गणपति मुनि विरचितम्

इन्द्राणी सप्तसती

पञ्चमं पाङ्क्तं शतकम् - प्रथमो मयूरसारिणी स्तबकः

Indrani Saptasati - The 700 Verses Mystical work of Kavyakantha Sri Ganapati Muni

यह स्तबक शचीदेवी को उस एकमात्र परमशक्ति के रूप में प्रकट करने वाली गम्भीर स्तुति है, जिनकी आराधना अनेक वैदिक और तान्त्रिक नामों से की जाती है। श्री गणपति मुनि इस प्रार्थना के साथ स्तबक का आरम्भ करते हैं कि इन्द्राणीदेवी के कमल-सदृश मुख पर प्रकाशित सौम्य मुस्कान विपत्तियों को दूर करे, पापों का शोधन करे और भारतभूमि को तेजस्वी बनाए।


अनेक दैवी नामों और रूपों के पीछे विद्यमान एकता ही इस स्तबक की प्रमुख शिक्षा है। विभिन्न ऋषियों ने ‘वृषाकपि’ नाम की अनेक प्रकार से व्याख्या की है। कुछ ने वृषाकपि को सूर्य के रूप में देखा, कुछ ने शिव, विष्णु, ब्रह्मणस्पति अथवा गणपति के रूप में। अन्य ऋषियों ने इस नाम को वर्षा, विद्युत् और विश्वमंगल प्रदान करने वाली दिव्यशक्ति से जोड़ा। मुनि स्पष्ट करते हैं कि ये परस्पर विरोधी धारणाएँ नहीं हैं, बल्कि सर्वव्यापी एक ही परमशक्ति के विभिन्न ऋषिदर्शन हैं।


शचीदेवी को अदिति, पृश्नि, भद्रा, शिवा, गौरी, सावित्री, द्यौः, प्रचण्डचण्डिका और वज्रशक्ति के स्वरूप में प्रतिष्ठित किया गया है। ‘शची’ नाम की स्तुति स्वयं उस पवित्र और प्राचीन नाम के रूप में की गई है, जो सर्वत्र व्याप्त दिव्यशक्ति का संकेत करता है। यह स्तबक बताता है कि जो व्यक्ति उनके नाम का जप करता है, आकाश के समान विस्तृत उनके विश्वरूप की उपासना करता है अथवा उनके दिव्य विग्रह का ध्यान करता है, वह पापों के प्रभाव से सुरक्षित रहता है।


आगे के श्लोकों में देवी के दिव्य रूप का अत्यन्त सुन्दर वर्णन किया गया है। उनका मुख पूर्णचन्द्र के समान, नेत्र कमलदल के समान, मुस्कान निर्मल, केश काले वर्षामेघों के समान, कपोल रत्नों की भाँति चमकदार, नासिका चम्पकपुष्प जैसी और दाँत चमेली की कलियों के समान हैं। उनका शरीर सुवर्णमयी कान्ति से प्रकाशित है और वे श्वेत वस्त्र धारण करती हैं। वे एक हाथ से वर प्रदान करती हुई और दूसरे हाथ से भय दूर करती हुई दिखाई देती हैं। समस्त देवताओं द्वारा पूजित उनके कमलचरण उनकी दिव्य महिमा के परम प्रतीक हैं।


अन्त में मुनि प्रार्थना करते हैं कि भारतवर्ष के आँसू पोंछने और धर्म की रक्षा करने के लिए आवश्यक शक्ति उन्हें प्राप्त हो। वे यह भी विनती करते हैं कि अपने कर्मों के माध्यम से वे शक्र के मन को मोहित करने वाली कमलनयनी दिव्यमाता को प्रसन्न कर सकें।


इस प्रकार यह स्तबक अनेक दैवी नामों के पीछे विद्यमान एक ही परमशक्ति को प्रकट करते हुए वैदिक और तान्त्रिक दर्शनों का समन्वय करता है। यह शचीनाम की महिमा, उनके व्योमशरीर का ध्यान, दिव्यरूप की उपासना, धर्मरक्षा और भारतवर्ष के अभ्युदय—इन सभी को एक साथ प्रस्तुत करने वाली महिमामयी स्तुति है।


## इस स्तबक के मुख्य विषय


• अनेक दैवी नामों के पीछे विद्यमान एक ही परमशक्ति के रूप में शचीदेवी का दर्शन

• वृषाकपि नाम से सम्बन्धित विभिन्न ऋषि-व्याख्याओं का समन्वय

• शचीदेवी को अदिति, पृश्नि, भद्रा, शिवा, गौरी, सावित्री, द्यौः और चण्डिका के स्वरूप में प्रतिष्ठित करना

• ‘शची’ को सर्वव्यापी दिव्यशक्ति का संकेत करने वाले प्राचीन और पवित्र नाम के रूप में स्तुत करना

• ‘शची’ नाम का जप पापों को दूर करके संरक्षण प्रदान करता है—यह शिक्षा

• आकाश के समान विस्तृत उनके व्योमशरीर का ध्यान

• पूर्णचन्द्र-सदृश मुख, कमलनेत्र, निर्मल मुस्कान, मेघसदृश केश और सुवर्णमय शरीर से दिव्यमाता के स्वरूप का वर्णन

• वरप्रदायिनी, अभयप्रदायिनी और देवताओं द्वारा पूजित जगन्माता के रूप में उनकी उपासना

• भारतवर्ष के आँसू पोंछने और धर्म की रक्षा करने के लिए शक्ति प्रदान करने की प्रार्थना


**इन्द्रो विश्वस्य राजति — इन्द्र समस्त विश्व पर शासन करते हैं।**



॥ अथ पञ्चमं पाङ्क्तं शतकम् ॥

॥ प्रथमो मयूरसारिणी स्तबकः ॥


प्रेमवासभूमिरच्छभावः स्थानमानमज्जनाघहामे ।

इन्द्रसुन्दरी मुखाब्जभासी मन्दहास आपदं धुनोतु ।। ४०१ ।।


वीक्षितैः कृपान्वितैर्हरन्ती पातकानि मङ्गलं भणन्ती ।

जम्भभेदिजीवितेश्वरी मे जन्मदेशमुज्ज्वलं करोतु ।। ४०२।।


अम्बरं च देवतानतभ्रूः अम्ब ते तनुद्वयं यदुक्तम् ।

आदिमा तयोर्वृषाकपिं तं देव्यजीजनत्परा जयन्तम् ।। ४०३।।


एतमेव देवि लोकबन्धुं सूरयो वृषाकपिं भणन्ति ।

वर्षहेतुदीधितिर्वृषायं कं पिबन् करैः कपिर्निरुक्तः ।। ४०४।।


केचिदिन्द्रनारि चन्द्ररेखाशेखरं वृषाकपिं गदन्ति ।

पण्डिताः परे तु शेषशय्या शायिनं वृषाकपिं तमाहुः ।। ४०५।।


ब्रह्मणस्पतिं तु वैद्युताग्नेः अंशजम् मरुद्गणेषु मुख्यम् ।

विश्वराज्ञि विघ्नराजमेके विश्रुतं वृषाकपिं वदन्ति ।। ४०६।।


भास्करश्च शङ्करश्च मातर्माधवश्च मन्त्रनायकश्च ।

आत्मजेषु ते न सन्ति नान्तर् व्यापकान्तरिक्षविग्रहायाः ।। ४०७।


वासवोऽपि देवि देवतात्मा वल्लभस्तव च्छलाङ्गनायाः ।

आत्मजात एव कीर्तनीयो देवतापथेन देहवत्याः ।। ४०८।।


साशवस्युदीरितासि धीरैः देहिनी विहायसेन्द्रसूस्त्वम् ।

लिङ्गभेदतोऽनुरूपतस्तत्कीर्तनम् शवो हि शक्तिवाचि ।। ४०९।।


नादितिर्विभिद्यते शवस्यास्सर्वदेव मातरं विदुर्याम् ।

सा मरुत्प्रसूरभाणि पृश्निः सापि भिद्यते ततो न देव्याः ।। ४१० ।


शक्तिरेव सा न्यगादि पृश्नि श्शक्तिरेव साऽदितिर्न्यभानि ।

शक्तिरेव साऽभ्यधायि भद्रा शक्तिरेव सा शवस्यवादि ।। ४११।


विज्जनः प्रकृष्टशक्तिभागं शब्दमेव पृश्विमाह धेनुम् ।

या परैर्बुधैरभाणि गौरी मानवेष्टभाषयैव नारी ।। ४१२ ।।


व्यापकत्वकल्पितं विशालं देशमेव शक्तिभागमाहुः ।

बुद्धिशालिनोऽदितिं सवित्रीं या परैर्विचक्षणैः स्मृता द्यौः ।। ४१३


नित्यमोदरूपशक्तिभागं पण्डिताः प्रकीर्तयन्ति भद्राम् ।

उक्तिभेदचातुरीप्रलुब्धाः सूरयः परे शिवां जुगुर्याम् ।। ४१४ ।।


वीर्यरूपभाग एव गण्यः पण्डितैः शवस्यभाणि शक्तेः ।

ओजसो न सोऽतिरिच्यतेंशो भिद्यते ततो न वज्रमुग्रम् ।। ४१५।।


वज्रमेव भाषया परेषामुच्यते प्रचण्डचण्डिकेति ।

यद्विभूतिलेशचुम्बितात्मा जीयते न केनचित्पृथिव्याम् ।। ४१६ ।


सर्वतो गतिश्शचीति शक्तिः कीर्त्यते बुधैरुदारकीर्तिः ।

सर्वभागवाचकं पदं तत् पावनं पुरातनं प्रियं नः ।। ४१७ ।।


यश्शचीति नामकीर्तयेन्ना पुष्करेण ते शरीरवत्याः ।

दिव्यसुन्दरी तनोरुताहो तं पराभवेन्न देवि पापम् ।। ४१८ ।।


अम्बरं वरं तवाम्ब कायं यस्सदा विलोकयन्नुपास्ते ।

लोकजालचक्रवर्तिजाये तं पराभवेन्न देवि पापम् ।। ४१९ ।।


पूर्णिमासुधांशुबिम्बवक्त्रं फुल्लवारिजातपत्रनेत्रम् ।

शुभ्रतानिधानमन्दहासं कालमेघकल्पकेशपाशम् ।। ४२० ।।


रत्नदर्पणाभमञ्जुगण्डं चम्पकप्रसूनचारुनासम् ।

कुन्दकुड्मलाभकान्तदन्तं कल्पपल्लवाभदन्तचेलम् ।। ४२१ ।।


सद्वराभयप्रदायिहस्तं सर्वदेववन्द्यपादकञ्जम् ।

दिव्यरत्नभूषणैरनर्घैर्भूषितम् कनत्सुवर्णवर्णम् ।। ४२२ ।।


दिव्यशुक्लवस्त्रयुग्मधारि स्वर्गसार्वभौमनेत्रहारि ।

यः स्मरेद्वराङ्गनावपुस्ते तं पराभवेन्न देवि पापम् ।। ४२३ ।।


भारतक्षितेरिदं जनन्या श्शोकजन्यबाष्पवारि हर्तुम् ।

देहि शक्तिमाश्रिताय मह्यं पाहि धर्ममिन्द्रचित्तनाथे ।। ४२४ ।।


सद्वसिष्ठसन्ततेरिमाभिस्सत्कवेर्मयूरसारिणीभिः ।

सम्मदं प्रयातु शक्रचेतस्सम्प्रमोहिनीसरोजनेत्रा ।। ४२५।।


॥ इति प्रथमः स्तबकः ॥

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