काव्यकण्ठ वासिष्ठ श्री गणपति मुनि विरचितम्
इन्द्राणी सप्तसती
तृतीयो मणिमध्या स्तबकः

यह स्तबक इन्द्र की दिव्यशक्ति—‘वासवशक्ति’—की महिमामयी स्तुति है, जो प्रकाश, अमृत, बल, प्राण, प्रज्ञा और आध्यात्मिक सामर्थ्य के रूप में प्रवाहित होने वाली पराशक्ति है। श्री गणपति मुनि प्रार्थना करते हैं कि लोकसाम्राज्ञी इन्द्राणीदेवी की मुस्कान की एक अत्यन्त सूक्ष्म प्रकाश-किरण भी शुभ, मंगल, धैर्य और वीरतापूर्ण शक्ति प्रदान करे। वे विनती करते हैं कि उनकी करुणामयी दृष्टि भारतभूमि के दुःख को दूर कर दे।
आरम्भिक श्लोकों में दिव्यमाता की कृपादृष्टि और वाणी के अनेक स्वरूपों का वर्णन किया गया है। उनकी दृष्टि योगियों को पवित्र करती है, देवताओं के लिए तेजस्वी होकर प्रकाशित होती है, भक्तों को शीतलता और शान्ति प्रदान करती है तथा इन्द्र के हृदय को मोहित करती है। उनकी वाणी धैर्य, सांत्वना, आनन्द और दिव्य प्रेरणा देती है। चन्द्रमा के समान मुख, मेघों के समान केश, कमलों के समान नेत्र, स्वर्णमयी कान्ति, निर्मल मुस्कान और दिव्य आभूषणों के माध्यम से उनके सौन्दर्य का अत्यन्त मनोहर चित्रण किया गया है।
इसके बाद यह स्तबक एक गम्भीर अन्तर्मुखी योगप्रार्थना का रूप धारण कर लेता है। दिव्यमाता का आवाहन केवल बाहर पूजी जाने वाली देवी के रूप में नहीं, बल्कि साधक के भीतर प्रवेश करने वाली जीवंत ‘वासवशक्ति की तरंग’ के रूप में किया जाता है। यह दिव्यशक्ति दुःख को शुद्ध करती है, आन्तरिक अन्धकार को दूर करती है, मन को संस्कारित करती है, प्राणबल को बढ़ाती है, भीतर की ग्रन्थियों को भेदती है, मस्तक के उच्चतर केन्द्र को खोलती है, मोह को नष्ट करती है और शरीर को वज्र के समान दृढ़ बनाती है। उन्हें ऐसी शक्ति के रूप में देखा गया है, जो आकाश से मस्तक में प्रवेश करके वहाँ से दिव्य धाराओं के रूप में सम्पूर्ण शरीर में फैल जाती है।
इस स्तबक में तीन प्रकार की शक्तियों से सम्बन्धित एक विशेष शिक्षा भी मिलती है। सूर्य के समान ज्ञानप्रकाश, दिव्य अमृत के समान आनन्द और सोम के समान पवित्र दैवी उन्मेष—ये तीनों वासवशक्ति में अन्तर्निहित हैं। कवि प्रार्थना करते हैं कि यह शक्ति उनके भीतर सत्य को प्रकट करे, श्रेष्ठ आनन्द का पोषण करे और दिव्य प्रेरणा का विस्तार करे।
योग और भक्ति के मार्गों के बीच के सम्बन्ध को भी यह स्तबक अत्यन्त सुन्दर ढंग से समझाता है। कुछ साधकों में योगानुशासन और नियमबद्ध साधना द्वारा शक्ति का विकास होता है, जबकि अन्य साधकों में भक्ति, स्तुति और कीर्तन के माध्यम से वह विस्तार पाती है। मुनि बताते हैं कि योगबल से जिस फल की प्राप्ति में अनेक वर्ष लग सकते हैं, दिव्यमाता की कृपा वही फल भक्त को अत्यन्त शीघ्र प्रदान कर सकती है। इसलिए वे प्रार्थना करते हैं कि योग, ध्यान, भक्ति अथवा कीर्तन—किसी भी मार्ग से लोककल्याणकारी वासवशक्ति उनके शरीर में विस्तृत हो।
अन्त में यह स्तबक इस प्रार्थना के साथ समाप्त होता है कि दुःख से पीड़ित और अपनी समृद्धि खो चुकी भारतभूमि की समस्त जनों के कल्याण के लिए रक्षा करने की शक्ति और योग्यता दिव्यमाता उन्हें प्रदान करें।
इस प्रकार यह स्तबक दिव्य कृपादृष्टि, वाणी की प्रेरणा, प्राणशक्ति, योगपरिवर्तन, भक्ति, ज्ञानप्रकाश और राष्ट्ररक्षा की भावना का समन्वय करने वाली महाशक्तिमयी स्तुति है।
## इस स्तबक के मुख्य विषय
• शुभ, धैर्य और वीरतापूर्ण बल के लिए इन्द्राणी की मुस्कान का आवाहन
• भारतभूमि के दुःख को दूर करने के लिए प्रार्थना
• उनकी कृपादृष्टि को पवित्रीकरण, प्रकाश, शीतलता और आकर्षण की शक्ति के रूप में वर्णित करना
• उन्हें धैर्य, सांत्वना, आनन्द और प्रेरणा प्रदान करने वाली वाणी के रूप में स्तुत करना
• साधक के भीतर प्रवेश करके आन्तरिक परिवर्तन लाने वाली वासवशक्ति का आवाहन
• आन्तरिक ग्रन्थियों के भेदन, शिरोकेन्द्र के विकास, मनःशुद्धि और वज्रसदृश देहस्थैर्य से सम्बन्धित योग-संकेत
• आकाश से मस्तक में प्रवेश कर सम्पूर्ण शरीर में फैलने वाली दिव्यशक्ति की धारा
• ज्ञानप्रकाश, अमृतमय आनन्द और दिव्य प्रेरणा—इन तीन शक्तियों का निरूपण
• योग, ध्यान, भक्ति और कीर्तन द्वारा शक्ति के विकास की शिक्षा
• भारतवर्ष की रक्षा के लिए कवि को शक्ति और योग्यता प्रदान करने की प्रार्थना
॥ तृतीयो मणिमध्या स्तबकः ॥
मङ्गलधायी पुण्यवतां मन्मथधायी देवपतेः ।
विष्टपराज्ञीहासलवो विक्रमधायी मे भवतु ।। ३५१ ।।
दृष्टिविशेषैश्शीततरैर्भूर्यनुकम्पैः पुण्यतमैः ।
भारतभूम ेस्तापततिं वासवकान्ता सा हरतु ।। ३५२।।
पावनदृष्टिर्योगिहिता भासुरदृष्टिर्देवहिता ।
शीतलदृष्टिर्भक्तहिता मोहनदृष्टिश्शक्रहिता ।। ३५३ ।।
उज्ज्वलवाणी विक्रमदा वत्सलवाणी सान्त्वनदा ।
मञ्जुलवाणी सम्मददा पन्नगवेणी सा जयति ।। ३५४।।
शारदराकाचन्द्रमुखी तोयदमालाकारकचा ।
मेचकपाथोजातदलश्रीहरचक्षुर्वासिकृपा ।। ३५५ ॥
चम्पकनासागण्डविभामण्डलखेलत्कुण्डलभा ।
उक्तिषु वीणाबिम्बफलश्रीहरदन्तप्रावरणा ।। ३५६।।
निर्मलहासक्षालितदिग्भित्तिसमूहा मोहहरी ।
काञ्चनमालाशोभिगला सन्ततलीला बुद्धिकला ।।३५७
विष्टपधारि क्षीरधरस्वर्णघटश्रीहारिकुचा ।
कापि बिडौजो राज्यरमा चेतसि माता भातु मम ।।३५८
दिव्यसुधोर्मिर्भक्तिमतां पावककीला पापकृताम् ।
व्योम्नि चरन्ती शक्रसखी शक्तिरमोघा मामवतु ।। ३५९
सम्मदयन्ती सर्वतनुं संशमयन्ती पापततिम् ।
सम्प्रथयन्ती सर्वमतीस्सङ्घटयन्ती प्राणबलम् ।। ३६० ।
निर्जितशोकाधूततमास्संस्कृतचित्ता शुद्धतमा ।
वासवशक्तेर्व्योमजुषः काचन वीचिर्मां विशतु ।। ३६१।।
उद्गतकीलं मूलमिदं भिन्नकपालं शीर्षमिदम् ।
उज्झित मोहं चित्तमिदं वासवशक्तिर्मां विशतु ।।३६२।।
दृश्यविरक्तं चक्षुरिदं भोगविरक्तं कायमिदम् ।
ध्येयविरक्ता बुद्धिरियं वासवशक्तिर्मां विशतु ।। ३६३
चक्षुरदृश्यज्वालभृता व्यापकखेन प्रोल्लसता ।
विस्मृतकायं सन्दधती वासवशक्तिर्मां विशतु ।। ३६४।।
कायमजस्रं वज्रदृढं बुद्धिमशेषे व्याप्तिमतीम् ।
दिव्यतरङ्गैरादधती वासवशक्तिर्मां विशतु ।। ३६५।।
मूर्ध्नि पतन्ती व्योमतलात्सन्ततमन्तः सर्वतनौ ।
सम्प्रवहन्ती दिव्यझरैर्वासवशक्तिर्मां विशतु ।। ३६६।।
भानुविभायां भासकता दिव्यसुधायां मोदकता ।
काऽपि सुरायां मादकता वासवशक्तयां तत्त्रितयम् ।।
भासय तान्मे सम्यगृतं मोदमुदारं पुष्यतु मे ।
साधुमदं मे वर्धयतान्निर्जरभर्तुः शक्तिरजा ।। ३६८ ।।
कश्चन शक्तिं योगबलादात्मशरीरे वर्धयति ।
एषि विवृद्धिम् भक्तिमतः कस्यचिदेशे त्वं वपुषि ।।३६९
साधयतां वा योगविदां कीर्तयतां वा भक्तिमताम् ।
वत्सलभावादिन्द्रवधूर्गर्भभुवां वा याति वशम् ।। ३७०
यस्य समाधिः कोऽपि भवेदात्ममन ीषा तस्य बलम् ।
यस्तव पादाम्भोजरतस्तस्य खलु त्वं देवि बलम् ।। ३७१
द्वादशवर्षी योगबलाद्या खलु शक्तिर्युक्तमतेः ।
तां शचि दातुं भक्तिमते कापि घटी ते मातरलम् ।।३७२
योगबलाद्वा ध्यानकृतो भक्तिबलाद्वा कीर्तयतः ।
यातु विवृद्धिं विश्वहिता वासवशक्तिर्मे वपुषि ।। ३७३
दुःखितमेतच्छ्रीरहितं भारतखण्डं सर्वहितम् ।
त्रातुमधीशा स्वर्जगतः सुक्षमबुद्धिं मां कुरुताम् ।। ३७४
सन्तु कवीनां भर्तुरिमे सुन्दरबन्धाशुद्धतमाः ।
सन्मणिमध्याः स्वर्जगतो राजमहिष्याः कर्णसुखाः ।।
॥ इति तृतीयस्तबकः ॥
