काव्यकण्ठ वासिष्ठ श्री गणपति मुनि विरचितम्
उमासहस्रम्
द्वादशः स्तबकः - रथोद्धतावृत्तम्

“शृङ्गार-वर्णनम्” — अर्थात् “दिव्य प्रेम और शृङ्गार-सौन्दर्य का वर्णन” शीर्षक वाला यह बारहवाँ स्तबक पर्वतीय वनों की रमणीय पृष्ठभूमि में उमा देवी और भगवान शिव के बीच के आत्मीय, चपल और प्रेमपूर्ण दाम्पत्य-स्नेह का चित्रण करता है। भौंरे, मृग, कोकिलाएँ, पुष्पित लताएँ, सुगन्धित पवन, चन्द्रिका और वसन्त के मधुर स्वर — सब मानो उनके दिव्य प्रणय-विलास में सहभागी बन जाते हैं। शिव प्रेम और काव्यमय अनुराग से देवी से संवाद करते हुए उनके नेत्रों, अधरों, मन्दहास, केशों, वक्षोजों और कोमल चरणों की स्तुति करते हैं।
इसलिए शृङ्गार-वर्णनम् शीर्षक इस स्तबक के लिए पूर्णतः उपयुक्त है। पूरे स्तबक में शृङ्गाररस प्रधान रूप से प्रवाहित होता है और दिव्य दम्पति को केवल अमूर्त दार्शनिक तत्त्वों के रूप में नहीं, बल्कि माधुर्य, आकर्षण, चपलता और दाम्पत्य-अनुराग से भरे हुए जीवंत दिव्य युगल के रूप में प्रस्तुत करता है।
किन्तु मुनि इस शृङ्गार को साधारण इन्द्रिय-आकर्षण के स्तर तक सीमित नहीं रखते, बल्कि उसे एक उच्च दैवी अर्थ प्रदान करते हैं। ये प्रेमी कोई सामान्य युगल नहीं, बल्कि शिव और शक्ति हैं — वे विश्वतत्त्व जिनसे सम्पूर्ण सृष्टि का आविर्भाव होता है। इस प्रसंग के अद्भुत विरोधाभास को मुनि अत्यन्त सुन्दर ढंग से व्यक्त करते हैं: एक ओर उमा देवी महिषासुरमर्दिनी और तपोनिष्ठा में अचल देवी हैं, दूसरी ओर शिव स्वयं कामदहन हैं — फिर भी इन दोनों के बीच के प्रेमरहस्य को कौन पूरी तरह समझ सकता है? अन्ततः उनका दिव्य प्रणय गणपति और स्कन्द के आविर्भाव तथा उनके माध्यम से लोककल्याण से जुड़ता है। इस प्रकार बाहर से प्रेमलीला प्रतीत होने वाला प्रसंग विश्व-सृष्टि के मूल में स्थित दिव्य लीला का रूप ग्रहण कर लेता है, जिसमें प्रेम, सृष्टि और दैवी संकल्प एक-दूसरे से अविच्छिन्न हैं।
इस स्तबक में श्री गणपति मुनि की शृङ्गार-काव्य में निपुणता, प्रकृति-चित्रण, संवाद-कौशल, हास्यचातुर्य, शब्दप्रयोग और रस-पोषण की क्षमता विशेष रूप से उजागर होती है। वे शिव को अत्यन्त मानवीय, मनोहर और काव्यमय स्वर प्रदान करते हैं, फिर भी शिव और उमा दोनों की दैवी गरिमा कहीं भी कम नहीं होती। इस पूरे प्रसंग की गति, लालित्य और भावात्मक स्पन्दन को व्यक्त करने के लिए रथोद्धता छन्द अत्यन्त उपयुक्त सिद्ध होता है।
अन्तिम श्लोक में मुनि स्वयं इस काव्यधारा को माधुरी-रस-परिप्लुताः — अर्थात् माधुर्यरस से पूर्णतः आप्लावित — बताते हुए इन श्लोक-पादों को पर्वतराज की पुत्री उमा देवी की प्रसन्नता के लिए समर्पित करते हैं। इस प्रकार काव्य, भक्ति, पवित्र शृङ्गार और दैवी लीला का सूक्ष्म समन्वय प्रस्तुत करने वाला यह स्तबक तृतीय शतक का ललित, मधुर और भावपूर्ण समापन बन जाता है।
द्वादशः स्तबकः - रथोद्धतावृत्तम्
शृङ्गारवर्णनम्
शर्वधैर्यगुणशातशस्त्रिका शम्बरारिजयकेतुपद्मिका ।
मन्दहासकलिका मदापदं पर्वतेन्द्रदुहितुर्व्यपोहतु ।। २७६ ।।
मुक्तभोगिकटकेन पाणिना मुग्धगात्रि परिगृह्य ते करम् ।
एकदा शशिकिशोरशेखरः सञ्चचार रजताद्रिभूमिषु ।। २७७ ।।
तस्य तत्र परितः परिभ्रमन् वल्लभां वकुलपुष्पचुम्बिनीम् ।
पार्वति त्वदलकोपमद्युतिः चञ्चरीकतरुणो मनोऽधुनोत् ।। २७८ ।।
प्रेयसीं चपलचारुलोचनामुल्लिखन् वपुषि शृङ्गकोटिना ।
त्वद्विलोकितनिभैर्विलोकितैः धूर्जटेरमदयन्मनो मृगः ।। २७९।।
मञ्जुकुञ्जभवनानि मालतीपुष्परेणुसुरभिः समीरणः ।
पेशला च पिकबालकाकली मोहमीश्वरि हरस्य तेनिरे ।। २८० ।।
अग्रतः कुसुमशोभिता लताः पार्श्वतस्त्वमगपालबालिके ।
सर्वतो मदनशिञ्जिनीध्वनिर्धीरता कथमिवास्य वर्तताम् ।। २८१।।
कीरकूजितसमाकुले वने शम्भुमम्ब तव पार्श्ववर्तिनम् ।
आजघान मकरध्वजश्शरैरर्दयन्त्यवसरे हि शत्रवः ।। २८२।।
ताडितो मकरकेतुना शरैरंसदेशमवलम्ब्य पाणिना ।
एकहायनकुरङ्गलोचनां त्वामिदं किल जगाद शङ्करः ।। २८३।।
काकलीकलकलं करोत्यसौ बालचूतमधिरुह्य कोकिला ।
वाचमुद्गिर सरोजलोचने गर्वमुन्नतमियं विमुञ्चतु ।। २८४।।
फुल्लकुन्दमकरन्दवाहिनो मल्लिकामुकुलधूलिधारिणः ।
कम्पयन्ति शिशवः समीरणाः पल्लवानि हृदयं च तन्वि मे ।। २८५।।
वर्णनेन हृतचक्षुषः श्रियः सुप्रसन्नमधुराकृतीनि ते ।
अङ्गकानि दयिते भजेऽर्भकः स्वेदबिन्दुहरणेन वाऽनिलः ।। २८६ ।।
तावदेव मम चेतसो मुदे बर्हमेतदनघाङ्गि बर्हिणः ।
यावदक्षिपथमेष विश्लथो गाहते न कबरीभरस्तव ।। २८७ ।।
रागवानधर एष सन्ततं निर्मलद्विजसमीपवर्त्यपि ।
एभिरस्य सहवासतः प्रिये नेषदप्यपगतो निजो गुणः ।। २८८ ।।
चक्षुषः सुदति ते सगोत्रता कैरवैर्निशि दिने कुशेशयैः ।
कश्यपैरपि वसिष्ठबान्धवैर्भूसुपर्वण इव द्विगोत्रिणः ।। २८९।।
अल्पयाऽप्यतिसमर्थया स्मितज्योत्स्नया गगनगं हरत्तमः ।
केवलं सुवचनामृतं किरच्चन्द्रबिम्बमतुषारमाननम् ।। २९० ।।
नित्यमब्जमुखि ते परस्परश्लिष्टमश्लथपटीकुटीरगम् ।
शर्वरीभयविवर्जितं स्थलीचक्रवाकमिथुनं कुचद्वयम् ।। २९१ ।।
लालनीयमयि देवमौलिभिः कोमलं चरणपल्लवद्वयम् ।
कच्चिदद्रिपुरुहूतपुत्रिके न स्थली तुदति कर्कशा तव ।। २९२।।
एवमादि वदति त्रिलोचने त्वन्मुखे लसति मौनमुद्रया ।
आततान जलचारिकेतनो नर्तनं नगमहेन्द्रबालिके ।। २९३ ।।
देवि ते पुरजितावतंसितः पारिजातकुसुमस्स्रजा कचः ।
मानसं पुरजितोऽमुना हृतं स्मर्यते क्व मलिनात्मना कृतम् ।। २९४।।
ब्रह्मचर्यनियमादचञ्चला नायिका यदि लुलायमर्दिनी ।
नायकश्च सुमबाणसूदनो वेद को रतिरहस्यमेतयोः ।। २९५।।
लोचनोत्सवविधौ विशारदे वारिदावरणदोषवर्जिते ।
मर्दयत्यपि नभोगतं तमः श्यामिकारहितसुन्दराकृतौ ।। २९६ ।।
भाति शीतकिरणस्तनन्धये प्राणनायकजटाकुटीजुषि ।
शुभ्रपर्वततटे शुभाङ्गि ते सम्मदाय न बभूव का निशा ।। २९७ ।।
सन्तु भूषणसुधांशुदीधिति व्यक्तमुग्धमुखशोभयोर्मिथः ।
तानि तानि गिरिजागिरीशयोः क्रीडितानि जगतो विभूतये ।। २९८ ।।
मोदकादनपरस्य सृष्टये क्रीडितं जननि वां किमप्यभूत् ।
शक्तिभृत्तनयरत्नजन्मने किञ्चिदीश्वरि बभूव खेलनम् ।। २९९ ।।
माधुरीरसपरिप्लुता इमाः काव्यकण्ठविदुषो रथोद्धताः ।
आदधत्वचलनाथनन्दिनी मानसे कमपि मोदमुत्तमम् ।। ३०० ।।
।। समाप्तं च तृतीयं शतकम् ।।
