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काव्यकण्ठ वासिष्ठ श्री गणपति मुनि विरचितम्

उमासहस्रम्

त्रयोदशः स्तबकः - उपजातिवृत्तम्

Uma Sahasram - The 1000 Verses Magnum Opus of Sri Ganapati Muni

“कटाक्षः” — अर्थात् “देवी की अनुग्रहपूर्ण पार्श्व-दृष्टि” शीर्षक वाला यह तेरहवाँ स्तबक उमा देवी के कटाक्ष की रूपान्तरकारी शक्ति का समग्र गान करता है। मुनि उनके कटाक्ष को करुणामय, शान्तिदायक, शुद्धिकारक, रक्षक, शक्तिदायक और अप्रतिहत बताते हैं। उनके कटाक्ष का अणुमात्र अनुग्रह भी अज्ञान को दूर कर सकता है, दुःख को शान्त कर सकता है, वाक्-वैभव और काव्यशक्ति प्रदान कर सकता है, धैर्य, ऐश्वर्य और कीर्ति दे सकता है तथा भक्त को विपत्तियों से बचा सकता है। इसलिए कटाक्षः शीर्षक पूर्णतः सार्थक है। पूरे स्तबक में दिव्यमाता की अनुग्रह-दृष्टि से उत्पन्न होने वाले आध्यात्मिक, मानसिक और लौकिक फलों के अनेक आयाम विस्तार से प्रकट होते हैं।


इन श्लोकों की एक विशेषता यह है कि मुनि देवी के कटाक्ष को सजीव और अनेक बार चमत्कारपूर्ण विरोधी बिम्बों के माध्यम से व्यक्त करते हैं। उनका कटाक्ष शीतलता प्रदान करने वाला है, फिर भी शिव के भीतर प्रेमाग्नि प्रज्वलित कर सकता है; दुःखियों के प्रति कोमल है, पर विरोधी शक्तियों के सामने उग्र हो सकता है; वह सामान्य मनुष्य पर भी बिना भेदभाव के पड़ सकता है, किन्तु उसी को महान स्थिति तक उठा सकता है। कहीं उसे सर्प के समान, कहीं वर्षामेघ के समान, कहीं औषधि, करुणा की नदी अथवा प्रकृति के सामान्य नियमों को उलट देने वाली रहस्यमयी शक्ति के समान चित्रित किया गया है। इन रूपकों के माध्यम से मुनि कटाक्ष को साक्षात् अनुग्रहशक्ति — प्रत्येक जीव की आवश्यकता के अनुसार कार्य करने वाली दिव्य कृपा के रूप में प्रस्तुत करते हैं। वह सत्पात्रों का पोषण करती है, विरोधियों को संयमित करती है और भीतर सुप्त शक्तियों को जागृत करती है।


यह स्तबक श्री गणपति मुनि की उपमा, रूपक, विरोधाभास, श्लेष-सदृश शब्दचातुर्य और भक्तिरस से युक्त विनोदपूर्ण काव्यकुशलता को भी अद्भुत रूप से प्रकट करता है। गम्भीर दार्शनिक संकेतों से लेकर कल्पनाशील काव्य-चमत्कारों तक वे अत्यन्त सहजता से विचरते हैं, फिर भी पूरे स्तबक की भाव-एकता कहीं भंग नहीं होती। उपजाति छन्द इन श्लोकों को गाम्भीर्य के साथ सहज प्रवाह प्रदान करता है, जिससे स्तुति, प्रार्थना और काव्यचातुर्य स्वाभाविक रूप से एक साथ मिल जाते हैं।


इस प्रकार यह स्तबक अनुग्रह पर एक अत्यन्त प्रभावशाली ध्यान बन जाता है। मुनि की दृष्टि में देवी का कटाक्ष केवल उनके सौन्दर्य से जुड़ी एक नेत्र-भंगिमा नहीं है; वह शुद्ध करने वाली, रक्षा करने वाली, सुप्त शक्ति को जागृत करने वाली और जीवन को पूर्णता की ओर ले जाने वाली सजीव दिव्यशक्ति है।


चतुर्थं शतकम्


त्रयोदशः स्तबकः - उपजातिवृत्तम्

कटाक्षः


भवाम्बुधिं तारयताद्भवन्तं हासोऽद्भुतः कुञ्जरवक्त्रमातुः ।

यो हन्ति बिम्बाधरलङ्घनेऽपि व्यक्तालसत्वो हरितां तमांसि ।। ३०१।।


सक्तः सदा चन्द्रकलाकलापे सर्वेषु भूतेषु दयां दधानः ।

गौरीकटाक्षो रमणो मुनिर्वा मदीयमज्ञानमपाकरोतु ।। ३०२।।


कृपावलोको नगकन्यकायाः करोतु मे निर्मलमन्तरङ्गम् ।

येनाङ्कितः शङ्कर एकतत्त्वं विश्वं लुलोके जगते जगौ च ।। ३०३ ।।


कालीकटाक्षो वचनानि मह्यं ददातु मोचामदमोचनानि ।

यत्पातपूतं रघुवंशकारं नराकृतिं प्राहुरजस्य नारीम् ।। ३०४ ।।


युष्माकमग्र्यां वितनोतु वाणीमेणीदृगेषा गिरिशस्य योषा ।

यस्याः कटाक्षस्य विसारि वीर्यं गिरामयं मे विविधो विलासः ।। ३०५।।


नगात्मजायाः करुणोर्मिशाली दृगन्तसन्तानधुनीप्रवाहः ।

भीष्मेण तप्तान्भवनामकेन ग्रीष्मेण युष्माँच्छिशिरीकरोतु ।। ३०६।।


अजस्रमार्द्रा दययाऽन्तरङ्गे यथा भवो निम्नगयोत्तमाङ्गे ।

सन्तापशान्ति भवसुन्दरी मे करोतु शीतेन विलोकितेन ।। ३०७ ।।


पुण्या सदाऽपीश्वर एव सक्ता पतिव्रतासाम्यमिता तवेक्षा ।

कुलाचलाधीश्वरकन्यके मे संहारमंहोविततेर्विधत्ताम् ।। ३०८ ।।


शर्वस्य रामे नियमेन हीना श्यामा तवेक्षा गणिकाङ्गनेव ।

नीचेऽपि मर्त्ये निपतत्यनर्घा बिभर्ति ना षोडश यः सुवर्णान् ।। ३०९।।


पद्मायताक्षि क्षितिधारिकन्ये कटाक्षनामा तव कालसर्पः ।

यं सन्दशत्येष जगत्समस्तं विस्मृत्य चाहो न दधाति मोहम् ।। ३१०।।


ईशद्विषा शैलमहेन्द्रकन्ये करोति मैत्रीं विषमायुधेन ।

प्रभाषते पातकिनश्च पक्षे कुतः कटाक्षो न तवाम्ब मुग्धः ।। ३११।।


कृपान्वितः कर्णसमीपचारी श्रीमान्सदा पुण्यजनानुकूलः ।

साम्यं कुरूणामधिपस्य शम्भोः प्राणप्रिये ते भजते कटाक्षः ।। ३१२ ।।


कर्णान्तिकस्थोऽपि न धर्मवैरी कृष्णोऽपि मातर्नकुलं न पाति ।

शीतोऽपि सन्दीपयति स्मराग्निं हरस्य ते शैलसुते कटाक्षः ।। ३१३।।


अयं कटाक्षस्तव तोयवाहः कारुण्यकाले परिजृम्भमाणः ।

गृहेषु लीनान् सुखिनो विहाय निराश्रयान् सिञ्चति विश्वमातः ।। ३१४ ।।


कस्यापि वाचा वपुषा बलेन समस्य सर्वैरपि यन्निदेशाः ।

अम्भोधिवेलास्वपि न स्खलन्ति शम्भोः प्रियेऽयं तव दृक्प्रसादः ।। ३१५।।


द्वारेषु तेषां विचरन्ति शूराः सौधेषु सारङ्गदृशस्तरुण्यः ।

प्रगल्भवाचः कवयः सभासु शर्वाणि ते येषु कृपाकटाक्षः ।। ३१६ ।।


यत्राम्ब ते कोऽपि कटाक्षलेशः स दुर्जयः सङ्गरसीम्नि शूरः ।

पूर्वं दिवं पूरयति द्विषद्भिस्ततो यशोभिर्भुवमिन्दुगौरैः ।। ३१७ ।।


यं तारकाकान्तकलापकान्ते न लोकसे कोऽपि न लोकते तम् ।

यं लोकसे तेन विलोकितोऽपि श्रियं समृद्धां समुपैति लोकः ।। ३१८ ।।


सुधां हसन्ती मधु चाक्षिपन्ती यशो हरन्ती वनिताधरस्य ।

परिष्करोत्यस्य कवित्वधारा मुखं हरप्रेयसि लोकसे यम् ।। ३१९।।


सर्वेन्द्रियानन्दकरी पुरन्ध्री विद्याऽनवद्या विपुला च लक्ष्मीः ।

इयं त्रिरत्नी पुरुषस्य यस्य दुर्गे त्वया दृष्टमिमं तु विद्मः ।। ३२०।।


मुधा क्षिपस्यद्रिसुते कटाक्षान् कैलासकान्तारमहीरुहेषु ।

इतः किरेषत्तव नास्ति हानिः सिद्ध्यत्यभीष्टं च समस्तमस्य ।। ३२१।।


शीताचलाधीशकुमारि शीतः संरक्षणे संश्रितमानवानाम् ।

दुर्धर्षदुष्टासुरमर्दनेषु नितान्तमुष्णश्च तवावलोकः ।। ३२२ ।।


रुषा समेतं विदधाति नाशं करोति पोषं कृपया सनाथम् ।

अम्बौषधस्येव तवेक्षितस्य योगस्य भेदेन गुणस्य भेदः ।। ३२३ ।।


नाशाय तुल्योद्धतकामलोभक्रोधत्रिदोषस्य भवामयस्य ।

शिवप्रिये वीक्षितभेषजं ते क्रीणानि भक्त्या वद भोः कियत्या ।। ३२४।।


अभिष्टुतां चारणसिद्धसङ्गैस्त्रिष्टुब्विशेषा अपि मर्त्यसूनोः ।

कृपाकटाक्षैर्विनतान्पुनानां कपर्दिनः सम्मदयन्तु कान्ताम् ।। ३२५।।

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