काव्यकण्ठ वासिष्ठ श्री गणपति मुनि विरचितम्
उमासहस्रम्
पञ्चदशः स्तबकः - स्वागतावृत्तम्

“शक्तेः स्वागतम्” — अर्थात् “दिव्यशक्ति का स्वागत” शीर्षक वाला यह पन्द्रहवाँ स्तबक योगी के शरीर में देवी के जागृत होने पर प्रकट होने वाले अन्तरानुभव का अत्यन्त सजीव वर्णन करता है। मुनि देवी को समस्त जीवों के भीतर अन्तर्निहित सूक्ष्म सारस्वरूपिणी के रूप में देखते हैं और संकेत करते हैं कि अन्तःशुद्धि, तपस् तथा प्राण और चेतना के आन्तरिक मन्थन के द्वारा उनकी वास्तविक शक्ति का अनुभव किया जा सकता है। इसके बाद इस अन्तर्योग की प्रक्रिया को मूलाधार, ऊपर उठती अग्नि, सहस्रदल-पद्म, चन्द्रामृत और वहाँ से नीचे प्रवाहित होने वाली आनन्दधारा के क्रम में चित्रित किया गया है। जागृत शक्ति अन्ततः सम्पूर्ण शरीर को आनन्द-प्रवाह से भर देती है। श्लोक 374–375 में स्तबक का शीर्षक अपने पूर्ण अर्थ को प्राप्त करता है: अपने भीतर प्रवेश कर सहस्रार तक पहुँच चुकी और दिव्य लीला के लिए उद्यत जगद्वन्द्या माता का मुनि प्रत्यक्ष रूप से “स्वागतम्!” कहकर अभिनन्दन करते हैं।
यह स्तबक अन्तर्यज्ञ की भावना का भी अत्यन्त गम्भीर विवेचन प्रस्तुत करता है। सामान्य रूप से चलने वाली श्वास, शरीर की गतियाँ और ग्रहण-क्रियाएँ जब साक्षीभाव से तथा पूर्ण चेतना के साथ देखी जाती हैं, तब वे आध्यात्मिक मन्थन का रूप ग्रहण कर लेती हैं। कुलकुण्ड की अग्नि योगी के लिए निरन्तर अग्निहोत्र बन जाती है और शिरःप्रदेश से प्रवाहित होने वाली अमृतधारा सोम के रूप में देखी जाती है। क्या देवी इस सोम का पान करती हैं? क्या वही स्वयं सोम हैं? अथवा पान करने वाला, पान की वस्तु और पान की क्रिया — ये तीनों ही वही हैं? ऐसे प्रश्नों के माध्यम से मुनि अनुभवकर्ता और अनुभव के बीच के भेद को क्रमशः विलीन कर देते हैं। इस आनन्दरस को वे तैत्तिरीय परम्परा में वर्णित ‘रस’ तथा तन्त्र में प्रतिपादित ‘परामृत’ से जोड़ते हुए वैदिक, उपनिषद्, तान्त्रिक और योगिक शिक्षाओं को एक ही प्रत्यक्ष अनुभूति की दृष्टि में समन्वित करते हैं।
इस स्तबक में मुनि की रचना केवल शास्त्रीय पाण्डित्य का परिचय नहीं देती, बल्कि सूक्ष्म योगानुभवों का अत्यन्त सटीक वर्णन करने वाले साधक-योगी की प्रत्यक्ष अनुभूति का स्वर भी सुनाई देता है। सोने को गलाकर शुद्ध करना, अरणि-काष्ठों के मन्थन से अग्नि उत्पन्न करना, सोम का निष्पीड़न, चन्द्रमय मेघों से अमृतवर्षा होना और मज्जा तक में प्रवाहित होती आनन्दधारा — ऐसे सजीव बिम्बों द्वारा वे अत्यन्त सूक्ष्म योगिक अवस्थाओं को स्पष्ट काव्यात्मक रूप प्रदान करते हैं।
यहाँ स्वागता छन्द का प्रयोग विशेष काव्यचातुर्य के साथ हुआ है। छन्द का नाम स्वागता अन्ततः भवानी को संबोधित किए गए “स्वागतम्” के रूप में ही भावपूर्ण अर्थ प्राप्त करता है। इस प्रकार छन्द, तत्त्व और व्यक्तिगत योगानुभव — तीनों एकाकार हो जाते हैं। कवि केवल दूर खड़े होकर शक्ति का वर्णन नहीं करते, बल्कि अपने ही शरीर में चेतना, अमृत और आनन्द के रूप में जागृत हुई दिव्यमाता की उपस्थिति का हृदयपूर्वक स्वागत करते हैं।
पञ्चदशः स्तबकः - स्वागतावृत्तम्
शक्तेः स्वागतम्
आपदामपहरन्तु ततिं नः सम्पदामपि दिशन्तु समृद्धिम् ।
दन्तकुन्दरुचिदत्तबलानि व्योमकेशसुदृशो हसितानि ।। ३५१।।
अल्पमप्यधिकशक्तिस मृद्धं मन्दमप्यधिकसूक्ष्मविसारम् ।
सुस्मितं स्मरविरोधिरमण्याः कल्पतां मम कुलस्य शुभाय ।। ३५२ ।।
पुष्कराद्रविमतो भुवमेतां भूमितश्शशधरं क्रममाणा ।
नैव मुञ्चति पदं बत पूर्वं नोत्तरं व्रजति नेशपुरन्ध्री ।। ३५३।।
भूषणेष्विव सवित्रि सुवर्णं मृत्तिकामिव घटेष्वखिलेषु ।
विश्ववस्तुषु निरस्तविशेषां देवि पश्यति सतीं विबुधस्त्वाम् ।। ३५४।।
किट्टभूतमखिलेश्वरजाये दृश्यजातमखिलं निजपाके ।
प्राणबुद्धिमनसामिह वर्गः सारभूत इति सूरिजनोक्तिः ।। ३५५।।
सारमीश्वरि तिलेष्विव तैलं विग्रहेषु निखिलेषु निगूढम् ।
ये धिया मथनतो विदुरेकं ते भवन्ति विबुधास्त्वयि लीनाः ।। ३५६।।
आयसं त्रिभुवनेश्वरि पिण्डं वह्निनेव तपसा तनुपिण्डम् ।
यस्य चिज्ज्वलनजालमयं स्यात् तप्तमम्ब स तवालयभूतः ।। ३५७।।
योऽरणेर्मथनतोऽतिपवित्रं वीतिहोत्रमिव वीतकलङ्कः ।
प्राणमुज्ज्वलयति स्वशरीरात् त्वामसावभयदेऽर्हति यष्टुम् ।। ३५८ ।।
प्राणता श्वसितमेव विचार्यं कुर्वता करणमेव निभाल्यम् ।
गच्छता गमनमेव विशोध्यं तत्तनौ मथनमागमबोध्यम् ।। ३५९ ।।
यो रसं पिबति मूर्धसरोजात् सोमपोऽयमनघः प्रयतात्मा ।
अग्निहोत्रमखिलेश्वरि नित्यं मूलकुण्डदहनस्थितिरस्य ।। ३६०।।
चिन्मयी पिबसि सोममिमं किं सोम एव किमसावसि मातः ।
पीयसे पिबसि च स्वयमेका पेयपातृयुगलं किमु भूत्वा ।। ३६१।।
तैजसं कनकमग्निवितप्तं तेज एव कनकाङ्गि यथा स्यात् ।
मोदरूपकलया तव तप्तं तन्मयं भवति मोदजपिण्डम् ।। ३६२।।
काऽपि मोदलहरी तव वीचिर्निर्गता दशशतारसुधाब्धेः ।
पूरयत्यखिलमम्ब शरीरं नेह वेद्मि परमे जडभागम् ।। ३६३।।
सेयमुत्तमतमा निपतन्ती शीतलाद्दशशतारपयोदात् ।
प्रेरितादखिलराज्ञि भवत्या बुद्धिसस्यमवताद्रसवृष्टिः ।। ३६४।।
दुग्धसिन्धुमथनादमृतं वा शब्दसिन्धुमथनात्प्रणवो वा ।
लभ्यते सुकृतिभिस्तव वीचिर्मूर्धकञ्जमथनाद्रस एषः ।। ३६५।।
अस्थिषु प्रवहति प्रतिवेगं मज्जसारममृतं विदधाना ।
बिभ्रति मदमनुष्णमदोषं मूर्धकञ्जनिलये तव धारा ।। ३६६।।
तैत्तिरीयकथितो रसलाभः सोऽयमेव सकलागमवण्यें ।
एतदेव शशिमण्डलनाथे तन्त्रभाषितपरामृतपानम् ।। ३६७।।
मूर्धसोममजरामररूपे युक्तवीक्षणकरेण निपीड्य ।
शम्भुसुन्दरि सुनोमि धिनोमि त्वां प्रदीप्तकुलकुण्डनिशान्ताम् ।। ३६८ ।।
दृष्टिरेव रविदीधितिरुग्रा शीर्षकञ्जशशिनं प्रविशन्ती ।
शीतलामृतमयी खलु भूत्वा योगिनो द्रवति मोदकला ते ।। ३६९ ।।
मूर्धनि द्रवसि योगयुतानां चक्षुषि ज्वलसि शङ्करभामे ।
तिष्ठसि स्थिरपदा कुलकुण्डे बाह्यतः स्खलसि नैव कदाऽपि ।। ३७० ।।
सा यदि द्रवति मोदकला स्यात् सा यदि ज्वलति चित्कलिका स्यात् ।
सा परा स्थिरपदा यदि तिष्ठत्यक्षरा भवति काचन सत्ता ।। ३७१।।
पश्यता नयनमण्डलवृत्तिं गृह्यसे त्वमचलाधिपकन्ये ।
जानता दशशतारविलासं स्पृश्यसे विदितमम् ब रहस्यम् ।। ३७२ ।।
व्याप्तशक्त्यसुबलेन लसन्ती भानुबिम्बनयनेन तपन्ती ।
चन्द्रबिम्बमनसा विहरन्ती सा पुनर्जयति मूर्ध्नि वसन्ती ।। ३७३।।
स्वागतं सकललोकनुतायै स्वागतं भुवनराजमहिष्यै ।
स्वागतं मयि भृशं सदयायै स्वागतं दशशतारमितायै ।। ३७४।।
सत्कविक्षितिभुजो ललिताभिः स्वागताभिरनघाभिरिमाभिः ।
स्वागतं भणितमस्तु भवान्यै खेलनाय शिर एतदितायै ।। ३७५।।
