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काव्यकण्ठ वासिष्ठ श्री गणपति मुनि विरचितम्

इन्द्राणी सप्तसती

तृतीयो मौक्तिकमाला स्तबकः

Indrani Saptasati - The 700 Verses Mystical work of Kavyakantha Sri Ganapati Muni

यह **मौक्तिकमाला स्तबक** वासव इन्द्र की प्रिय सहचरी तथा त्रिलोकजननी शचीदेवी—इन्द्राणी—की तेजोमयी स्तुति है। श्री गणपति मुनि प्रार्थना करते हैं कि उनकी निर्मल दिव्य मुस्कान उनकी रक्षा करे, समस्त दिशाओं को पवित्र बनाए और सज्जनों के हृदयों में प्रकाशित हो। वे करुणामयी जगन्माता से धन और सामर्थ्य खोकर दुर्बल हो चुकी भारतभूमि की रक्षा करने की विनती करते हैं।


यह स्तबक शचीदेवी को उस पराशक्ति के रूप में प्रकट करता है, जो समस्त जीवों और विभिन्न साधनामार्गों में गुप्त रूप से कार्य करती हैं। मन्त्रसाधकों में वे वाणी के रूप में निवास करती हैं; ध्यानसाधकों के मन में प्रकाशमान होती हैं; भक्तों के हृदयों में स्पन्दित होती हैं; और पराम्बा के रूप में अनन्त आकाश में विचरण करती हैं। योगियों में वे संयम, स्त्रियों में सौन्दर्य, ज्ञानियों में पूर्णता, वीरों में तीक्ष्ण दृष्टि, विषयासक्त लोगों में निद्रा तथा ध्यानमग्न साधकों में मुद्रा के रूप में अभिव्यक्त होती हैं।


मुनि उन्हें दिव्य आयुधों के पीछे कार्य करने वाली शक्ति के रूप में भी देखते हैं। विष्णु के सुदर्शनचक्र, शिव के त्रिशूल और इन्द्र के वज्रायुध में सक्रिय पराक्रम उन्हीं का है। विशाल आकाश में गुप्त रूप से स्थित होकर वे सूर्य में तेज, चन्द्रमा में शीतलता और यज्ञाग्नि में पवित्रीकरण की शक्ति के रूप में प्रकाशित होती हैं। अनन्त आकाश को उनका शरीर, सूर्य को उनका पुत्र और पृथ्वी को उनकी महान पुत्री के रूप में वर्णित किया गया है।


इस स्तबक का एक विशिष्ट श्लोक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। उसमें कहा गया है कि जब मेघ अपेक्षित जलवृष्टि न करें, तब शचीदेवी की निर्मल कीर्ति का गान ही वर्षा प्रदान करने में समर्थ हो सकता है। शरीर रोग से दुर्बल हो जाने पर भी उनके पवित्र नाम की स्तुति प्राणों की रक्षा करने वाली दिव्यशक्ति के रूप में की गई है।


अन्त में यह स्तबक इस प्रार्थना के साथ समाप्त होता है कि शचीदेवी भारतवर्ष का दुःख दूर करने के लिए उचित प्रज्ञा, अवश्य सफल होने वाला कार्यमार्ग और पवित्र दैवी कार्य की सिद्धि प्रदान करें।


इस प्रकार यह मौक्तिकमाला स्तबक मन्त्र, ध्यान, भक्ति, योग, ज्ञान, कर्मशक्ति, प्रकृति, दिव्य आयुध, वर्षा-प्रदान, नाममहिमा और राष्ट्ररक्षा को एक ही पराशक्ति की विविध अभिव्यक्तियों के रूप में प्रस्तुत करने वाली महिमामयी स्तुति है।


## इस स्तबक के मुख्य विषय


• शचीदेवी की निर्मल मुस्कान से संरक्षण, शुद्धि और आन्तरिक प्रकाश की प्राप्ति के लिए प्रार्थना

• दुर्बल हो चुकी भारतभूमि की रक्षा के लिए आवाहन

• मन्त्र, ध्यान, भक्ति, योग, ज्ञान और कर्म में उनकी उपस्थिति

• योगियों में संयम, स्त्रियों में सौन्दर्य और ज्ञानियों में पूर्णता के रूप में उनकी अभिव्यक्ति

• विष्णु के चक्र, शिव के त्रिशूल और इन्द्र के वज्र के पीछे सक्रिय दिव्यशक्ति के रूप में उनका दर्शन

• आकाश को उनका शरीर तथा सूर्य और पृथ्वी को उनकी दिव्य अभिव्यक्तियों के रूप में वर्णित करना

• शचीदेवी की कीर्ति का गान वर्षा प्रदान कर सकता है—यह शिक्षा

• रोगग्रस्त शरीर में भी प्राणों की रक्षा करने वाली उनके पवित्र नाम की महिमा

• भारतवर्ष का दुःख दूर करने के लिए उचित प्रज्ञा, अचूक उपाय और कार्यसिद्धि की प्रार्थना


**इन्द्रो विश्वस्य राजति — इन्द्र समस्त विश्व पर शासन करते हैं।**



॥ तृतीयो मौक्तिकमाला स्तबकः ॥


निर्मलभासां दिशि दिशि कर्ता पुण्यमतीनां हृदि हृदि धर्ता ।

पालयतान्मामनघविलासः शक्रमहिष्याः सितदरहासः ।। ५५१ ।


पुण्यचरित्रा मुनिजनगीता वासवकान्ता त्रिभुवनमाता ।

वत्सलभावादवतु विदूनां भारतभूमिं धनबलहीनाम् ।। ५५२ ।।


कोटितटिद्वत्तव तनुकान्तिः पूर्णसमाधेस्तव हृदि शान्तिः ।

वासवभामे भगवति घोरः शत्रुविदारी तव भुजसारः ।। ५५३ ।।


आश्रयभूतं सुमधुरताया आलयभूतं जलधिसुतायाः ।

वासवदृष्टेस्तवमुखमब्जं किङ्करदृष्टेस्तव पदमब्जम् ।। ५५४ ।।


पादसरोजं वृजिनहरं ते यो भजते ना सुरपतिकान्ते ।

तत्र कटाक्षा अयि शतशस्ते तस्य समस्तं भगवति हस्ते ।। ५५५


ज्ञापकशक्तिः प्रतिनरमस्तं कारकशक्तिः प्रतिनरहस्तम् ।

वासवचक्षुस्सुकृतफलश्रीर्भातु ममान्तः सुरभुवनश्रीः ।। ५५६ ।।


मन्त्रपराणां वचसि वसन्ती ध्यानपराणां मनसि लसन्ती ।

भक्तिपराणां हृदि विहरन्ती भाति पराम्बा नभसि चरन्ती ।।५५७


सेवकपापप्रशमननामा दिक्तिमिरौघप्रमथनधामा ।

उज्ज्वलशस्त्रा रणभुवि भीमा पातु नतं मां हरिहयरामा ।। ५५८


योगिनि शक्तिर्विलससि दान्तिः योषितिशक्तिर्विलससि कान्तिः

ज्ञानिनि शक्तिर्विलससि तुष्टिः धन्विनि शक्तिर्विलससि दृष्टिः ।।


सङ्गिनि शक्तिर्विलससि निद्रा ध्यातरि शक्तिर्विलससि मुद्रा ।

वासवकान्ते गगननिशान्ते भाषितुमीशः क्व नु विभवं ते ।। ५६०


यद्दितिजानां दमनमवक्रं केशवहस्ते विलसति चक्रम् ।

तत्र कला ते भगवति भद्रा काचन भारं वहति विनिद्रा ।। ५६१।


दुष्टनिशाटप्रशमनशीलं यत् सितभूभृत्पतिकरशूलम् ।

तत्र महोम्शस्तव जगदीशे राजति कश्चित्पटुररिनाशे ।। ५६२।।


यन्निजरोचिर्हृतरिपुसारं वासवहस्ते कुलिशमुदारम् ।

तत्र तवांशो विलसति दिव्यः कश्चन भासो भगवति भव्यः ।।५६३


अम्बरदेशे सुमहति गुप्ता पङ्कजबन्धौ विलसति दीप्ता ।

राजसि मातर्हिमरुचिशीता वेदिकृशानौ क्रतुभृतिपूता ।। ५६४।।


सूक्ष्मरजोभिर्विहितमुदारं यज्जगदेतद्गगगनमपारम् ।

तत्तववेदः प्रवदति कायं पावनि भानुस्तव तनुजोऽयम् ।। ५६५।।


ईश्वरि नैकस्तव खरतेजाः तेऽपि च सर्वे जननि तनूजाः ।

उज्वलखेटाः कुवदति कायाः पावनि कस्ते प्रवदतु मायाः ।। ५६६


या महिमानं प्रथयति भूमिः पावनकीर्तिर्जलनिधिनेमिः ।

सेयमपीशे भवति सुपुत्री वासवजाये तव जनधात्री ।। ५६७ ।।


अङ्ग सखायो विरमतसङ्गाद्दुर्विषयाणां कृतमतिभङ्गात् ।

ध्यायत चित्ते धुतभयबीजं वासवजायाचरणसरोजम् ।। ५६८ ।।


पापमशेषं सपदि विहातुं शक्तिमनल्पामपि परिधातुम् ।

चेतसि साधो कुरु परिपूतं वासवजायापदजलजातम् ।। ५६९।।


ईश्वरि वन्द्यद्युतिभृतिमेघे काङ्घितनीराण्यसृजति मोघे ।

निर्मलकीर्तेस्तव शचि गानं शक्ष्यति कर्तुं तदुदकदानम् ।। ५७०


आमयवीर्याद्विगलति सारे जीवति किञ्चिद्रसनगनीरे ।

रक्षति जन्तुं तव शचि नाम प्राज्ञजनैरप्यगणितधाम ।। ६७१।।


मध्यमलोके स्यति शुचिरुग्रा राजसि नाके विभवसमग्रा ।

प्राणिशरीरे भवसि विचित्रा वासवजाये विविधचरित्रा ।। ५७२।।


व्योम्नि वपुस्ते विनिहतपापं विश्रुतलीलं तव दिवि रूपम् ।

कर्मवशात्ते भवति स भोगः प्राणिशरीरे भगवति भागः ।। ५७३ ।


भारतभूमेः शुचमपहन्तुं श्रेष्ठमुपायं पुनरवगन्तुम् ।

वासवजाये दिश मम बुद्धिं पावनि माये कुरु कुरु सिद्धिम् ।।


सम्मदयन्तीर्बुधजनमेताः स्वर्गधरित्रीपतिसतिपूताः ।

मौक्तिकमालाः शृणु नुतिकर्तुर्भक्तिनिबद्धाः कविकुलभर्तुः ।।


॥ इति तृतीयस्तबकः ॥

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