काव्यकण्ठ वासिष्ठ श्री गणपति मुनि विरचितम्
उमासहस्रम्
षोडशः स्तबकः - कुमारललितावृत्तम्

“अध्यात्मं शक्तिवैभवम्” — अर्थात् “अन्तरंग में प्रकाशित होने वाला शक्ति का वैभव” शीर्षक वाला यह सोलहवाँ स्तबक पूर्णतः अन्तर्मुख दिशा ग्रहण करता है और उमा देवी को चेतना, अहंभाव, स्मृति, ध्यान और मुक्ति — इन सभी के मूल में कार्यरत पराशक्ति के रूप में प्रस्तुत करता है। उनकी स्तुति की जा सकती है, उनका स्मरण किया जा सकता है, उन्हें हृदय में धारण किया जा सकता है और प्रत्यक्ष ज्ञान में उनका साक्षात्कार किया जा सकता है। श्लोक यह बताते हैं कि साधक की उपासना के अनुरूप वे इच्छाओं की पूर्ति, अन्तःशुद्धि, शक्ति और अन्ततः मोक्ष प्रदान करती हैं। इसलिए इस स्तबक का शीर्षक पूर्णतः सार्थक है। यहाँ मुनि केवल शक्ति की विश्वव्यापी महिमा का वर्णन नहीं करते, बल्कि व्यक्तिगत चेतना के अन्तर्निहित आधार और आन्तरिक रूपान्तरण की मूलशक्ति के रूप में उनकी आध्यात्मिक उपस्थिति को उद्घाटित करते हैं।
इस स्तबक की प्रमुख शिक्षा अहं-मति — अर्थात् “मैं” के भाव — के मूल का अन्वेषण है। यहाँ मुनि रमण महर्षि द्वारा प्रतिपादित आत्मविचार की दृष्टि का स्पष्ट स्मरण कराते हुए अहंभाव की धारा के मूल में ही दिव्यमाता का दर्शन करते हैं। जब दृष्टि बाहर की ओर मुड़ती है, तब अनेकता दिखाई देती है; वही दृष्टि जब अन्तर्मुख होती है, तब देवी से भिन्न कोई दूसरा सत्य शेष नहीं रहता। आगे के श्लोक और अधिक प्रत्यक्ष योगानुभव का स्वर ग्रहण करते हैं।
शिरःप्रदेश के सहस्रदल-पद्म को पूर्ण विकसित पुष्प के रूप में चित्रित किया गया है और उसके अमृत का पान करने वाली महाभ्रमरी के रूप में देवी का दर्शन कराया गया है। अन्ततः मुनि अपने कर्तृत्वभाव और व्यक्तित्व को ही उनके चरणों में समर्पित करते हुए घोषित करते हैं कि जिसे अब तक वे “मेरा” मानते थे, वह सब अब देवी का हो चुका है; वे अपने शरीर को भी देवी के निवासस्थानों में से एक के रूप में स्वीकार करने की प्रार्थना करते हैं।
यह स्तबक श्री गणपति मुनि की अद्वैत आत्मविचार, शाक्ततत्त्व, कुण्डलिनीयोग और व्यक्तिगत रहस्यात्मक अनुभव — इन चारों धाराओं को एक ही संक्षिप्त काव्यरूप में समन्वित करने की दुर्लभ क्षमता को प्रकट करता है। एक ओर उनकी भाषा दार्शनिक दृष्टि से अत्यन्त सूक्ष्म और सटीक रहती है, तो दूसरी ओर वही भाषा जगन्माता के साथ अत्यन्त निकट और आत्मीय संवाद का रूप ले लेती है। अहंभाव, पद्म, अमृत, भ्रमर, अमृतसागर और चेतनानगरी जैसे रूपकों के माध्यम से वे अत्यन्त सूक्ष्म अन्तरानुभवों को सजीव और सहज बोधगम्य रूप प्रदान करते हैं।
सुकुमार कुमारललिता छन्द इस अन्तर्मुख भावप्रवाह के लिए अत्यन्त अनुकूल सिद्ध होता है। चतुर्थ शतक का समापन करने वाला यह स्तबक पूर्ववर्ती अनेक तत्त्वों को एक ही परम अनुभूति में समन्वित करता है: समस्त विश्व को संचालित करने वाली वही पराशक्ति अन्तःकरण में “मैं” के भाव के मूल के रूप में, चेतनाशक्ति के रूप में, मुक्ति प्रदान करने वाली दैवी शक्ति के रूप में और योगी के अपने शरीर में निवास करने वाली जगन्माता के रूप में अनुभूत होती हैं।
षोडशः स्तबकः - कुमारललितावृत्तम्
अध्यात्मं शक्तिवैभवम्
महोविहतमोहं महेशमहिलायाः ।
स्मितं वितनुतान्मे गृहेषु महमग्र्यम् ।। ३७६ ।।
इयद्बहुलगोलं जगल्लघु दधाना ।
पितामहमुखैरप्यखण्डितविधाना ।। ३७७।।
अदुष्टचरितेभ्यः शुभान्यभिदधाना ।
कुलानि मलिनानां हतानि विदधाना ।। ३७८।।
दुकूलमरुणांशुप्रभं परिदधाना ।
हरस्य रजताद्रिक्षितीशितुरधीना ।। ३७९ ।।
मुनीन्द्रकृततन्त्रप्रसिद्धबहुदाना ।
उमा बलमलं नस्तनोत्वतुलमाना ।। ३८०।।
निरस्तविषयां यद् दधाति मतिकीलाम् ।
समस्तजगदीशे धृतिस्तव मतेयम् ।। ३८१।।
श्रुता प्रवणचित्तं स्मृता नरमपापम् ।
धृता हृदि विधत्से गतस्वपरभावम् ।। ३८२।।
अहंमतितटिन्याः सतामवनिमूलम् ।
त्वमेव किल सेयं महर्षिरमणोक्तिः ।। ३८३।।
अहंमतिलतायास्त्वय ीशवधु कन्दे ।
स्थितोऽम्ब भुवनस्य प्रविन्दति रहस्यम् ।। ३८४।।
यदेतदखिलाम्ब प्रसिद्धमिव दृश्यम् ।
तवैव किल जालं गतो भणति मूलम् ।। ३८५।।
प्रपश्यसि पराची जगद्विविधभेदम् ।
स्वतः किमपि नान्यत्प्रतीचि पुरतस्ते ।। ३८६ ।।
स्तुता भवसि शश्वत् स्मृता च भजने त्वम् ।
धृता भवसि योगे तता भवसि बोधे ।। ३८७।।
स्तुता दिशसि कामं स्मृता हरसि पापम् ।
धृताऽस्यधिकशक्त्यै तता भवसि मुक्तयै ।। ३८८ ।।
विशुध्यति यताशी प्रमाद्यति न शुद्धः ।
प्रमादरहितस्य स्फुटे लससि कञ्ज ।। ३८९।।
स्फुटं यदि सरोजं नटीव पटु नाट्यम् ।
करोषि यतबुद्धेर्जगज्जननि शीर्षे ।। ३९० ।।
शिरोगतमिदं नः प्रफुल्लमयि पद्ममम्।
अनल्पमकरन्दं त्वमम्ब भव भृङ्गी ।। ३९१।।
सरोजमतुदन्ती पिबाम्ब मकरन्दम् ।
महामधुकरि त्वं भजेर्मदममन्दम् ।। ३९२।।
अमङ्गलमितः प्राङ् मयेशवधु भुक्तम् ।
इतः परममेये सुखान्यनुभव त्वम् ।। ३९३ ।।
अहङ्कृतिवशान्मे चिदीश्वरि पुराऽभूत् ।
तवाभवदिदानीं ममास्ति न विभुत्वम् ।। ३९४।।
यदाऽभवदियं मे तदाऽन्वभवदार्तिम् ।
तवेश्वरि भवन्ती भुनक्तु शमिदानीम् ।। ३९५।।
करोत्वियमहन्ता विवादमधुनाऽपि ।
तथाऽपि पुरतस्ते महेश्वरि विवीर्या ।। ३९६ ।।
इयं च तव बुद्धेर्यतो भवति वृत्तिः ।
इमामपि कुरु स्वां क्षमावति विरोषा ।। ३९७।।
सुधाब्धिरिह मातस्तरङ्गशतमाली ।
चिदभ्रपुरमत्र प्रभापदमदभ्रम् ।। ३९८ ।।
कुरु त्वमिदमेकं निजालयशतेषु ।
सवित्रि विहरास्मिन् यथेष्टमयि देहे ।। ३९९ ।।
कुमारललितानां कृतिर्गणपतीया ।
करोतु मुदमेषा कपर्दिदयितायाः ।। ४०० ।।
।। समाप्तं च चतुर्थं शतकम् ।।
