काव्यकण्ठ वासिष्ठ श्री गणपति मुनि विरचितम्
इन्द्राणी सप्तसती
चतुर्थो मात्रासमक स्तबकः

यह स्तबक विजयी इन्द्र की प्रिय सहचरी तथा मानव-शरीर में गुप्त रूप से प्रकाशित होने वाली दिव्यशक्ति शचीदेवी—इन्द्राणी—की एक गम्भीर योगमयी स्तुति है। श्री गणपति मुनि प्रार्थना करते हैं कि उनकी श्वेतवर्ण, अत्यन्त सूक्ष्म और सर्वव्यापी दिव्य मुस्कान मोह के अन्धकार को पूर्णतः दूर कर दे। वे लोकसाम्राज्ञी से विनती करते हैं कि निरन्तर पीड़ा से कराह रही भारतभूमि—‘भारतक्षोणि’—की अपनी करुणा से रक्षा करें।
इस स्तबक की प्रमुख शिक्षा सुप्तशक्ति और जाग्रतशक्ति के बीच का अन्तर है। दिव्यमाता शरीर में सोई हुई अवस्था में भी विद्यमान रहती हैं, और उनसे प्रस्फुटित होने वाले अत्यन्त अल्प तेज के कारण ही मनुष्य सोच पाता है, बोल पाता है, देखता है, सुनता है और जीवित रहता है। किन्तु जब वे जाग्रत होती हैं, तब उनकी शक्ति अपरिमित रूप से अभिव्यक्त होती है। मुनि बताते हैं कि शरीर में वे नाड़ियों के बन्धनों और अहंभाव के आवरण से ढकी रहती हैं। इसलिए तपस्या के दो मार्ग बताए गए हैं—एक नाड़ी-बन्धनों को दूर करता है और दूसरा मिथ्या व्यक्तित्वरूप अहंकार के बन्धन का नाश करता है।
यह स्तबक उन अनेक मार्गों को भी प्रकट करता है, जिनके द्वारा दिव्यमाता साधक के भीतर जाग्रत होती हैं। जब मन अपने मूल में विश्राम करता है, जब वाणी अपने उद्गम-स्थान में लौटकर लीन हो जाती है, जब दृष्टि बाह्य विषयों से हटकर अपनी सूक्ष्म ज्योति में स्थित होती है, जब श्रवणशक्ति अन्तर्नाद की ओर मुड़ती है और जब प्राण की गति का अनुशासित भाव से निरीक्षण किया जाता है—तब प्रत्येक अवस्था में शचीदेवी साधक के भीतर जागकर अपनी दिव्य लीला प्रकट करती हैं।
इन श्लोकों में सामान्य मन से उत्पन्न कर्म और आत्मा से उत्पन्न कर्म के बीच का सूक्ष्म भेद भी समझाया गया है। जब अहंभाव मन में स्थापित रहता है, तब मन स्वयं को कर्ता मानता है और ऐसा कर्म सीमित रहता है। किन्तु जब “मैं” का भाव आत्मा में स्थित हो जाता है, तब आत्मा ही कर्ता के रूप में प्रकाशित होती है। ऐसा कर्म महान, शक्तिशाली और दिव्य बन जाता है।
इस स्तबक में निहित योग-संकेत अत्यन्त विशिष्ट हैं। मस्तक को चन्द्रमा से, हृदय को सूर्य से, नेत्रों को विद्युत् से और कुण्ड को अग्नि से सम्बद्ध किया गया है। दिव्यमाता का ध्यान मस्तक, नेत्रों, हृदय अथवा अग्निकेन्द्र में किया जा सकता है। इस प्रकार उनका ध्यान करने वाला साधक धन्य और सम्मान के योग्य बनता है। मन्त्रजप की भी इस स्तबक में महिमापूर्वक स्तुति की गई है। जो भक्त उनके मन्त्र का ज्ञानपूर्वक जप करता है, वह उनकी करुणा का पात्र बनकर समस्त मंगलकारी सिद्धियों को प्राप्त करता है।
अन्त में कवि हृदयविदारक वेदना के साथ भारतवर्ष को विभाजित, दुर्बल और अन्नाभाव से पीड़ित बताते हैं। वे इन्द्र की प्रिय सहचरी से प्रार्थना करते हैं कि ऐसी भारतभूमि की रक्षा करने योग्य शक्ति उन्हें प्रदान करें।
इस प्रकार यह स्तबक कुण्डलिनी-जागरण, नाड़ीशुद्धि, अहंकार से मुक्ति, अन्तर्मुखता, प्राण-निरीक्षण, आत्मकर्तृत्व, मन्त्रजप और राष्ट्ररक्षा की भावना का समन्वय करने वाली गम्भीर योगमयी स्तुति है।
## इस स्तबक के मुख्य विषय
• शचीदेवी के श्वेत दिव्यतेज से मोह के अन्धकार को दूर करने की प्रार्थना
• पीड़ा से कराह रही भारतक्षोणि की रक्षा के लिए आवाहन
• सुप्तशक्ति और जाग्रतशक्ति के बीच के भेद का निरूपण
• सुप्त शक्ति के कारण ही विचार, वाणी, दृष्टि, श्रवण और जीवन सम्भव होने की शिक्षा
• नाड़ी-बन्धन और अहंकार-बन्धन को दूर करने वाली द्विविध तपस्या
• मन, वाणी, दृष्टि, अन्तर्नाद और प्राणगति के माध्यम से शक्ति-जागरण
• मन-आधारित कर्म और आत्मा-आधारित दिव्य कर्म के बीच का अन्तर
• मस्तक में चन्द्रमा, हृदय में सूर्य, नेत्रों में विद्युत् और कुण्ड में अग्नि के योग-संकेत
• दिव्यमाता की कृपा प्राप्त करने के साधन के रूप में मन्त्रजप
• भारतवर्ष की रक्षा के लिए कवि को शक्ति प्रदान करने की प्रार्थना
॥ चतुर्थो मात्रासमक स्तबकः ॥
शुक्लज्योतिः प्रकरैर्व्याप्तः सूक्ष्मोऽप्यन्तान् हरितां हासः ।
जिष्णोः पत्न्यास्तिमिरारातिर्निःशेषम्मे हरतान्मोहम् ।। ३७६ ।।
शृण्वत्कर्णा सदयालोका लोकेन्द्रस्य प्रियनारी सा ।
नित्याक्रोशैर्विरुदद्वाणीं पायादेतां भरतक्षोणीम् ।। ३७७ ।।
देवेषु स्वः परिदीप्यन्ती भूतेष्विन्दौ परिखेलन्ती ।
शक्तिर्जिष्णोर्द्विपदां सङ्घे हन्तैतस्यां भुवि निद्राति ।। ३७८ ।।
निद्राणाया अपि ते ज्योतिर्गन्धादेते धरणीलोके ।
मर्त्याः किञ्चत्प्रभवन्तीशे त्वं बुद्धा चेत्किमु वक्तव्यम् ।। ३७९।।
मेघच्छन्नोऽप्यरुणस्तेजो द द्यादेव प्रमदे जिष्णोः ।
अत्रस्थानां भवतीग्रन्थिच्छन्नाप्येवं कुरुते प्रज्ञाम् ।। ३८० ।।
ध्यायामो यत्कथयामो यत्पश्यामो यच्छृणुमो यच्च ।
जीवामो वा तदिदं सर्वं निद्राणाया अपि ते भासा ।। ३८१।।
नाडीबन्धादभिमानाच्च च्छन्ना मातर्भवती देहे ।
एकापायादितरो नश्येत्तस्माद् द्वेधा तपसः पन्थाः ।। ३८२।।
चित्तं यस्य स्वजन िस्थाने प्रज्ञा बाह्या न भवेद्यस्य ।
आधत्से त्वं भुवनाधीशे बुद्धा क्रीडां हृदये तस्य ।। ३८३।।
वाणी यस्य स्वजनिस्थाने दूरे कृत्वा मनसा सङ्गम् ।
मातस्तत्र प्रतिबुद्धा त्वं श्लोकैर्लोकं कुरुषे बुद्धम् ।। ३८४ ।।
हित्वा दृश्यान्यतिसूक्ष्मायां चक्षुर्यस्य स्वमहो वृत्तौ ।
विश्वाऽलिप्ता जगतां मातर्जाग्रत्यस्मिन्नचला भासि ।। ३८५।।
शृण्वन् कर्णो दयिते जिष्णोरन्तः शब्दं ध्रियते यस्य ।
बुद्धा भूत्वा वियता साधोरेकीभावं कुरुषे तस्य ।। ३८६।।
यातायातं सततं पश्येद्यः प्राणस्य प्रयतो मर्त्यः ।
विश्वस्येष्टां तनुषे क्रीडां तस्मिन् बुद्धा तरुणीन्द्रस्य ।। ३८७।।
स्वान्तं यस्य प्रभवेत्कार्येष्वम्बैतस्मिन्नयि निद्रासि ।
आत्मा यस्य प्रभवेत्कार्येष्वम्बैतस्मिन्नयि जागर्षि ।। ३८८ ।।
यस्याऽहन्ता भवति स्वान्ते तस्य स्वान्तं प्रभवेत्कर्तुम् ।
यस्याऽहन्ता भवति स्वात्मन्यात्मा तस्य प्रभवेत्कर्तुम् ।। ३८९।।
स्वान्तं यस्य प्रभवेत्कर्तुं तत्कर्माल्पं भवति व्यष्टेः ।
आत्मा यस्य प्रभवेत्कर्तुं तच्छ्लाघ्यम् ते बलजित्कान्ते ।। ३९० ।
एतत्स्वान्तं हृदयाज्जातं शीर्षे वासं पृथगाधाय ।
हार्दाहन्तां स्वयमाक्रम्य भ्रान्तानस्मान् कुरुते मातः ।। ३९१ ।।
अस्माकं भोः कुरुते बाधामस्मज्योतिर्जननि प्राप्य ।
स्वान्ते नैतत्कृतमन्याय्यं कान्ते जिष्णोः शृणु राज्ञि त्वम् ।। ३९२
स्वान्ते तेजो हृदयादायाच्चन्द्रे तेजो दिनभर्तुर्वा ।
आश्रान्तं यो मनुते धीरस्तस्य स्वान्तं हृदि लीनं स्यात् ।। ३९३ ।।
मूलान्वेषिस्फुरदावृत्तं नीचैरायात्कबलीकृत्य ।
जानन्त्येका हृदयस्थाने युञ् जानानां ज्वलसीशाने ।। ३९४।।
शीर्षे चन्द्रो हृदये भानुर्नेत्रे विद्युत्कुलकुण्डेऽग्निः ।
सम्पद्यन्ते महसोंशैस्ते जिष्णोः कान्ते सुतरां शस्ते ।। ३९५।।
मन्वानां त्वां शिरसि स्थाने पश्यन्तीं वा नयनस्थाने ।
चेतन्तीं वा हृदयस्थाने राजन्तीं वा ज्वलनस्थाने ।। ३९६ ।।
यो ना ध्यायेज्जगतां मातः कश्चिच्छ्रेयानवनौ नाऽतः ।
पूतं वन्द्यं चरणं तस्य श्रेष्ठं वर्ण्यम् चरितं तस्य ।। ३९७।।
दोग्ध्रीं मायां रसनां वा यो मन्त्रं मातर्जपति प्राज्ञः ।
सोऽयं पात्रं करुणायास्ते सर्वं काम्यं लभते हस्ते ।। ३९८।।
छिन्नां भिन्नां सुतरां सन्नामन्नाभावादभितः खिन्नाम् ।
एतां पातुं भरतक्षोणीं जाये जिष्णोः कुरु मां शक्तम् ।। ३९९ ।।
क्लुप्तैः सम्यग्बृहतीछन्दस्येतैर्मात्रासमकैर्वृत्तैः ।
कर्णाध्वानं प्रविशद्भिस्सा पौलोम्यम्बापरितृप्तास्तु ।। ४०० ।।
॥ इति श्रीभगवन्महर्षिरमणांतेवासिनो वासिष्ठस्य
नरसिंहसूनोः गणपतेः कृता इन्द्राणी सप्तशती
चतुर्थं बार्हतं शतकं समाप्तम् ॥
॥ इन्द्रो विश्वस्य राजति ॥
