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काव्यकण्ठ वासिष्ठ श्री गणपति मुनि विरचितम्

इन्द्राणी सप्तसती

सप्तमं जागतं शतकम् - प्रथमो द्रुतविलम्बित स्तबकः

Indrani Saptasati - The 700 Verses Mystical work of Kavyakantha Sri Ganapati Muni

इस स्तबक में शचीदेवी—इन्द्राणी—को उस दिव्यशक्ति के रूप में प्रकट किया गया है, जिन्होंने परशुराम की पवित्र जननी रेणुकादेवी में प्रवेश किया। श्री गणपति मुनि प्रार्थना करते हैं कि उनकी प्रकाशमयी दिव्य मुस्कान हृदय में छाए हुए घने अन्धकार को दूर करे। वे विनती करते हैं कि उनकी करुणामयी दृष्टि भारतभूमि की रक्षा करे।


रेणुका, जमदग्नि और परशुराम के वृत्तान्त का पवित्र आन्तरिक अर्थ प्रस्तुत करना इस स्तबक का प्रमुख विषय है। मुनि द्वेषपूर्ण कल्पनाओं से उत्पन्न अपवित्र और विकृत कथनों को अस्वीकार करते हैं। वे रेणुकादेवी को **‘अनघा’**—अर्थात् पापरहित, निर्मल और परम पवित्र—के रूप में पुनः प्रतिष्ठित करते हैं। वे उनके शिरश्छेदन की घटना को शचीदेवी की शक्ति के अवतरण से जोड़कर समझाते हैं। उनके पुनर्जीवन को दिव्यशक्ति, योगरहस्य और जगन्माता के रक्षण-सामर्थ्य के प्रतीक के रूप में देखा गया है।


शचीदेवी की स्तुति परशुराम की तपस्या, पराक्रम और अधर्मी राजाओं पर प्राप्त विजय के पीछे कार्य करने वाली दिव्यशक्ति के रूप में की गई है। यह स्तबक सह्याद्रि, चन्द्रगिरि और अन्य पवित्र क्षेत्रों में विराजमान देवी के रूप में रेणुकादेवी का आवाहन करता है। उनकी आराधना भक्तों को अनुग्रह प्रदान करने वाली, पापों का नाश करने वाली, अन्तःकरण में सुप्त शक्ति को जाग्रत करने वाली और साधकों के वंश को उच्च अवस्था तक पहुँचाने वाली दिव्य जननी के रूप में की गई है।


अन्त में यह स्तबक इस प्रार्थना के साथ समाप्त होता है कि इन्द्राणीदेवी गणपति मुनि को असहायता और अमंगलकारी शक्तियों से घिरे भारतवर्ष की रक्षा करने के लिए तीक्ष्ण बुद्धि, प्रभावशाली वाणी और समर्थ कर्मशक्ति प्रदान करें।


इस प्रकार यह स्तबक रेणुकादेवी की पवित्रता को पुनः स्थापित करते हुए उन्हें शचीशक्ति के साथ एकरूप करता है। यह परशुराम के तपोबल, अधर्म के विनाश, पापशुद्धि, गुप्त शक्ति के जागरण, वंशोद्धार और भारतवर्ष की रक्षा के भावों का समन्वय करने वाली एक विशिष्ट स्तुति है।


## इस स्तबक के मुख्य विषय


• रेणुकादेवी में अभिव्यक्त दिव्यशक्ति के रूप में शचीदेवी का दर्शन

• रेणुका-वृत्तान्त की अपवित्र और विकृत व्याख्याओं का निषेध

• रेणुकादेवी को **‘अनघा’**—निर्मल, पापरहित दिव्य जननी—के रूप में पुनः प्रतिष्ठित करना

• उनके शिरश्छेदन और पुनर्जीवन का योगपरक तथा शक्तितत्त्व सम्बन्धी आन्तरिक अर्थ समझाना

• परशुराम की तपस्या, शक्ति और विजय के पीछे सक्रिय दिव्यशक्ति के रूप में शचीदेवी की स्तुति

• सह्याद्रि, चन्द्रगिरि आदि पवित्र क्षेत्रों में विराजमान रेणुकादेवी की आराधना

• पापनाश, अन्तःशक्ति-जागरण और वंशोद्धार

• भारतवर्ष की रक्षा के लिए गणपति मुनि को तीक्ष्ण बुद्धि, वाक्शक्ति और कर्मसामर्थ्य प्रदान करने की प्रार्थना


**इन्द्रो विश्वस्य राजति — इन्द्र समस्त विश्व पर शासन करते हैं।**



॥ अथ सप्तमं जागतं शतकम् ॥

॥ प्रथमो द्रुतविलम्बित स्तबकः ॥


सुरमहीरमणस्य विलासिनी जलचरध्वजजीवितदायिनी ।

हरतु बोधदृगावरणं तमो हृदयगं हसितेन सितेन मे ।। ६०१।।


नमदमर्त्यकिरीटकृतैः किणैः कमठपृष्ठनिभे प्रपदेऽङ्किता ।

परिधुनोतु शची भरतक्षितेर्वृजिनजालमजालमकम्पनम् ।। ६०२


अतितरां नतपालनलोलया विबुधनाथमनोहरलीलया ।

किरिमुखीमुखशक्त्युपजीव्यया विदितयादितया गतिमानहम् ।। ६०५


घनहिरण्यमदापहरोचिषा वनरुहाननयाऽवनदक्षया ।

गतिमदिन्द्रमनोरथनाथया भुवनमेव न मे कुलमात्रकम् ।। ६०४


तनुषु वामनमूर्तिधरे विभौ तमनुयाच विराजति वामनी ।

शरणवाननयाम्बिकया लसत् करुणयाऽरुणया पदयोरहम् ।।


सकरुणा कुशलं मम रेणुकातनुरजा तनुतादुदितो यतः ।

युधि मुनिर्विदधौ परशुं दधज्जनपतीनपतीव्रभुजामदान् ।। ६०६


सुजनशत्रुरमाथि घनध्वनिः शचि सरात्रिचरस्तव तेजसा ।

जननि रामसहोदरसायकं प्रविशताऽविशतादधिकौजसा ।। ६०७


तव महःकलयाबलमाप्तया जननि शुम्भनिशुम्भमदच्छिदा ।

जगदरक्ष्यत गोपकुलेशितुस्तनुजयाऽनुजयार्जुनसारथेः ।। ६०८


न विनिरूपयितुं प्रबभूव यां कविजनो विविधं कथयन्नपि ।

मुनिहृदम्बुजसौधतलेन्दिरा जयति सा यतिसाधुजनावनी ।।


इममयि त्रिदिवेश्वरि कल्किनं रुषमपोह्य सवित्रि विलोकितैः ।

सुरपतेर्द्विषतोऽघवतो लसन् मदनकैरवकैरवलोचने ।। ६१० ।।


स्मरदमर्त्यनृपालविलासिनीं प्रबलपातकभीतिविनाशिनीम् ।

प्रवणयान्तरनन्यधिया लसद्विनययानययामवतीर्मनः ।। ६११।।


भगवतीगगनस्थलचारिणी जयति सङ्गररङ्गविहारिणी ।

सुकृतशत्रुमतिभ्रमकारिणी हरिहयारिहयादिविदारिणी ।। ६१२ ।


शरणवानहमर्जुनहासया भुवनभूपतिहारिविलासया ।

दिवि पुलोमजया धवलाचले गिरिजयाऽरिजयावितदेवया ।।६१३


चरणयोर्धृतया विजयामहे वयमशेषजगन्नृपजायया ।

दिवि पुलोमजया धवलाचले नगजया गजयानविलासया ।। ६१४


अरिवधाय विधाय बुधाधिपं पटुभुजाबलभीषणमाजिषु ।

न भवती शचि गच्छति दुर्गतः क्वचन काचन कातरधीरिव ।। ६१५


सपदि मानसधैर्यहृतो जगज्जननि वज्रतनोर्ज्वलितार्चिषः ।

अरिजने प्रथमं तव वीक्षया सुरपतेरपतेजसि वि क्रमः ।। ६१६ ।


न मननोचितमस्ति परं नृणां विबुधराजवधूपदपद्मतः ।

जगति दर्शनयोग्यमिहापरं न रमणी रमणीयमुखाब्जतः ।। ६१७


शरणवानहमस्मि पुरातनप्रमदया मुनिगेयचरित्रया ।

स्वबलचालितनाकजगन्नभो वसुधया सुधया सुरराड्दृशाम् ।।


अयमहं गतिमानतिशान्तया त्रिदिवभूमिपतिप्रियकान्तया ।

मनसि मौनिजनैरतिभक्तितो निहितया हितया सुकृतात्मनाम् ।।

विनयतः स्तुतया गमयाम्यहं जनिमतां जनयित्रि निशास्त्वया ।

प्रसृतया कुलकुण्डधनञ्जयाद्धृततनूततनूतनवेगया ।। ६२०।।


सकृदमोघसरस्वतिसाधुधी हृदयवेद्यपदाम्बुजसौष्ठवे ।

मम शिवं सुमनः पृथिवीपतेः सुवदने वद नेत्रलसद्दये ।। ६२१ ।।


दुरवगाहपथे पतितं चिराज्जननि गम्यविलोकनलालसम् ।

स्वयममर्त्यनृपालमनोरमे सुनयने नयनेयमिमं जनम् ।। ६२२ ।।


अवतु नः स्वयमेव पटून् विपद्विमथनाय विधाय बुधेश्वरी ।

सकलमर्मसुवीतदयैः परैर्विनिहतानिह तापवतः शची ।। ६२३ ।।


सुरधरापतिजीवितनाथया स्वजननक्षितिरक्षणकर्मणि ।

पटुतमो जन एष विधीयतामिह तया हतया तु समूहया ।। ६२४।


गणपतेः शृणुयादिममुज्वलं द्रुतविलम्बितवृत्तगणं शची । सलिलराशिसुताभवनीभवद्भुवनपावनपादसरोरुहा ।। ६२५।।


॥ इति प्रथमः स्तबकः ॥

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