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काव्यकण्ठ वासिष्ठ श्री गणपति मुनि विरचितम्

उमासहस्रम्

प्रथमः स्तबकः - आर्यावृत्तम्

Uma Sahasram - The 1000 Verses Magnum Opus of Sri Ganapati Muni

उमा सहस्रम् का यह आरम्भिक स्तबक सर्वप्रथम दिव्यमाता को विश्वरूपिणी, निराकार स्वरूप में — व्योमशरीरा, अर्थात् सम्पूर्ण आकाश-विस्तार ही जिनका शरीर है ऐसी पराशक्ति के रूप में — और तत्पश्चात करुणामयी दृश्यरूपिणी स्त्रीरूपा, दिव्य नारीस्वरूपिणी के रूप में प्रस्तुत करता है। समस्त प्राणियों के अज्ञानरूपी अन्धकार और दुःख को दूर करने की उमा देवी से प्रार्थना करते हुए श्री गणपति मुनि धीरे-धीरे उन्हें जन्मरहित, असीम महाशक्ति, परमेश्वर की तपःशक्ति, समस्त लोकों में सूक्ष्म रूप से व्याप्त दिव्यशक्ति तथा देहधारी जीवों के भीतर अन्तर्निहित कुण्डलिनीशक्ति के रूप में दर्शाते हैं। इस दृष्टि से “व्योमशरीरा, स्त्रीरूपा च” शीर्षक इस स्तबक के भाव-विकास को अत्यन्त सार्थक रूप से व्यक्त करता है। सम्पूर्ण विश्व में व्याप्त और आकाश को ही अपना शरीर धारण करने वाली वही पराशक्ति, दिव्य लीला तथा जीवों पर अनुग्रह करने के लिए उमा-हैमवती के मनोहर दिव्य स्त्रीरूप को धारण करती हैं।


इस स्तबक की एक विशिष्ट विशेषता है वैदिक सृष्टितत्त्व, पुराणकथाओं और आध्यात्मिक संकेतार्थों का समन्वय करने में मुनि की असाधारण क्षमता। दक्ष, अदिति, सती देवी, दक्षयज्ञ, पर्वतराज की पुत्री के रूप में पार्वती देवी का प्राकट्य, और यहाँ तक कि पर्वत शब्द का भावार्थ भी केवल ऐतिहासिक अथवा पौराणिक घटनाओं के रूप में नहीं समझाया गया है। इनके भीतर निहित शक्ति के आविर्भाव, तिरोभाव और पुनः प्राकट्य जैसे गम्भीर आध्यात्मिक सत्यों को मुनि उद्घाटित करते हैं। विभिन्न परम्पराओं में प्राप्त भिन्न-भिन्न व्याख्याओं को भी वे परस्पर विरोधी न मानकर, उनके पीछे निहित एक ही आध्यात्मिक सत्य की ओर पाठक का मार्गदर्शन करते हैं। इसलिए समापन के श्लोक शास्त्रज्ञों को इन आर्यावृत्त श्लोकों में उमा देवी के उस परमस्वरूप को पहचानने के लिए आमन्त्रित करते हैं, जिसमें वे भवमहिषी — भगवान शिव की दिव्य सहधर्मिणी, और अम्बिका — समस्त लोकों की जननी हैं।


इस स्तबक में श्री गणपति मुनि की वैदिक पारिभाषिक शब्दावली पर असाधारण पकड़, तात्त्विक समन्वय की क्षमता, मन्त्रस्फूर्ति से सम्पन्न सांकेतिक भाषा तथा संक्षिप्त होते हुए भी गहन अर्थवत्ता से युक्त काव्यकौशल स्पष्ट रूप से प्रकट होते हैं। नियमबद्ध आर्यावृत्त छन्द के भीतर ही वे परतत्त्व-विचार से सृष्टितत्त्व तक, सूक्ष्म योगरहस्यों से देवी के दिव्य सौन्दर्य-वर्णन तक, प्रसिद्ध पुराणकथाओं से उनके अन्तर्निहित आध्यात्मिक रहस्यों तक अत्यन्त सहजता से प्रवाहित होते हैं।


इस प्रकार यह स्तबक उमा सहस्रम् के लिए अत्यन्त उपयुक्त और प्रभावशाली आरम्भ बन जाता है। इसमें उमा देवी को केवल अनेक देवताओं में से एक देवी के रूप में नहीं, बल्कि सृष्टि की मूल आदिशक्ति, सम्पूर्ण विश्व में व्याप्त चेतनाशक्ति, और भक्तों को प्रकाशमय दिव्यरूप में सहज अनुग्रह प्रदान करने वाली करुणामयी जगन्माता के रूप में प्रकट किया गया है।


॥ काव्यकण्ठ वासिष्ठ श्री गणपति मुनि विरचितम् उमासहस्रम् ॥


प्रथमं शतकम्


प्रथमः स्तबकः - आर्यावृत्तम्

व्योमशरीरा, स्त्रीरूपा च


अखिलजगन्मातोमा तमसा तापेन चाकुलानस्मान् ।

अनुगृह्णात्वनुकम्पासुधार्द्रया हसितचन्द्रिकया ।।१।।


निखिलेषु प्रवहन्तीं निरुपाधिविमर्शयोगदृश्योर्मिम् ।

अजरामजाममेयां कामपि वन्दे महाशक्तिम् ।। २।।


सा तत्त्वतः समन्तात्सत्यस्य विभोस्तता तपश्शक्तिः ।

लीलामहिलावपुषा हैमवती तनुषु कुण्डलिनी ।। ३॥


परमः पुरुषो नाभिर्लोकानां सत्य उच्यते लोकः ।

परितस्ततः सरन्ती सूक्ष्मा शक्तिस्तपो लोकः ॥४॥


अन्तर्गूढार्थानां पुरुषाग्नेर्धूमकल्प उद्गारः ।

शक्तिज्वालाः परितः प्रान्तेष्वभवज्जनो लोकः ।।५।।


अतिसूक्ष्मधूमकल्पं लोकं ततमाख्ययाऽन्यया नाकम् ।

एतं ततोऽपि सूक्ष्मा व्याप्ताऽन्तरतः परा शक्तिः ।॥६॥


धूमान्तरोष्मकल्पा शुद्धज्वालोपमा च या शक्तिः ।

तां दिवमाहुः केचन परमं व्योमापरे प्राहुः ।। ७ ।।


उद्गीर्णधूमकल्पो योऽयमपारो महाञ्जनो लोकः ।

व्योमान्तरिक्षगगनप्रभृतिभिरभिधाभिराहुस्तम् ।। ८॥


प्रान्तेषु कोऽपि शक्तेः पृथगात्मा वियदुपाधिसङ्गेन ।

परमात्मनो विभक्तः स्वयमभिमन्ता विनिष्पेदे ।।९।।


दक्षः परोक्षमुदितः पन्था एष त्विषां जनो लोकः ।

तद्गर्भे लब्धात्मा कथिता दाक्षायणी शक्तिः ।।१०।।


सत्याः प्रागपि शक्तेः प्रादुर्भावः स कीर्त्यते प्रथमः ।

ईशाभिमानमय्याः पृथगभिमानित्वनिष्पत्त्या ।। ११ ।।


आकाशस्य सुतैवं लक्षणया वस्तुतः प्रसूः शक्तिः ।

अदितेर्दक्षो दक्षाददितिरिति श्रुतिरबाधैवम् ।। १२ ।।


जगतां मातापितरौ सतीभवौ केऽपि पण्डिताः प्राहुः ।

अदितिप्रजापती तावपरेषां भाषया विदुषाम् ।। १३ ।।


दिव्यपुमाकृतिमीशे बिभ्रति लीलार्थमस्य रमणाय ।

दिव्यवनिताकृतिं सा बभार माता च भुवनानाम् ।। १४ ।।


भासुरहेमाभरणां बहुशोभामीश्वरप्रमोदकलाम् ।

मूर्तिं पावनकीर्तिं तां हैमवतीमुमामाहुः ।। १५।।


तस्य प्रथमः साक्षी भुवनजुषां नयनशालिनां मध्ये ।

वपुषः किलादिसुदृशो निरुपमपुण्यो निलिम्पपतिः ।। १६ ।।


पल्लवमृदु वेदिगतज्वलनपवित्रं महार्घमणिकान्तम् ।

नवचन्द्रखण्डसौम्यं शिवसुदृशस्तत्स्मरामि वपुः ।।१७।।


केचन गौरीं देवीं शीताद्रेर्देवतात्मनो जाताम् ।

कथयन्ति स्त्रियमुत्तमलावण्यास्वादितो गण्याम् ।। १८ ।।


सत्यैव भवतु सेयं कथा तथाऽपि प्रभाषितां भक्तैः ।

तां मूर्तिमादिसुदृशो जानीयात्कमपि तेजोंशम् ।। १९।।


मन्यन्ते केऽपि घनं पर्वतमुक्तं निगूढया वाचा ।

प्रादुर्भवति गभीरध्वनिरविषह्या यतः शक्तिः ।।२०।।


आकाशो गोलेभ्यो यद्वितरति निजरजश्चयादन्नम् ।

नेशाय कीर्त्यते सा संसारे दक्षयागकथा ।। २१।।


व्याप्ताऽपि यन्निगूढा बहिरीक्षकबुध्यपेक्षया नष्टा ।

शक्तिर्यागे तस्मिन्नवसानं तदुदितं सत्याः ।। २२ ।।


पर्वतनाम्नो वैदिकभाषायां यदियमतिबला शक्तिः ।

घनतो भवति व्यक्ता तदभिहितं पार्वतीजननम् ।। २३ ।।


तेजोंशतः शिवाविह हिमाचलेऽनुग्रहाय भूमिजुषाम् ।

दत्तो यत्सान्निध्यं लीलाचारित्रमन्यदिदम् ।। २४।।


एतासामार्याणां जानन्तः शास्त्रसम्मतं भावम् ।

जानीयुर्भवमहीषीं भुवनानामम्बिकां देवीम् ।। २५।।

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