top of page

काव्यकण्ठ वासिष्ठ श्री गणपति मुनि विरचितम्

इन्द्राणी सप्तसती

चतुर्थः सुमुखी स्तबकः

Indrani Saptasati - The 700 Verses Mystical work of Kavyakantha Sri Ganapati Muni

इस स्तबक में शचीदेवी—इन्द्राणी—को उस दिव्यशक्ति के रूप में प्रकट किया गया है, जिन्होंने परशुराम की पवित्र जननी रेणुकादेवी में प्रवेश किया। श्री गणपति मुनि प्रार्थना करते हैं कि उनकी प्रकाशमयी दिव्य मुस्कान हृदय में छाए हुए घने अन्धकार को दूर करे। वे विनती करते हैं कि उनकी करुणामयी दृष्टि भारतभूमि की रक्षा करे।


रेणुका, जमदग्नि और परशुराम के वृत्तान्त का पवित्र आन्तरिक अर्थ प्रस्तुत करना इस स्तबक का प्रमुख विषय है। मुनि द्वेषपूर्ण कल्पनाओं से उत्पन्न अपवित्र और विकृत कथनों को अस्वीकार करते हैं। वे रेणुकादेवी को **‘अनघा’**—अर्थात् पापरहित, निर्मल और परम पवित्र—के रूप में पुनः प्रतिष्ठित करते हैं। वे उनके शिरश्छेदन की घटना को शचीदेवी की शक्ति के अवतरण से जोड़कर समझाते हैं। उनके पुनर्जीवन को दिव्यशक्ति, योगरहस्य और जगन्माता के रक्षण-सामर्थ्य के प्रतीक के रूप में देखा गया है।


शचीदेवी की स्तुति परशुराम की तपस्या, पराक्रम और अधर्मी राजाओं पर प्राप्त विजय के पीछे कार्य करने वाली दिव्यशक्ति के रूप में की गई है। यह स्तबक सह्याद्रि, चन्द्रगिरि और अन्य पवित्र क्षेत्रों में विराजमान देवी के रूप में रेणुकादेवी का आवाहन करता है। उनकी आराधना भक्तों को अनुग्रह प्रदान करने वाली, पापों का नाश करने वाली, अन्तःकरण में सुप्त शक्ति को जाग्रत करने वाली और साधकों के वंश को उच्च अवस्था तक पहुँचाने वाली दिव्य जननी के रूप में की गई है।


अन्त में यह स्तबक इस प्रार्थना के साथ समाप्त होता है कि इन्द्राणीदेवी गणपति मुनि को असहायता और अमंगलकारी शक्तियों से घिरे भारतवर्ष की रक्षा करने के लिए तीक्ष्ण बुद्धि, प्रभावशाली वाणी और समर्थ कर्मशक्ति प्रदान करें।


इस प्रकार यह स्तबक रेणुकादेवी की पवित्रता को पुनः स्थापित करते हुए उन्हें शचीशक्ति के साथ एकरूप करता है। यह परशुराम के तपोबल, अधर्म के विनाश, पापशुद्धि, गुप्त शक्ति के जागरण, वंशोद्धार और भारतवर्ष की रक्षा के भावों का समन्वय करने वाली एक विशिष्ट स्तुति है।


## इस स्तबक के मुख्य विषय


• रेणुकादेवी में अभिव्यक्त दिव्यशक्ति के रूप में शचीदेवी का दर्शन

• रेणुका-वृत्तान्त की अपवित्र और विकृत व्याख्याओं का निषेध

• रेणुकादेवी को **‘अनघा’**—निर्मल, पापरहित दिव्य जननी—के रूप में पुनः प्रतिष्ठित करना

• उनके शिरश्छेदन और पुनर्जीवन का योगपरक तथा शक्तितत्त्व सम्बन्धी आन्तरिक अर्थ समझाना

• परशुराम की तपस्या, शक्ति और विजय के पीछे सक्रिय दिव्यशक्ति के रूप में शचीदेवी की स्तुति

• सह्याद्रि, चन्द्रगिरि आदि पवित्र क्षेत्रों में विराजमान रेणुकादेवी की आराधना

• पापनाश, अन्तःशक्ति-जागरण और वंशोद्धार

• भारतवर्ष की रक्षा के लिए गणपति मुनि को तीक्ष्ण बुद्धि, वाक्शक्ति और कर्मसामर्थ्य प्रदान करने की प्रार्थना


**इन्द्रो विश्वस्य राजति — इन्द्र समस्त विश्व पर शासन करते हैं।**



॥ चतुर्थः सुमुखी स्तबकः ॥


अजितमिनाग्नितटिच्छशिभिर्मम हृदयस्य तमः प्रबलम् ।

अमरपतिप्रमदाहसितं विमलघृणिप्रकरैर्हरतु ।। ५७६ ।।


सुरनृपतेर्दयिता विनताहितशमनी लुलितामितरैः ।

वरकरुणावरुणालयदृङमम जननीमवतादवनिम् ।। ५७७ ।।


पटुतपसो जमदग्निमुनेरिह सहधर्मचरीं भुवने ।

तनयनिकृत्तशिरः कमलां वरमतिमाविशदिन्द्रवधूः ।। ५७८ ।।


यदुकुलकीर्तिविलोपभिया बतविनिगूह्य ऋतं कवयः ।

मुनिगृहिणी वधहेतुकथामितरपथेन भणन्ति मृषा ।। ५७९।।


न सुरभिरर्जुनभूमिपतिभृगुतिलकस्य जहार स याम् ।

इयममृतांशुमनोज्ञमुखी परशुधरस्य जनन्यनघा ।। ५८० ।।


अतिरथमर्जुनभूमिपतिं सहपृतनं जमदग्निसुतः ।

युधि स विजित्य विशालयशाः पुनरपि मातरमाहृतवान् ।। ५८१।


परगृहवासकलङ्कवशान्निजगृहिणीं जमदग्निमुनिः ।

बतविनिहन्तुमना कलयंस्तनुभवमादिशदुग्रमनाः ।। ५८२।।


पितृवचनादतिभक्तिमताप्यसुरवदात्मसुतेन हताम् ।

मुनिगृहिणीमनघेतिवदंस्तव वरदेऽविशदंश इमाम् ।। ५८३ ।।


इदमविकम्प्यमतिप्रबलं प्रभवति कारणमार्यनुते ।

मुनिगृहिणीमनघां भणितुं शचि कलया यदि मामविशः ।। ५८४।


खलजनकल्पितदुष्टकथाश्रवणवसाद्व्यथितम् हृदयम् ।

अथ चरितेऽवगते विमलस्मृतिवशतो मम याति मुदम् ।। ५८५।।


तव महसा विशता कृपया मम शचि सूक्ष्मशरीरमिदम् ।

नृपरिपुमातृपवित्रकथा स्मरणपथं गमिता सपदि ।। ५८६ ।।


विदधतुरासुरकृत्यमुभौ बहुलगुणामपि यद्गृहिणीम् ।

स मुनिरघातयदच्छकथां दशरथजश्च मुमोच वने ।। ५८७ ।।


अपि विनिकृत्तशिराः शचि ते वरमहसा विशता सपदि ।

अलभत जीवितमम्ब पुनर्भुवनशुभाय मुनेस्तरुणी ।। ५८८ ।।


यदि शिरसा रहिते वपुषि प्रकटतया विलसन्त्यसवः ।

यदि हृदयं सहभाति धिया किमिव विचित्रमितश्चरितम् ।। ५८९


परशुधरस्य सवित्रि कला त्वयि पुरुहूतसरोजदृशः ।

स शिरसि काचिदभूद्रुचिरा विशिरसि भीमतमा भवति ।। ५९०


परशुधरोऽर्जुनभूमिपतिं यदजयदम्ब तपोऽत्र तव ।

अभजत कारणतामनघे वरमुनिगेयपवित्रकथे ।। ५९१।।


भगवति कृत्तशिरो भवती मथितवती नृपतीनशुभान् ।

प्रथनभुवि प्रगुणं भुजयोः परशुधराय वितीर्य बलम् ।। ५९२ ।।


शुभतमकुण्डलपूर्वसतिः पदनतपातकसंशमनी ।

दिशतु निकृत्तशिराः कुशलं मम सुरपार्थिवशक्तिकला ।। ५९३


निजसुतरङ्गपतेर्निकटे कृतवसतिर्नतसिद्धिकरी ।

दलितशिराः प्रतनोतु मम श्रियममरेश्वरशक्तिकला ।। ५९४।।


भुवि ततसह्यनगान्तरगे शुभतमचन्द्रगिरौ वरदा ।

कृतवसतिः कुरुतान्मम शं भृगुकुलरामजनन्यजरा ।। ५९५।।


अवतु विकृत्तशिराः पदयोर्भजकमनिन्द्यविचित्रकथा ।

दिनकरमण्डलमध्यगृहा सुरधरणीपतिशक्तिकला ।। ५९६ ।।


गगनचरार्चितपादुकया पदनतसन्मतिबोधिकया ।

मम सततं शुचिरेणुकया परवदिदं कुलमम्बिकया ।। ५९७ ।।


शमयितुमुग्रतमं दुरितं प्रथयितुमात्मनिगूढबलम् ।

गमयितुमग्र्यदशाम् स्वकुलं तव चरणाम्बुजमम्ब भजे ।। ५९८ ।


परवशगामशिवेन वृतां भरतधरां परिपातुमिमाम् ।

पटुमतिवाक्क्रियमातनुताद्गणपतिमभ्रहयप्रमदा ।। ५९९ ।।


गणपतिदेवमहोम्शजुषो गणपतिनामकविप्रकवेः ।

सुरपतिजीवसखीशृणुयाद्दशशतपत्रमुखी सुमुखीः ।। ६०० ।।


॥ इति श्रीभगवन्महर्षिरमणांतेवासिनो वासिष्ठस्य

नरसिंहसूनोः गणपतेः कृता इन्द्राणी सप्तशती

षष्ठं त्रैष्टुभं शतकं समाप्तम् ॥

॥ इन्द्रो विश्वस्य राजति ॥

bottom of page