top of page

काव्यकण्ठ वासिष्ठ श्री गणपति मुनि विरचितम्

उमासहस्रम्

द्वितीयः स्तबकः - पञ्चचामरवृत्तम्

Uma Sahasram - The 1000 Verses Magnum Opus of Sri Ganapati Muni

“सर्गादि वर्णनम्” — अर्थात् “सृष्टि और उसके क्रमिक आविर्भावों का वर्णन” शीर्षक वाला यह दूसरा स्तबक, प्रथम स्तबक में प्रस्तुत विश्व-सृष्टि की दृष्टि को और अधिक व्यापक रूप में विकसित करता है। श्री गणपति मुनि इस स्तबक का आरम्भ उमा देवी की उस रहस्यमयी, करुणामयी और सर्वशक्तिमयी पराशक्ति के रूप में भक्तिपूर्वक स्तुति करते हुए करते हैं, जो तीनों लोकों की सृष्टि, पालन और संहार करती हैं। इसके बाद वे बताते हैं कि परमसत्य से शक्ति के माध्यम से यह विश्व किस प्रकार क्रमशः प्रकट होता है। दिव्यचैतन्य और संकल्प की सूक्ष्म अवस्था से लेकर आकाश, तेजोमय सूक्ष्म कणों, सौरमण्डलों, ग्रहों, पृथ्वी, चन्द्रमा और अन्ततः देहधारी जीवों तक सृष्टि के क्रमिक विस्तार का चित्रण किया गया है। इसलिए सर्गादि वर्णनम् शीर्षक इस स्तबक के लिए पूर्णतः सार्थक है, क्योंकि इसका मुख्य भाग सर्ग — अर्थात् विश्व का आविर्भाव, विस्तार और क्रमबद्ध संगठन — तथा उस विश्वव्यवस्था में कार्यरत दैवी तत्त्वों के निरन्तर विवेचन से परिपूर्ण है।


ये श्लोक तान्त्रिक, वैदिक, दार्शनिक और सृष्टितत्त्व सम्बन्धी सिद्धान्तों को एक ही समन्वित दृष्टि में एकत्र करने की मुनि की असाधारण प्रतिभा को भी स्पष्ट रूप से प्रकट करते हैं। भव और सत्, भवानी और सती, चित्, कामना, क्रिया और मति — इन सभी को एक ही परम चेतनाशक्ति की विभिन्न अभिव्यक्तियों के रूप में समझाया गया है। आगे चलकर त्रिमूर्ति, हिरण्यगर्भ, विराट्, सोम, इन्द्र, अग्नि, रुद्र और सदाशिव जैसे सुप्रसिद्ध दैवी तत्त्वों को मुनि परस्पर विरोधी सिद्धान्तों के रूप में नहीं, बल्कि उसी परमसत्य के भिन्न नामों, भिन्न दृष्टिकोणों और भिन्न आविर्भावों के रूप में व्याख्यायित करते हैं। वे दिखाते हैं कि वही परमसत्य आकाश में, सूर्य में, मनुष्य में और सूक्ष्म जगत् में अलग-अलग प्रकार से प्रकाशित होता है। इस प्रकार यह स्तबक केवल एक सृष्टिकथा बनकर नहीं रह जाता, बल्कि विश्व, देवतत्त्व, चेतना और मानव के सूक्ष्म जगत् के बीच विद्यमान आन्तरिक सम्बन्ध को दर्शाने वाले एक आध्यात्मिक मानचित्र का रूप ले लेता है।


मुनि की साहित्यिक प्रतिभा भी इस स्तबक में उतनी ही प्रभावशाली रूप से सामने आती है। शक्तिशाली पञ्चचामर छन्द में वे भक्तिरसपूर्ण स्तुति से दार्शनिक चिन्तन की ओर और वहाँ से अत्यन्त संक्षिप्त किन्तु गहन सृष्टिविवरण की ओर बड़ी सहजता से प्रवाहित होते हैं। अग्नि, धूम, किरणों, सूक्ष्म कणों, गोलों और प्रकाशमय खगोलीय पिण्डों जैसे स्पष्ट दृश्य-बिम्बों के माध्यम से जटिल परतत्त्व सम्बन्धी विचारों को सहज रूप में व्यक्त करना उनकी रचनाशैली की एक विशिष्ट विशेषता है। साथ ही वे अनेक शास्त्रीय परम्पराओं की पारिभाषिक शब्दावली को एक ही काव्यात्मक प्रवाह में सुन्दर ढंग से समन्वित करते हैं।


अन्तिम श्लोक में छन्द को ही एक दिव्य अर्पण में रूपान्तरित कर देना अत्यन्त सुन्दर है। कोमल और सुसंस्कृत शब्दों से निर्मित इन पञ्चचामरों की कल्पना कवि ऐसे करते हैं मानो वे जगन्माता के कमलवत् चरणों के लिए एक अमूल्य शय्या बन रहे हों। इस प्रकार इस स्तबक में तत्त्वचिन्तन, विश्व-सृष्टि की दृष्टि, भक्ति और काव्यकौशल बिना किसी व्यवधान के एक ही समग्र आध्यात्मिक अनुभूति में एकाकार हो जाते हैं।


द्वितीयः स्तबकः - पञ्चचामरवृत्तम्

सर्गादिवर्णनम्


सहादरेण यो वलक्षपारिजातमालया

गलस्थलीविभूषया ध्वनिं विनैव भाषते ।

महेशपुण्ययोषितो मनोज्ञहास एष मे

विभूतये प्रकल्पतां विधूतये च पाप्मनाम् ।। २६ ।।


निरन्तरश्रिते सदा कृपारसप्रवाहिनी

विलासिनीतनुर्विभोः पुमाकृतेर्विमोहिनी ।

सुधातरङ्गकल्पहासभासुरानना शिवा

पदाब्जलम्बिनो धुनोतु पाप्मनः फलं मम ।। २७ ।।


करोति या बिभर्ति या निहन्ति या जगत्त्रयं

समन्ततो विभाति या न दृश्यते क्वचिच्च या ।

अतीव गुप्तरूपिणी गुरूपदेशमन्तरा

न शक्यते बुधैश्च बोद्धमन्धकारिसुन्दरी ।। २८ ।।


महान्धकारबन्धुरस्य भूतसञ्चयस्य या

विनिद्रितस्य सर्वबीजधाग्नि मौनमुद्रिते ।

समन्ततो विजृम्भणाय भासनाय चाभवन्

महद्विधाय चेष्टितं ममेयमिष्टदेवता ।। २९ ।।


महेशगर्भतः समस्तभूतबीजकोशतः

किरन्त्यशेषविश्वमप्यपारदिव्यवैभवा ।

विचित्रचेष्टयाऽऽद्यया विधूतनाथनिद्रया

जगन्नुता जयत्यसावनादिशक्तिरद्भुता ।। ३० ।।


भवं भणन्ति तान्त्रिकास्त्वदाश्रयं तमव्ययं

समामनन्ति वैदिकाः सदर्चिते सदाह्वयम् ।

न कश्चिदर्थभेद एतदाख्ययोर्द्वयोर्भवे-

द्भिदेयमादिमं पदं पुमान्परं नपुंसकम् ।। ३१।।


स चेद्भवोऽभिधानतो भवान्यसि त्वमव्यये

समीर्यते स सद्यदि त्वमम्ब भण्यसे सती ।

न तेऽस्ति भावता न शक्तिरूपिणी हि विद्यसे

न वेद्मि कालिके कथं सतोऽसतश्च भिद्यसे ।। ३२॥


जगद्विधानकार्यतः पुरा सुरासुरस्तुते

त्वमम्ब जीवितं भवस्यभावमूलवादिनाम् ।

विकल्पवर्जिता मतिः प्रबोधमूलवादिनां

रसोऽनपेक्ष उत्तमः प्रमोदमूलवादिनाम् ।। ३३ ।।


भवत्यसावतो भवान्यनादिरन्तवर्जिता

जगन्ति माति नित्यमोरसौ तदभ्यधाय्युमा ।

रसात्मिकोश्यतेऽखिलैरसौ ततः शिवोच्यते

परैवमीशितुश्चितिस्त्रिधा बुधैरुदीर्यते ।। ३४ ।।


चितिः परैव कामना रसेन केनचिद्युता

चितिः परैव सर्वदाऽप्यनन्त्यजस्य तु क्रिया ।

चितिः परैव गोचरावभासिका मतिः स्मृता

त्रितैवमन्यथा चितेश्चिरन्तनैरुदीर्यते ।। ३५।।


चिकीर्षति प्रभौ ज्वलत्त्वदीयकीलसन्तते

विकीर्णधूमजालमेतदम्बरस्थलं ततम् ।

विसृष्टितः पुराऽसि या शिवप्रभुत्वरूपिणी

पृथक्प्रभुश्च लक्षिताऽसि सा सवित्रि पुष्करे ।। ३६ ।।


पुनर्विपाकतो घनीभव‌द्भिरक्षिगोचरै-

स्ततस्ततः समुज्ज्वलैः खसूक्ष्मरेणुगोलकैः ।

अजाण्डवृक्षकोटिकन्दबृन्दवद्वयधाः पुरा

महेशदृष्टिमय्युमेऽम्ब मण्डलानि भास्वताम् ।। ३७ ।।


तपोऽग्निधूमजालके भवन्ति तैजसाणवो

भवन्ति जीवनाणवो भवन्ति पार्थिवाणवः ।

क्रमेण तद्विसृष्टिरीशशक्तिपाकवैभवे

सहस्रभानुमण्डलं तु गोचरादि गृह्यताम् ।। ३८ ।।


मयूखमालिमण्डले निधाय पादमुग्रया

मयूखशक्तिरूपया त्वयाऽम्ब चेष्टमानया ।

खकोशतः समाहृतैः पुनस्त्रिरूपरेणुभि

र्व्यधायि मङ्गलादिभिः सह ग्रहैरियं मही ।। ३९ ।।


विसर्जनेन भूयसाऽपि देव्यतृप्तयेयता

विचेष्टितं विलक्षणं पुनर्व्यधीयत त्वया ।

इहान्तरे वसुन्धरामयूखमालिबिम्बयो-

रमुष्य कर्मणः सवित्रि चन्द्रमण्डलं फलम् ।।४०।।


वधूपुमाकृती ततो बभूवथुर्युवां शिवे

त्वमीश्वरश्च लीलया विहर्तुमत्र विष्टपे ।

अहो प्रभुं नभस्तनुं त्वदीयगर्भसम्भवाद्-

भणन्ति कालि तत्र चित्रभाषणास्त्वदात्मजम् ।। ४१।।


पुमानथो स बिम्बतो हिरण्मयो दिवाकरे

धियाऽपि नैव केवलं हिरण्मयेन वर्म्मणा ।

इदं तु कार्यरूपमन्यदुच्यते बुधैः प्रभो-

रिहान्तरे नृणां पुनर्वपुस्तदम्ब बिम्बितम् ।। ४२ ।।


स्वयं च काञ्चनप्रकाशवर्ष्मणा प्रभाकरे

तथाऽन्तरे नृणां च तस्य बिम्बिताऽसि सन्निधौ ।

रसस्य देवताऽसि देवि पुष्करे दिवाकरे

मयूखदेवताऽसि भोगदेवताऽसि देहिषु ।। ४३ ।।


विसर्जनेन भूयसा नभस्यमुत्र भास्करे

महीषु चाम्बिके युवां विधाय देहिनो बहून् ।

क्षितेः सुधाकरं गतान् पितॄन् विनेतुमव्यये

तनू च तत्र बभ्रथुः प्रपञ्चराज्ञि मायया ।। ४४ ।।


नभोऽन्तरे हिरण्मयं विभुं प्रचक्षते हरं

दिनेशबिम्बबिम्बितं भणन्ति पङ्कजासनम् ।

इहास्मदन्तरालयं वदन्ति विष्णुमच्युतं

सवित्रि जन्मिनामियं त्रिमूर्तिवादिधोरणी ।। ४५।।


नभोऽन्तरे प्रचक्षते हिरण्मयाङ्गमीश्वरं

दिनेशबिम्बपूरुषं हिरण्यगर्भमाख्यया ।

विराजमानमक्षरं विराजमन्तरे नृणां

सवित्रि तत्त्ववेदिनामियं तु नामकल्पना ।। ४६।।


हिरण्मयाङ्गमम्बरे वदन्ति सोममम्बिके

दिवाकरस्य मण्डले तु बिम्बितं पुरन्दरम् ।

शरीरिणामिहान्तरेऽग्निमालपन्ति भासुरं

चिरन्तनोक्तिदर्शिनामियं शिवे प्रणालिका ॥४७॥


सरोरुहाक्षवाग्वधूमनोहरौ तु पूर्वव-

त्सुधांशुबिम्बपूरुषस्तु रुद्रसंज्ञकः शिवे ।

हिरण्मयोऽन्तरिक्षजात ईश्वरः सदाशिवः

सदेव वस्तु काञ्चनाङ्गि पञ्चमूर्तिवादिनाम् ।। ४८ ।।


प्रभोः प्रमाऽऽदितस्ततः प्रमावती स्वयं पृथग्

विहायसा शरीरिणी प्रभौ ततो हिरण्मये ।

हिरण्मयाङ्गनाकृतिर्नभोऽन्तरे च भास्करे

तथाऽन्तरेषु देहिनां महेश्वरी जयत्युमा ।। ४९ ।।


मदीयमम्बिकाऽखिलस्य विष्टपस्य दुष्टधी

दविष्ठपादपङ्कजा धुनोतु कष्टजालकम् ।

इमे च कोमलैः पदैरमूल्यतल्पशालिन-

स्तदीयमञ्चरूपतां भजन्तु पञ्चचामराः ।। ५० ।।

bottom of page