गणपति मुनि और सनातन धर्म में उपनयन की सार्वभौमिक दृष्टि
- Jyoti Modekurti

- Nov 21
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भूमिका
बीसवीं शताब्दी के आरंभिक काल में, जब जाति-आधारित भेदभाव अपनी चरम स्थिति पर था और समाज कठोर विभाजन की दीवारों से घिरा हुआ था, तब काव्यकण्ठ वसिष्ठ श्री गणपति मुनि—तप, विद्वत्ता और आध्यात्मिक तेज के प्रति-रूप बनकर, सनातन धर्म की मूल आत्मा को पुनः प्रज्ज्वलित करने के लिए आगे आए। उनकी अद्वितीय कृति “पञ्चजन चर्चा” उन रूढ़िवादी विचारों पर प्रहार करती है, जो श्रुति–स्मृति की सीमित व्याख्याओं से सामाजिक असमानता को उचित ठहराती थीं, विशेषकर उपनयन संस्कार जैसे आध्यात्मिक अनुष्ठान को समाज के बड़े हिस्सों से वंचित करने की प्रवृत्ति को।

सनातन धर्म में उपनयन संस्कार
“पञ्चजन चर्चा” के गंभीर अध्ययन से स्पष्ट होता है कि मुनि का उद्देश्य केवल किसी अनुष्ठानात्मक परंपरा में सुधार करना नहीं था, बल्कि एक आध्यात्मिक क्रांति को जन्म देना था—ऐसी क्रांति जो वेदों की एकात्म भावना को पुनर्जीवित करे, कृत्रिम सामाजिक बाधाओं को तोड़े और हर मानव को धर्म तथा वैदिक ज्ञान का सहज अधिकारी सिद्ध करे।
इस लेख में पञ्चजन चर्चा के सूत्रों को क्रमबद्ध रूप से प्रस्तुत किया गया है।
उपनयन संस्कार क्या है?
उपनयन वह पवित्र दीक्षा-संस्कार है, जिसके द्वारा एक नव-शिष्य को वैदिक अध्ययन एवं आध्यात्मिक अनुशासन की पथ-यात्रा में विधिवत प्रवेश कराया जाता है। ‘यज्ञोपवीत’ इसकी बाह्य पहचान है, परन्तु वास्तविक उपनयन, आंतरिक जागरण द्वारा व्यक्ति को शास्त्र, शील और साधना के मार्ग पर अग्रसर होने की पात्रता प्रदान करता है।
परंपरागत रूढ़ि ने इसे केवल तीन वर्णों—ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य—तक सीमित कर दिया।
परन्तु मुनि ने साहसपूर्वक पूछा:
क्या यह प्रतिबंध वेदसम्मत है? क्या यह मानव-स्वभावानुकूल है? क्या यह धर्म के मूल उद्देश्य के अनुरूप है?
और उनका उत्तर—गंभीर शास्त्रीय विमर्श पर आधारित—सुस्पष्ट था: “नहीं।”
रूढ़िवादी मत : “उपनयन नहीं हुआ तो वेदाधिकार नहीं”
सूत्र 67 में यह मत इस प्रकार मिलता है:
वेदानधिकारश्च तदुपनयनाश्रुतेः ॥ ६७ ॥
अर्थ : उपनयन के अभाव में वेदाधिकार नहीं।
इसके समर्थन में मनुस्मृति और गौतम धर्मसूत्र जैसे वचनों का सहारा लिया गया—जिसका उल्लेख सूत्र 68 में मिलता है।
इस प्रकार एक तर्क-श्रृंखला बनाई गई:
उपनयन नहीं → श्रवण नहीं → कर्म नहीं → अधिकार नहीं।
गणपति मुनि के प्रत्युत्तर : उपनयन मानव-मात्र का अधिकार
1. उपनयन केवल अध्ययन के लिए नहीं—मानवोत्थान के लिए है।
सूत्र 69: उपनयनं पुरुषार्थं नाध्ययनार्थं तस्मान्नैवमित्येके ॥ ६९॥
अर्थ — उपनयन का उद्देश्य केवल अध्ययन नहीं, बल्कि पुरुषार्थ—मानव का समग्र परिष्कार है।
जैसे जातकर्म पिता करता है और फल शिशु को मिलता है, वैसे ही उपनयन भी बाह्य रीति-निर्भर होकर भी आत्मिक संस्कार है—जाति-सीमा से परे है।
2. उपनयन के बिना भी ज्ञान का द्वार खुल सकता है।
सूत्र 73 : अनुपनीतस्यापि सम्भवति ह्यध्ययनम् ॥
इतिहास में अनेक प्रत्यक्ष उदाहरण हैं : शबरी, कई संत-भक्त, स्वयं वेदव्यास, याज्ञवल्क्य—जहाँ ज्ञान, उपनयन की औपचारिकता पर निर्भर नहीं रहा।
3. ज्ञान गुरु-कृपा या आत्म-साधना, दोनों से प्राप्त होता है।
सूत्र 74 : गुरुमुखात्स्वतन्त्रतया वा ॥
ज्ञान की उपलब्धि देव-कृपा, गुरु-अनुग्रह या व्यक्तिगत साधना—किसी भी मार्ग से संभव है।
केवल उपनयन इसका एकमात्र साधन नहीं।
वर्ण-विशेष विधानों की पुनर्व्याख्या
सूत्र 76 में मुनि तीक्ष्ण मीमांसा-तर्क का प्रयोग करते हुए कहते हैं :
त्रैवर्णिकोपनयनश्रुतिश्च निमित्तार्था भवति ॥ ७६ ॥
अर्थ : तीन वर्णों के संबंध में उपनयन-विधान निमित्त-विशेष हैं— अन्य वर्णों के लिए निषेध नहीं।
यहाँ मुनि समझाते हैं कि ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य के बारे में शास्त्रों में जो नियम हैं, वे केवल विशेष परिस्थितियों के लिए हैं (निमित्तार्थ हैं) है, सर्वदा सभी पर लागू होने वाले प्रतिबंध (नियमार्थ) नहीं हैं। अर्थात, ये नियम कुछ परिस्थितियों के लिए निर्देश देते हैं, दूसरों को रोकते नहीं।
सूत्र 81 में मुनि इसे और स्पष्ट करते हैं : इतरोपनयनस्य च शक्यत्वात्तस्यासामर्थ्यमनैसर्गिकम् ॥ ८१॥
अर्थ : अन्य जातियों के लिए भी उपनयन पूर्णतः संभव है। उनकी अयोग्यता स्वाभाविक नहीं—थोपित है।
भेदकारी स्मृतियों का मुनि द्वारा कठोर खंडन
सूत्र 84–85 में मुनि का स्वर अत्यंत प्रखर हो उठता है :
इतरोपनयननिषेधस्मृतयो हेतुदर्शनेन दुर्बलाः ॥८४॥
एते नेतरस्य श्मशानसाम्यस्मृतिश्च व्याख्याता ॥ ८५॥
वे स्पष्ट कहते हैं कि जो स्मृतियाँ उपनयन के निषेध का समर्थन करती हैं, वे—
तर्कविहीन,
धर्म-विरुद्ध,
और मृत तर्क (श्मशान तुल्य) हैं।
वे इन स्मृतियों को, “श्मशानसाम्यस्मृतिः” कहते हैं जो शमशान में पड़े मृतक की भांति निर्जीव हैं और जो जीवंत और सनातन धर्म के योग्य नहीं हैं।
मुनि का निष्कर्ष : उपनयन संस्कार — सभी मानवों का जन्मसिद्ध अधिकार
इस तर्क-श्रृंखला द्वारा, मुनि यह स्थापित करते हैं कि :
उपनयन एक सार्वभौमिक तथा आध्यात्मिक संस्कार है।
कोई श्रुति इसे किसी से वर्जित नहीं करती।
जो स्मृतियाँ निषेध करती हैं, वे तर्कहीन और अप्रासंगिक हैं।
धर्म का वास्तविक स्वरूप—समावेश, करुणा और उत्थान है, न कि विभाजन।
अतः “उपनयन एक धार्मिक संस्कार है, जिसे उचित परिस्थितियों में सभी जातियों तक बढ़ाया जा सकता है और कोई भी स्मृति जो इस समावेशी दृष्टिकोण के विपरीत हो, उसे अप्रचलित और अमान्य माना जाना चाहिए।”
यह दृष्टि आज भी क्यों प्रकाशमान है ?
यदि “पञ्चजन चर्चा”, श्री गणपति मुनि के काल में व्यापक रूप से जन-जन तक पहुँच पाती, तो धर्म की प्रामाणिकता के बल पर ही जातिभेद, अस्पृश्यता और असमानता को चुनौती दी जा सकती थी। मुनि का स्वर केवल सुधार का नहीं, बल्कि धर्म की पुनर्स्थापना का स्वर था—ऐसा स्वर जो कहता है कि सनातन धर्म का हृदय सार्वभौमिक है, संकीर्ण नहीं।
उनका संदेश आज भी अमर है :
सच्चा अध्यात्म कभी विभाजित नहीं करता—वह जोड़ता है, उठाता है और मुक्त करता है।
“पञ्चजन चर्चा” केवल एक विद्वत्तापूर्ण ग्रंथ नहीं, बल्कि यह उद्घोषणा है कि हर साधक—चाहे किसी भी जाति, क्षेत्र या जन्म से हो, वह एक ऋषि पुत्र है और ऋषियों की ज्ञान-परंपरा का समान हिस्सा है।
आज भी जब समाज में विभाजन की चुनौतियाँ विद्यमान हैं, गणपति मुनि की वाणी हमें स्मरण कराती है :
प्रत्येक आत्मा धर्म की अधिकारी है, प्रत्येक जीव प्रकाश का पात्र है।
इस कृति के संपूर्ण अनुवाद और टिप्पणी को पढ़ने की इच्छुक साधक-सभा, www.ganapatimuni.com
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