काव्यकण्ठ वासिष्ठ श्री गणपति मुनि विरचितम्
उमासहस्रम्
द्वाविंशः स्तबकः - वियोगिनीवृत्तम्

“हरकुटुम्बकम्” — अर्थात् “हर का दिव्य परिवार” शीर्षक वाला यह बाईसवाँ स्तबक शिव, उमा देवी और उनके दिव्य पुत्रों को एक ही पवित्र परिवार के रूप में प्रस्तुत करता है। इस परिवार का प्रत्येक सदस्य किसी विशिष्ट विश्वशक्ति और आध्यात्मिक कार्य का प्रतिनिधित्व करता है। प्रारम्भिक श्लोकों में शिव के महान् कार्यों का स्मरण किया गया है — हालाहल विष का पान, त्रिपुरासुरों का संहार, जलन्धर का विनाश, कामदेव का दहन तथा अनेक विश्वरूपों में उनका प्राकट्य। इसके बाद उमा देवी को उनकी अविभाज्य सहधर्मचारिणी के रूप में वर्णित किया गया है। वहाँ से स्तबक स्वाभाविक रूप से उनके पुत्रों गणपति और कुमारस्वामी की ओर बढ़ता है; विशेष रूप से स्कन्द को शत्रुशक्तियों का संहार करने वाले महासेनापति तथा योग्य साधकों को अन्धकार से परे के मार्ग पर ले जाने वाले ज्ञानगुरु के रूप में चित्रित किया गया है। इसलिए हरकुटुम्बकम् शीर्षक पूर्णतः सार्थक है। यह केवल किसी दिव्य परिवार का चित्रण नहीं, बल्कि यह बताता है कि हर का सम्पूर्ण परिवार परस्परपूरक दैवी शक्तियों की एक समन्वित अभिव्यक्ति है।
इस स्तबक की सबसे विशिष्ट विशेषताओं में से एक है स्कन्द अथवा गुह को विभिन्न ऐतिहासिक और आध्यात्मिक अभिव्यक्तियों से जोड़ने की मुनि की दृष्टि। तारकासुर का संहार करने वाले वीर तथा अन्धकार से परे के मार्ग का उपदेश देने वाले दिव्यगुरु के रूप में स्कन्द का वर्णन करने के बाद मुनि संकेत करते हैं कि वही गुहशक्ति विभिन्न युगों में महान् आत्माओं के रूप में प्रकट होती रही है। तमिल भक्ति-परम्परा के दिव्य ज्ञानसम्बन्धर, वैदिक कर्ममार्ग की रक्षा करने वाले कुमारिल भट्ट का कार्य, और विशेष रूप से अरुणाचल में निवास करने वाले रमण महर्षि — इन सबका स्मरण गुहतत्त्व की विभिन्न अभिव्यक्तियों के रूप में किया जाता है। इस दृष्टि में गुह केवल किसी एक पौराणिक घटना से सम्बद्ध देवता नहीं हैं; जब गहन ज्ञान की आवश्यकता होती है, जब धर्मरक्षा आवश्यक होती है, अथवा जब आध्यात्मिक अन्धकार को दूर करना होता है, तब उनकी शक्ति बार-बार प्रकट होती है। इस प्रकार शिवपरिवार पौराणिक देवत्व से लेकर साक्षात्कारी ज्ञानियों तक विस्तृत एक जीवित आध्यात्मिक परम्परा का रूप ग्रहण करता है।
इस स्तबक में श्री गणपति मुनि की पौराणिक आख्यान, वैदिक संकेतार्थ, देवतत्त्व का समन्वय, अवतार-सदृश दृष्टि और व्यक्तिगत आध्यात्मिक श्रद्धा को एक ही प्रवाह में पिरोने की असाधारण क्षमता स्पष्ट दिखाई देती है। सुन्दर वियोगिनी छन्द में वे एक ओर शिव को उग्र तपस्वी रूप में, दूसरी ओर उमा को कालीरूपिणी तथा रत्नाभरणों से विभूषित गौरी के रूप में, गणपति को उनके विशिष्ट गजानन स्वरूप में, और स्कन्द को योद्धा, गुरु तथा ज्ञानदाता के रूप में प्रभावशाली ढंग से चित्रित करते हैं।
अन्तिम श्लोक में कवि इन वियोगिनी श्लोकों को अपने ही दिव्य परिवार के वर्णन के रूप में संकेत करते हैं, जिससे पूरे स्तबक को अत्यन्त आत्मीय स्वर प्राप्त होता है। इसलिए हरकुटुम्बकम् एक ओर शिवपरिवार की स्तुति है, दूसरी ओर दैवी कार्यों का तात्त्विक समन्वय; और साथ ही उस पवित्र परिवार के साथ अपने विवर्तावतार-सम्बन्ध का मुनि द्वारा स्मरण किया जाना इसकी एक अद्भुत विशेषता है।
द्वाविंशः स्तबकः - वियोगिनीवृत्तम्
हरकुटुम्बकम्
अखिलस्य विकासकारणं व्यसनिज्ञानिजनावनेषु नः ।
वितनोतु विशेषतः शिवं शिवराजीवदृशो दरस्मितम् ।। ५२६।।
विकले सकले सुरव्रजे व्रजति श्यामलिमानमच्युते ।
जगतस्सदयो हलाहलं चुलुकीकृत्य भयं नुनोद यः ।। ५२७।।
निगमैस्तुरगी भुवा रथी विधिना सारथिमान् बिभेद यः ।
कनकाद्रिवरेण कार्मुकी कमलाक्षेण शरी पुरत्रयम् ।। ५२८ ।।
अजितस्य च गाढमत्सरैः कमलाकान्तपुरस्सरैस्सुरैः ।
पदजायुधधारया रयाद्वधमाधत्त जलन्धरस्य यः ।। ५२९ ।।
कमलासनकञ्जलोचनौ छललिङ्गस्य शिरोङ्घ् रि वीक्षितुम् ।
बत हंसवराहभूमिकौ यतमानावपि यस्य न प्रभू ।। ५३०।।
नयनं निटलान्तरस्थितं विघटय्येषदिवान्वितो रुषा ।
भुवनत्रयनिर्जयोन्नतं मदनं गाढमदं ददाह यः ।। ५३१।।
सकले धवलः कलेबरे हरिनीलोपलमञ्जुलः क्वचित् ।
अमृतांशुरिवादधाति यः परमामक्षिमुदं प्रपश्यताम् ।। ५३२।।
अवतंसतुषारदीधितिद्युतिभिर्यस्य यशोभरैरपि ।
सममच्छतरीकृतो दिशामवकाशस्सुतरां प्रकाशते ।। ५३३।।
गगनानलजीवनानिलक्षितिसोमारुणसोमयाजिभिः ।
महतो बत यस्य मूर्तिभिर्भुवनं क्रान्तमिदं समन्ततः ।। ५३४।।
सह तेन धवेन राजते वसुधाधारिणि काऽपि राजते ।
वनिता भवतापनाशिनी चरणप्रेष्यनिवेदिताशिनी ।। ५३५।।
वनितापुरुषौ पुरातनौ विमले व्योमनि देवदम्पती ।
भुवनत्रितयस्य तौ विभू रजताद्राविह सिद्धदम्पती ।। ५३६।।
गजचर्मधरः कपालभृद् गृहनाथो गृहिणी तु कालिका ।
रुधिराविलमुण्डमालिनी कथितौ तौ बत पण्डितैः शिवौ ॥ ५३७ ।।
स किमिन्दुकलाशिरोमणिः किमुताश्लीलकपालभूषणः ।
किमुमे भवती कपालिनी किमु विभ्राजितरत्नमालिनी ।। ५३८ ।।
रमसेऽम्ब कपालमालिनी क्वचिदीशेन कपालमालिना ।
अतुलप्रभनिष्कमालिना क्वचिदत्युत्तमरत्नमालिनी ।। ५३९ ।।
युवयोर्मरुतस्तनूभुवो बलवन्तो भुवनप्रकम्पनाः ।
शशिदीधितिहारि यद्यशो निगमे पावनमम्ब गीयते ।। ५४० ।।
गुरुमुत्तममभ्रचारिणामसमब्रह्मनिधाननायकम् ।
तव देवि शिवे तनूभुवां मरुतामन्यतमं प्रचक्षते ।। ५४१।।
द्विरदं वदने महामदं सितदन्तच्छविधौतदिक्तटम् ।
इतरत्र मुखान्नराकृतिं विदुरस्यैव विवर्तमद्भुतम् ।। ५४२।।
अखिलामरनिर्जयोन्नतः प्रथने तारकदानवो बली ।
हृतवीर्यमदो बभूव यद्घनशक्त्यायुधतेजसाऽञ्जसा ।। ५४३।।
अमले हृदि निर्मलाशनाच्छिथिले ग्रन्थिचये नराय यः ।
परिपक्वधिये प्रदर्शयेत् तमसः पारमपारवैभवः ।। ५४४।।
द्रविडेषु शिशुत्वमेत्य यो गिरिशश्लोकविशेषगायिनीम् ।
अमृतद्रवसारहारिणीं निगमाभां निबबन्ध संस्तुतिम् ।। ५४५।।
भुवि भट्टकुमारिलाख्यया भवमेत्याध्वररक्षणाय यः ।
वरजैमिनिभाषिताशयं बहुलाभिः खलु युक्तिभिर्दधौ ।। ५४६ ।।
अधुना विधुनोति यस्तमो विबुधप्रेक्षितमार्गरोधकम् । रमणाख्यमहर्षिवेषभृत्श्रितशोणाचलचारुकन्दरः ।।५४७।।
स गुहोऽतिमहो महामहास्त्रिदशानां प्रथितश्चमूपतिः ।
जगतामधिराज्ञि कोऽपि ते सुतरां प्रीतिपदं कुमारकः ।। ५४८ ।।
जयति त्रिपुरारिभामिनी गणपत्यादिमरुत्प्रसूरुमा ।
तमसूत सुरारिधूतये त्रिदशानामपि या चमूपतिम् ।। ५४९।।
स्वकुटुम्बकथाभिधायिनीर्गणनाथस्य वियोगिनीरिमाः ।
अवधारयतु प्रसन्नया नगनाथप्रियनन्दिनी धिया ।। ५५० ।।
