काव्यकण्ठ वासिष्ठ श्री गणपति मुनि विरचितम्
उमासहस्रम्
अष्टादशः स्तबकः - प्रहर्षिणीवृत्तम्

“रूपविशेषाः कुण्डलिनी-समुल्लासश्च” — अर्थात् “देवी के विशिष्ट रूप और कुण्डलिनी का उल्लासपूर्ण विकास” शीर्षक वाले इस अठारहवें स्तबक में परस्पर सम्बद्ध दो प्रमुख विषय स्पष्ट रूप से सामने आते हैं। पहले भाग में श्री गणपति मुनि बताते हैं कि एक ही देवी भक्त के स्वभाव, भावना और ध्यान के अनुरूप अनेक रूप धारण करती हैं — कहीं वे नीलवर्णा और उग्ररूपिणी हैं; कहीं उदयमान सूर्य के समान तेजोमयी; कहीं चन्द्रमा की भाँति श्वेतवर्णा और पुस्तकधारिणी; तो कहीं ऐसा अनिर्वचनीय सौन्दर्य धारण करती हैं जो स्वयं शिव को भी मोहित कर सके। इसके बाद मुनि अत्यन्त चमत्कारपूर्ण ढंग से प्रश्न करते हैं कि उनके आभूषण, वस्त्र और दिव्य अलंकारों का वास्तविक स्वरूप क्या है, और अन्ततः संकेत करते हैं कि ये सभी रूप उनके अपने दिव्य संकल्प से ही प्रकट होते हैं। इस प्रकार शीर्षक का प्रथम भाग रूपविशेषाः देवी की अनेक सम्भव दिव्य अभिव्यक्तियों के माध्यम से पूर्णतः सार्थक हो जाता है।
स्तबक का दूसरा भाग अन्तर्मुख होकर कुण्डलिनी के समुल्लास — अर्थात् उसके पूर्ण विकास और आनन्दपूर्ण स्पन्दन — का वर्णन करता है। यहाँ मुनि एक अत्यन्त मौलिक योगरूपक प्रस्तुत करते हैं: कुण्डलिनी को दिव्य कामधेनु, सहस्रार को दुग्ध से भरे उसके ऊधःस्थल, मूलाधाराग्नि को बछड़ा और हृदय में स्थित अन्तरात्मा को दुग्ध दोहने वाले के रूप में चित्रित करते हैं। ऊपर से अवतरित होने वाली अमृतधारा को कभी सोम, कभी क्षीरसागर का अमृत, कभी कौल-कुण्ड से उठती वाष्प, तो कभी दिव्य धेनु से बहते दूध के रूप में व्यक्त किया गया है। आगे सूक्ष्मशरीर के विभिन्न केन्द्रों में उसी शक्ति के अलग-अलग आविर्भाव दिखाए जाते हैं — मूल में अग्नि, मेरुदण्ड-पथ में मादक तपशक्ति, भ्रूमध्य में विद्युत्-ज्योति और सहस्रदल-पद्म में निरन्तर प्रवाहित अमृतधारा के रूप में। इस प्रकार यह स्तबक कुण्डलिनी-जागरण, आरोहण, अवरोहण और अन्तरात्मा को आनन्दरस से पोषित करने वाले दिव्य प्रवाह का सजीव योगचित्र बन जाता है।
इस स्तबक में मुनि की विशिष्ट प्रतिभा तान्त्रिक देवीरूप-वर्णन, योगिक सूक्ष्मशरीर-विज्ञान, सांकेतिक व्याख्या, देवतत्त्व-विचार और अत्यन्त सृजनात्मक काव्यकल्पना को एक ही प्रवाह में समन्वित करने में दिखाई देती है। वे देवी के उग्र और सौम्य दोनों रूपों का समान कौशल से चित्रण करते हैं; दिव्य आभूषणों के तात्त्विक स्वरूप पर प्रश्न उठाते हैं और तत्क्षण कामधेनु के रूपक को योगिक अमृतप्रवाह का अत्यन्त सूक्ष्म और सार्थक प्रतीक बना देते हैं।
उत्साहपूर्ण प्रहर्षिणी छन्द समुल्लास — अर्थात् आनन्दपूर्ण विस्तार और आध्यात्मिक उल्लास — के मुख्य भाव के लिए अत्यन्त उपयुक्त प्रतीत होता है। अन्तिम श्लोक में इन प्रहर्षिणी श्लोकों की माला को द्राक्षाफल से भी अधिक मधुर, अमृत से भी अधिक महिमामयी और दिव्य गङ्गा से भी अधिक गम्भीर बताते हुए शर्वाणी देवी की महिमा का गान करने वाली काव्यमाला के रूप में समर्पित किया गया है। इस प्रकार यह स्तबक देवी के रूपों की विविधता, कुण्डलिनीयोग, अन्तरामृत का अनुभव, तत्त्वचिन्तन और काव्यात्मक उल्लास — इन सभी को एक ही दिव्य अनुभूति में एकीकृत करता है।
अष्टादशः स्तबकः - प्रहर्षिणीवृत्तम्
रूपविशेषाः कुण्डलिनीसमुल्लासश्च
धुन्वन्त्यस्तिमिरततिं हरित्तटीनां धिन्वन्त्यः पुरमथनस्य लोचनानि ।
स्कन्दाम्बाहसितरुचो हरन्तु मोहं सान्द्रं मे हृदयगतं प्रसह्य सद्यः ।। ४२६ ।।
तन्वाना विनतहितं विरोधिवर्गं धुन्वाना बुधजनमोदमादधाना ।
सम्राज्ञी त्रिदिवधरारसातलानां रुद्राणी भणतु शिवानि मत्कुलस्य ।। ४२७ ।।
योऽम्ब त्वां हृदि विदधत्तटित्प्रकाशां पीयूषद्युतिमदहृन्मुखारविन्दाम् ।
अन्यत्तु स्मृतिपथतो धुनोति सर्वं कामारेः सुदति न तस्य भुव्यसाध्यम् ।। ४२८ ।।
कालाभ्रद्युतिमसमानवीर्यसारां शक्त्यूर्मिभ्रमकरशुक्लघोरदंष्ट्राम् ।
यो धीरो मनसि दधाति भर्गपत्नि त्वामस्य प्रभवति सङ्गरेषु शस्त्रम् ।। ४२९ ।।
यः प्राज्ञस्तरुणदिवाकरोज्ज्वलाङ्गीं तन्वङ्गि त्रिपुरजितो विचिन्तयेत्त्वाम् ।
तस्याज्ञां दधति शिरस्सु फुल्लजाजी मालां वा धरणिजुषो वशे भवन्तः ।। ४३०।।
यो राकाशशधरकान्तिसारशुभ्रां बिभ्राणां करकमलेन पुस्तकं त्वाम् ।
भूतेशं प्रभुमसकृत्प्रबोधयन्तीं ध्यायेद्वाग्भवति वशेऽस्य नाकदूती ।। ४३१।।
जानीमो भगवति भक्तच ित्तवृत्तेस्तुल्यं त्वं सपदि दधासि रूपमग्र्यम्
प्रश्नोऽयं भवति नगाधिनाथकन्ये रूपं ते मदयति कीदृशं स्मरारिम् ।। ४३२।।
चारु स्यादलमिति वक्तुमम्ब शक्यं रूपं ते न वदति कोऽपि कीदृशं वा ।
सम्मोहं परमुपयान्ति कान्तिभाण्डे कामारेरपि नयनानि यत्र दृष्टे ।। ४३३।।
सङ्कल्पैः किमु तव भूषणान्यभूवँच्छिल्पीन्द्राः किमु विदधुर्यथाऽत्र लोके ।
तत्स्वर्णं भगवति कीदृशं मणीनां किं रूपं भवति च तत्र योजितानाम् ।। ४३४ ।।
यान्यङ्गान्यखिलमनोज्ञसारभूतान्येतेषामपि किमु भूषणैरुमे ते ।
आहोस्विल्ललिततमानि भान्ति भूयो भूषाभिर्विकृततमाभिरप्यमूनि ।।४३५।।
मुक्ताभिर्भवति तवाम्ब किन्नु हारः पीयूषद्युतिकरसारनिर्मलाभिः ।
मुण्डैर्वा घलघलशब्दमादधद्भिः सङ्घर्षात् त्रिभुवनसार्वभौमभामे ।। ४३६।।
वस्त्रं स्याद्यदि तव सर्वशास्त्रगम्ये कार्पासं दिवि च तदुद्भवोऽनुमेयः ।
क्षौमं चेद्भगवति तस्य हेतुभूताः कीटाः स्युर्गगनजगत्यपीति वाच्यम् ।। ४३७ ।।
रुद्रस्य प्रियदयितेऽथवा सुरद्रुभूषाणां मणिकनकप्रकल्पितानाम् ।
वस्त्राणामपि मनसे परं हितानां कामं ते भवति समर्पकः समर्थः ।। ४३८ ।।
सुस्कन्धो बहुविटपः प्रवालशोभी सम्फुल्लप्रसवसुगन्धवासिताशः ।
वृक्षः किं भगवति कल्पनामकोऽयं सङ्कल्पः किमु तव कोऽपि देवि सत्यः ।। ४३९।।
सङ्क ल्पान्न भवति कल्पपादपोऽन्यः स्वर्दोग्ध्री पुनरितरा न कुण्डलिन्याः ।
यः कुर्याद् द्वयमिदमुद्गतात्मवीर्यं कारुण्यात्तव भुवि चास्य नाकभाग्यम् ।। ४४० ।।
आपीनं भवति सहस्रपत्रकञ्ज वत्सोऽस्याः पटुतरमूलकुण्डवह्निः ।
दोग्धाऽऽत्मा दहरसरोरुहोपविष्टो मौनं स्यात्सुरसुरभेस्तनूषु दोहः ।।४४१।।
दोग्ध्र्यास्ते भगवति दोहनेन लब्धं वत्साग्निप्रथमनिपानसद्रवायाः ।
दुग्धं स्वाद्वमृतमयं पिबन्ममात्मा सन्तृप्तो न भवति दुर्भरोऽस्य कुक्षिः ।। ४४२।।
वत्सोऽग्निः पिबति दृढाङ्घ्रिरम्ब पश्चादश्रान्तं पिबति दुहन् पुरोऽन्तरात्मा ।
वृद्धिं च व्रजति पयः प्रतिप्रदोहं दोग्ध्र्यास्ते द्रव इह कुण्डलिन्यपारः ।। ४४३।।
सोमस्य द्रवमिममाहुरम्ब केचिद् दुग्धाब्धेरमृतरसं गदन्ति केऽपि ।
बाष्पं केऽप्यभिदधते तु कौलकुण्डं पीनोधस्स्रव भणन्ति धेनोः ॥ ४४४।।
मूले त्वं ज्वलदनलप्रकाशरूपा वीणायां प्रबलमहाम दोष्मरूपा ।
शीर्षाब्जे सततगलद्रसस्वरूपा भ्रूमध्ये भवसि लसत्तटित्स्वरूपा ।। ४४५।।
हार्दे चेदवतरसीह पुण्डरीके छायावत्सकलमपि प्रपश्यसि त्वम् ।
आरूढा दशशतपत्रमद्रिपुत्रि स्याश्चेत्त्वं भणसि जगत्सुधासमुद्रम् ।। ४४६।।
नेत्राभ्यां सरसिरुहच्छदायताभ्यां वक्त्रेण प्रविमलहासभासुरेण ।
प्रत्यक्षा मम मनसः पुरः पुरन्ध्री कामारेः परिणतमस्मदीयभाग्यम् ।। ४४७ ।।
पुण्यानां परिणतिरेव भूतभर्तुः सिद्धानां बलनिधिरेव कोऽपि गूढः ।
भक्तानां दृढतरिरेव शोकसिन्धौ मग्नानां मम जननी महीध्रपुत्री ।। ४४८ ।।
उद्धर्तुं विनतजनं विषादगर्तात् संस्कर्तुं भुवनहिताय योगयुक्तम् ।
संहर्तुं खलकुलमुद्धतं च दर्पाद् भर्गस्य प्रियतरुणी सदा सदीक्षा ।। ४४९ ।।
मृद्वीकां मधुरतया सुधां महिम्ना गाम्भीर्यात्सुरतटिनीं च निर्जयन्ती ।
शर्वाणीचरितपरा प्रहर्षिणीनां श्रेणीयं जयतु गणेश्वरेण बद्धा ।। ४५० ।।
