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काव्यकण्ठ वासिष्ठ श्री गणपति मुनि विरचितम्

इन्द्राणी सप्तसती

द्वितीयो जलोद्धतगति स्तबकः

Indrani Saptasati - The 700 Verses Mystical work of Kavyakantha Sri Ganapati Muni

यह **जलोद्धतगति स्तबक** *इन्द्राणी सप्तशती* के अत्यन्त हृदयस्पर्शी और शक्तिशाली अंशों में से एक है। यह स्तबक इस प्रार्थना से आरम्भ होता है कि महेन्द्र की प्रिय सहचरी शचीदेवी—इन्द्राणी—की प्रकाशमयी मुस्कान हृदय में फैले हुए अपार अन्धकार को दूर कर दे। कवि विनती करते हैं कि उनकी करुणामयी पार्श्वदृष्टि विवेक खो चुकी, असहाय और दुर्बल हो गई भारतभूमि के दुर्भाग्य को समाप्त करे।


यह स्तबक दिव्यमाता से सम्बन्धित एक गम्भीर दार्शनिक और आध्यात्मिक दृष्टि प्रस्तुत करता है। शचीदेवी को परमेश्वर की प्रज्ञा, आकाश को ही शरीर बनाकर सम्पूर्ण विश्व को धारण और पोषित करने वाली शक्ति तथा इन्द्र की प्रिय पराशक्ति के रूप में वर्णित किया गया है। प्रजापति-परम्परा में वे अदिति हैं, जनार्दन-परम्परा में रमा, सदाशिव-परम्परा में शिवा और इन्द्र-परम्परा में उषा, स्वधा तथा शची हैं। इस प्रकार मुनि प्रकट करते हैं कि ये सभी दैवी नाम एक ही परम चैतन्यशक्ति के सूचक हैं।


मध्य के श्लोकों में आकाश, वायु, शब्द, विद्युत्, सूर्य, चन्द्रमा, अग्नि, जल और पृथ्वी—इन सभी को परमदैव और उनकी शक्ति रूपी दिव्य दम्पति के वैभव की अभिव्यक्तियाँ बताया गया है। परात्पर आकाश में दिव्यमाता निराकार हैं, किन्तु भक्तों की भावना, समझ और उपासना के अनुरूप वे अनेक रूप धारण करके अनुग्रह प्रदान करती हैं।


इस स्तबक का सबसे विशिष्ट भाग बार-बार व्यक्त होने वाली यह शरणागति है—


**“तवाम्ब चरणं व्रजामि शरणम्” — “हे अम्बा! मैं आपके चरणों की ही शरण ग्रहण करता हूँ।”**


यहाँ श्री गणपति मुनि केवल अपनी व्यक्तिगत पीड़ा व्यक्त नहीं करते, बल्कि सम्पूर्ण भारतवर्ष की ओर से दिव्यमाता की शरण माँगते हैं। वे हृदय की गहरी वेदना के साथ लोगों के बीच बढ़ते विभाजन, सामूहिक शक्ति के क्षय, निर्धनता, वीरता के लोप, ऋषि-परम्परा के पतन और कलियुग में अधर्म की वृद्धि का वर्णन करते हैं। इन सभी परिस्थितियों में वे दिव्यमाता के चरणों को ही अन्तिम और अनिवार्य शरण के रूप में स्वीकार करते हैं।


अन्त में यह स्तबक इस प्रार्थना के साथ समाप्त होता है कि शचीदेवी मातृभूमि के खोए हुए वैभव को पुनः प्रदान करें और भारतवर्ष की सेवा तथा रक्षा के लिए गणपति मुनि के हाथों को समर्थ बनाएँ।


इस प्रकार यह जलोद्धतगति स्तबक पूर्ण शरणागति, राष्ट्रीय पुनर्जागरण, धार्मिक साहस, ऋषि-परम्परा के पुनरुद्धार और पराशक्ति के अनुग्रह का समन्वय करने वाली महिमामयी स्तुति है।


## इस स्तबक के मुख्य विषय


• शचीदेवी की प्रकाशमयी मुस्कान से हृदय के अन्धकार को दूर करने की प्रार्थना

• दुर्बल और विवेकहीन हो चुकी भारतभूमि के दुर्भाग्य को दूर करने का आवाहन

• शचीदेवी को परमेश्वर की प्रज्ञा और आकाशमय शरीर वाली विश्वधारिणी के रूप में देखना

• अदिति, रमा, शिवा, उषा, स्वधा और इन्द्राणी नामों की एकता

• आकाश, वायु, शब्द, विद्युत्, सूर्य, चन्द्रमा, अग्नि, जल और पृथ्वी को दिव्यमाता की विभूतियों के रूप में देखना

• भक्तों की भावना के अनुसार अनेक रूप धारण करने वाली पराशक्ति के रूप में उनकी स्तुति

• “हे अम्बा! मैं आपके चरणों की ही शरण ग्रहण करता हूँ”—इस भाव की पुनरावृत्ति

• विभाजन, दुर्बलता, निर्धनता और वीरता के क्षय से भारतवर्ष की मुक्ति के लिए प्रार्थना

• ऋषि-परम्परा के पुनरुद्धार और अधर्म के विनाश के लिए दिव्यमाता का आवाहन

• मातृभूमि का खोया हुआ वैभव लौटाने और भारतसेवा के लिए गणपति मुनि के हाथों को समर्थ बनाने की प्रार्थना


**इन्द्रो विश्वस्य राजति — इन्द्र सम्पूर्ण विश्व पर शासन करते हैं।**



॥ द्वितीयो जलोद्धतगति स्तबकः ॥


हरित्सु परितः प्रसादमधिकं दधानममलत्विषां प्रसरणैः ।

महेन्द्रमहिलाविलासहसितं मदन्तरतमो धुनोतु विततम् ।। ६२६


प्रसूत्रिजगतः प्रिया मघवतः कृपाकलितया कटाक्षकलया ।

नितान्तमगतेर्विकुण्ठितमतेर्धुनोतु भरतक्षितेरकुशलम् ।। ६२७ ।


पुरा शचि मतिस्त्वमीशितुरथो नभस्तनुमिता पृथङमतिमती ।

अनन्तरमभूः सरोजनयना तनुः सुरपतेर्विलोचनसुधा ।। ६२८ ।।


परत्र विगुणा सतोऽसि धिषणा नभस्तनुरिह प्रपञ्चमवसि ।

असि स्वरबला प्रिया सुरपतेरियत्तव शचि स्वरूपकथनम् ।।६२९


प्रजापतिपदे पुराणपुरुषे स्मृता त्वमदितिः सुरासुरनुते ।

जनार्दनपदे रमासि परमे सदाशिवपदे शिवा त्वमजरे ।। ६३० ।।


उषा इनपदे स्वधाऽनलपदे पुरन्दरपदे त्वमीश्वरि शची ।

यथा रुचिविदुः पदानि कवयश्चितिश्च चितिमान्युवामृजुगिरा ।।


अमेयममलं पुराणपुरुषं तदीयविभवाभिधायिभिरिमे ।

वदन्ति कवयः पदैर्बहुविधैस्तथैव भवतीं ततो मतभिदाः ।। ६३२


नभश्च पवनः स्वरश्च परमस्तटिच्च वितता पतिश्च महसाम् ।

सुधांशुरनलो जलं च पृथिवी सवित्रि युवयोर्विभूतिपटली ।। ६३३


अपारबहुलप्रमोदलहरी सतः किलचितिः परत्र वितता ।

पुनर्वियदिदं परीत्य निखिलं जगन्ति दधती परा विजयते ।। ६३४


न यद्यपि परात्परे नभसि ते सरोजनयना वपुः पृथगजे ।

तथापि नमतां मतीरनुसरन्त्यमेयविभवे दधासि च तनूः ।। ६३५।


सह त्रिभुवनप्रपालनकृता समस्तमरुतां गणस्य विभुना ।

सदा शशिमुखी शरीरभृदजा जगत्यदुरिते शची विजयते ।। ६३६


कुलं बहुभिदं बलं न भुजयोः कथं नु विपदस्तरीम भरताः ।

समर्थमधुना विपद्विधुतये तवाम्ब चरणं व्रजामि शरणम् ।। ६३७


समस्तमपि च स्वदेशविदुषां विधानपटलं बभूव विफलम् ।

अभाग्यदमनक्षमं तदधुना तवाम्ब चरणं व्रजामि शरणम् ।। ६३८


निजो मम जनो नितान्तमगतिर्न कुक्षिभरणेऽप्ययं प्रभवति ।

महेश्वरि कृपामरन्दमधुना तवाम्ब चरणं व्रजामि शरणम् ।। ६३९


अदृष्टकनकं कुलं मम चिरान्निरायुधमिदं निराशमभितः ।

स्वभावत इव प्रबद्धमभवत्तवाम्ब चरणं व्रजामि शरणम् ।। ३४०


अवीरचरितं विपालककथं निरार्षविभवं चिरान्मम कुलम् ।

इदं मम मनो निकृन्तति मुहुस्तवाम्ब चरणं व्रजामि शरणम् ।।


चिरात्स्मृतिपथादपि च्युतमजे तपोबलभवं तमार्षविभवम् ।

स्वदेशमधुना पुनर्गमयितुं तवाम्ब चरणं व्रजामि शरणम् ।। ६४२


हतं च विहतं धुतं च विधुतं रुदन्तमभितो विशिष्टकरुणे ।

इमं स्वविषयं शिवं गमयितुं तवाम्ब चरणं व्रजामि शरणम् ।।६४३


क्षयाय सुकृतद्विषां विहरतां शिवाय च सतां प्रपञ्चसुहृदाम् ।

निजस्य मनसो बलाय च परे तवाम्ब चरणं व्रजामि शरणम् ।।


जयत्सु सुकृतं द्विषत्सु परितः सतामपि कुले बलेन रहिते ।

खलप्रिययुगे कलौ परिणते तवाम्ब चरणं व्रजामि शरणम् ।।


अभाति सुकृते निगूढविभवे विभाति दुरिते फलानि दिशति ।

विधानविकले मनस्यभयदे तवाम्ब चरणं व्रजामि शरणम् ।। ६४६


पटौ प्रतिभटे गदे प्रतिभये नतावनविधावतीव निपुणम् ।

सुपर्वभुवनक्षितीशदयिते तवाम्ब चरणं व्रजामि शरणम् ।। ६४७


अमर्त्यपटलीकिरीटमणिभाभुजङ्गकिरणं नितान्तमरुणम् ।

विपत्तिदमनं तमः प्रशमनं तवाम्ब चरणं व्रजामि शरणम् ।। ६४८


विनष्टविभवामिमां पुनरपि श्रियाविलसितां विधातुमजरे ।

स्वजन्मपृथिवीं स्वरीशदयिते दिशेर्गणपतेः कराय पटुताम् ।।६४९


सुपर्ववसुधाधिनाथसुदृशो जलोद्धतगतिस्तवोऽयमनघः ।

कृतिर्गणपतेः करोतु विधुतिं भयस्य भरतक्षमातलजुषाम् ।। ६५०


॥ इति द्वितीयः स्तबकः ॥

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