काव्यकण्ठ वासिष्ठ श्री गणपति मुनि विरचितम्
उमासहस्रम्
एकादशः स्तबकः - आर्यावृत्तम्

“पादादि-केशान्त-वर्णनम्” — अर्थात् “चरणों से केशों तक देवी के दिव्य स्वरूप का वर्णन” शीर्षक वाला यह ग्यारहवाँ स्तबक पिछले स्तबक की वर्णन-प्रणाली को जानबूझकर उलट देता है। श्री गणपति मुनि देवी के कमलवत् चरणों से आरम्भ करते हुए क्रमशः पाँव, पैर, जंघाएँ, कटि, नाभि, वक्षोज, भुजाएँ, कर, कण्ठ, मुख, ललाट, मन्दहास, अधर, नासिका, नेत्र, कर्ण और अन्ततः केशों तक ध्यान को ऊपर की ओर ले जाते हैं। इसलिए पादादि-केशान्त-वर्णनम् शीर्षक संरचना और भाव — दोनों दृष्टियों से पूर्णतः उपयुक्त है। ये श्लोक चरणों से केशों तक ऊपर उठते हुए एक दृश्य-ध्यान का रूप लेते हैं और देवी के प्रत्येक अंग को दिव्य सौन्दर्य, शक्ति, पोषण और करुणा की अभिव्यक्ति के रूप में प्रस्तुत करते हैं।
इस स्तबक की विशेष आकर्षकता यह है कि मुनि देवी के शरीर-सौन्दर्य के वर्णन में ही गहरे संकेतार्थ और देवतत्त्व सम्बन्धी सूचनाएँ समाहित कर देते हैं। वे तीनों लोकों को ही काव्यात्मक रूप से देवी के शरीर में प्रतिष्ठित करते हैं। उनके वक्षोज केवल गणपति और स्कन्द के ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण जगत् को अक्षय पोषण देने वाले अमृतस्रोतों के रूप में देखे जाते हैं। मुनि उनके हाथों का स्वरूप भी अत्यन्त कल्पनाशील ढंग से चित्रित करते हैं — राक्षस उनकी शक्ति से, सखियाँ उनके सौन्दर्य से, ऋषि उनकी दानशीलता से और स्वयं शिव उनकी कोमल स्पर्श-माधुरी से उनका अनुभव करते हैं। उनका मुख चन्द्रमा और कमल दोनों को मात देता है; उनके अधर स्वयं शिव के भीतर भी शृङ्गारभाव जगा देते हैं; और उनके नेत्र सौन्दर्य तथा करुणा के निवासस्थान बन जाते हैं। इस प्रकार देवी का स्वरूप मात्र अलंकारिक सौन्दर्य का विषय न रहकर मातृत्व, शक्ति, रस और विश्वसार्वभौमत्व से एक साथ परिपूर्ण विश्वरूप देह के रूप में प्रतिष्ठित होता है।
यह स्तबक श्री गणपति मुनि की विलोम-क्रम में वर्णन करने की क्षमता, बहुस्तरीय उपमान-रचना, श्लेष-सदृश संकेतात्मकता, मानवीकरण और चमत्कारपूर्ण अतिशयोक्ति पर उनकी असाधारण पकड़ को स्पष्ट करता है। पिछले केशादि-पादान्त स्तबक के अनेक बिम्ब यहाँ प्रतिध्वनि या पूरक रूप में दिखाई देते हैं। फिर भी उसी दिव्य स्वरूप को विपरीत दिशा से ध्यान का विषय बनाते हुए कहीं भी पुनरुक्ति का अनुभव न होने देना और हर बार नया भाव-सौन्दर्य रचना मुनि की विशिष्ट काव्यप्रतिभा का प्रमाण है।
स्वच्छन्द और सुललित आर्या छन्द के माध्यम से वे कोमलता, हास्य, शृङ्गार और भक्ति को अत्यन्त स्वाभाविक ढंग से एक साथ पिरोते हैं। अन्तिम श्लोक में वे इस समस्त काव्यधारा को एक सूत्र में बाँधते हुए इन्हें देवी के परम सौन्दर्य का चरणों से केशों तक गान करने वाले आर्या श्लोकों के रूप में प्रस्तुत करते हैं। इस प्रकार यह स्तबक पिछले केशादि-पादान्त-वर्णनम् के साथ मिलकर एक ही दिव्यमूर्ति को दो विपरीत ध्यान-दिशाओं में प्रकट करने वाली अद्भुत और परस्परपूरक काव्य-युगल रचना बन जाता है।
एकादशः स्तबकः - आर्यावृत्तम्
पादादिकेशान्तवर्णनम्
झषकेतुना प्रयुक्तः सम्मोहनचूर्णमुष्टिरीशाने ।
दरहासो धरदुहितुः करोतु भुवनं वशेऽस्माकम् ।। २५१।।
उपजीवद्भिः कान्तेर्लेशांस्ते जगति सुन्दरैर्भावैः ।
उपमितुमङ्गानि तव प्रायो लज्जेऽम्ब यतमानः ।। २५२।।
अवतंसपल्लवतुलां बिभ्राणं श्रुतिनतध्रुवः शिरसि ।
चरणं व्रजामि शरणं वामं कामारिललनायाः ।। २५३।।
शङ्करनयनोन्मादनमतिमधुरं भाति मतिमता वर्ण्ये।
जङ्घायुगं भवत्याः कुसुमपृषत्कस्य सर्वस्वम् ।। २५४।।
एकैकलोकने द्वयमन्योन्यस्मरणहेतुतामेति ।
देवि भवस्य तवोरुः शुण्डा च गजेन्द्रवदनस्य ।।॥ २५५॥
नाकोऽवलग्नमीश्वरि कटिरवनिर्भोगिनां जगन्नाभिः ।
कुक्षौ न केवलं ते बहिरपि वपुषि त्रयो लोकाः ।। २५६।।
मन्ये महाकृपाणं तव वेणीमचलपुत्रि मदनस्य ।
असिधेनुकां विशङ्के निशिततराग्रां तु रोमालिम् ।। २५७ ।।
द्विरदवदनेन पीतं षड्वदनेनाथ सकलभुवनेन ।
अक्षय्यक्षीरामृतमम्बायाः कुचयुगं जयति ।। २५८ ।।
जगदम्ब लम्बमाना पार्श्वद्वितये तवागलाद्भाति ।
सान्द्रग्रथितमनोज्ञप्रसूनमालेव भुजयुगली ।। २५९।।
जानन्ति शक्तिमसुराः सुषमां सख्यो वदान्यतामृषयः ।
मृदुतां तवाम्ब पाणेर्वेद स देवः पुरां भेत्ता ।। २६०।।
कम्बुसदृगम्ब जगतां मणिवेषोडुस्रजाकृताकल्पः ।
कण्ठोऽनघस्वरस्ते धूर्जटिदोर्नयनकर्णहितः ।। २६१ ।।
हरकान्ते वदनं ते दर्शं दर्शं वतंसशीतांशुः ।
पूर्णोऽप्यवाप कृशतां प्रायेणासूयया शुष्कः ।। २६२।।
चन्द्रं रणाय सकला चपलाक्षीवदनजातिराह्वयताम् ।
तं तु महसा मुखं ते महेशकान्ते जिगायैकम् ।। २६३ ।।
वदनकमलं तवेश्वरि कमलजयाद्दर्पितं सुधाभानुम् ।
निर्जित्य कमलजातेरमलं महदाजहार यशः ।। २६४।।
लावण्यमरन्दाशा भ्रमद्भवालोकबम्भरं परितः ।
मुग्धं मुखारविन्दं जयति नगाधीशनन्दिन्याः ।। २६५॥
शुद्धेन्दुसारनिर्मितमास्यार्धं ते भवानि भालमयम् ।
सकलरमणीयसारैर्निर्मितमर्धान्तरं विधिना ।। २६६।।
वदनं तवाद्रिदुहितर्विजिताय नताय शीतकिरणाय ।
द्वारपपदवीं प्रददा वयमिह दरहासनामधरः ।। २६७।।
ते ते वदन्तु सन्तो नयनं ताटङ्कमालयं मुकुटम् ।
कवयो वयं वदामः सितमहसं देवि ते हासम् ।। २६८ ।।
बिम्बाधरस्य शोभामम्बायाः को नु वर्णयितुमीष्टे ।
अन्तरपि या प्रविश्य प्रमथपतेर्वितनुते रागम् ।। २६९ ।।
गणपतये स्तनघटयोः पदकमले सप्तलोकभक्तेभ्यः ।
अधरपुटे त्रिपुरजिते दधासि पीयूषमम्ब त्वम् ।। २७० ।।
दृक्पीयूषतटिन्यां नासासेतौ विनिर्मिते विधिना ।
भासां भवति शिवे ते मुखे विहारो निरातङ्कः ।। २७१।।
कमलाविलासभवनं करुणाकेलीगृहं च कमनीये ।
हरदयिते विनतहिते नयने ते जननि विजयेते ।। २७२।।
सर्वाण्यप्यङ्गानि श्रीमन्ति तवेन्दुचूडकुलकान्ते ।
कविनिवहविनुतिपात्रे श्रोत्रे देवि श्रियावेव ।। २७३ ।।
अपि कुटिलमलिनमुग्धस्तव केशः पुत्रि गोत्रसुत्राम्णः ।
बिभ्रत्सुमानि कान्यपि हृदयं भुवनप्रभोर्हरति ।। २७४।।
चरणादिकुन्तलान्तप्रकृष्टसौन्दर्यगायिनीरेताः ।
अङ्गीकरोतु शम्भोरम्भोजदृगात्मजस्यार्याः ।। २७५।।
