काव्यकण्ठ वासिष्ठ श्री गणपति मुनि विरचितम्
उमासहस्रम्
त्रयोविंशः स्तबकः - नरमनोरमावृत्तम्

“प्रकीर्णकम्” — अर्थात् “विविध आध्यात्मिक भावों का समाहार” शीर्षक वाला यह तेईसवाँ स्तबक किसी एक निरन्तर विषय का विस्तार न करते हुए भक्ति, तत्त्वचिन्तन और योगसाधना से जुड़े अनेक गम्भीर भावों को एक स्थान पर संकलित करता है। उमा देवी का मन्दहास, उनका विश्वाधिपत्य, उनके चरणों में शरणागति, हृदय-ध्यान, अन्तर्मुख-विचार, दहर तत्त्व, श्वास के प्रति सजगता और अहंभाव का लय — ऐसे विविध विषयों के बीच श्लोक स्वाभाविक रूप से विचरते हैं। इसलिए प्रकीर्णकम् शीर्षक पूर्णतः सार्थक है। यह जानबूझकर विविध होते हुए भी परस्पर सम्बद्ध आध्यात्मिक चिन्तनों का संग्रह है, जिन सबके केन्द्र में दिव्यमाता ही परम आन्तरिक सत्य के रूप में प्रतिष्ठित हैं।
इस स्तबक के कुछ श्लोक विशेष रूप से अन्तर्मुखी हैं। मुनि साधक को स्थिर बुद्धि के साथ हृदय में देवी का अन्वेषण करने के लिए प्रेरित करते हैं। वे प्रत्यक्ष रूप से यह प्रश्न भी उठाते हैं — “‘मैं’ का यह विचार कहाँ प्रकाशित होता है?” यह प्रश्न मन को उसके मूल की ओर ले जाता है और अन्ततः उसे परमसत्य में विलीन कर सकता है। मुनि यह भी बताते हैं कि द्रष्टा और दृश्य के बीच का भेद स्वयं देवी के परात्पर स्वरूप की ओर संकेत करता है। उनके परम पद को अमृत, आनन्द और चेतना के रूप में वर्णित किया गया है।
स्तबक के अन्त में शिक्षा और अधिक साधनापरक हो जाती है। मुनि संकेत करते हैं कि श्वास की गति को निरन्तर सजगता से देखते रहने पर साधक जगन्माता के चरण-सान्निध्य तक पहुँच सकता है। इस प्रकार ऊपर से अलग-अलग दिखाई देने वाले सभी विषय अन्ततः एक ही संदेश में मिल जाते हैं: बाह्य उपासना क्रमशः अन्तर्मुख जागरूकता में और अन्ततः प्रत्यक्ष आत्मानुभूति में परिपक्व होनी चाहिए।
इस स्तबक में श्री गणपति मुनि भक्ति, वेदान्त, हृदयकेन्द्रित आत्मविचार, योगिक सजगता और संक्षिप्त रहस्यात्मक उपदेश को अत्यन्त स्वाभाविक रूप से समन्वित करते हैं। सुललित नरमनोरमा छन्द इन विविध भावों को हल्का, आत्मीय और प्रवाहपूर्ण स्वर देता है। पूर्ववर्ती कुछ स्तबकों की तरह यहाँ एक ही विषय का कड़ा संरचनात्मक अनुशासन नहीं है, किन्तु यही स्वतंत्रता इसे सूक्तिसदृश और अत्यन्त आत्मीय बनाती है। ऐसा प्रतीत होता है मानो कवि ने अपने भीतर बिजली की चमक की तरह प्रकट हुई ज्ञान-स्फुरणाओं, प्रार्थनाओं और साधना-सूत्रों को एक ही पुष्पमाला में पिरो दिया हो।
अन्तिम श्लोक में गणपति मुनि द्वारा रचित इन नरमनोरमा श्लोकों को पर्वतराज की पुत्री उमा देवी की प्रसन्नता के लिए समर्पित किया गया है। इस प्रकार विविध आध्यात्मिक चिन्तन, अन्तर्मुख-विचार, योगसाधना और शरणागति — ये सभी एक ही दिव्यमाता के साक्षात्कार की दिशा में ले जाने वाले समग्र उपदेश के रूप में इस स्तबक में एकाकार हो जाते हैं।
त्रयोविंशः स्तबकः - नरमनोरमावृत्तम्
प्रकीर्णकम्
किरदिवामृतं किरणमालया ।
जयति तत्सितं शिववधूस्मितम् ।। ५५१ ।।
तव पदं परे मम गुहान्तरे ।
स्फुरतु सर्वदा विकसितं मुदा ।। ५५२ ।।
पदमधोऽम्बुजान्न किल भिद्यते ।
मदनविद्विषः सदनराज्ञि ते ।। ५५३ ।।
विभुतयोररीकृतबहूद्भवौ ।
विदधतुर्जगत्रयमिदं शिवौ ।। ५५४।।
तव तु खेलने नलिनजाण्डकम् ।
गिरिशवल्लभे भवति कन्दुकम् ।। ५५५।।
सकलमस्त्युमे सदभयङ्करे ।
तव करे परे किमपि नो नरे ।। ५५६।।
किमिव वर्ण्यतां कशशिकुण्डला ।
उडुमणिस्रजाप्रविलसद्गला ।। ५५७ ।।
भण निरन्तरं बहुगुणामुमाम् ।
गतभयं विधेह्यमलवाणि माम् ।। ५५८ ।।
अव जहीहि वा ननु भजाम्यहम् ।
भुवनभर्त्रि ते चरणमन्वहम् ।। ५५९ ।।
गणपतेः शिरःकमलचुम्बिनी ।
भवतु गोपतिध्वजकुटुम्बिनी ।। ५६० ।।
दहरमज्जनं विदधतं जनम् ।
परमदेवते नयसि धाम ते ।। ५६१।।
जननि विज्ञता भवतु धीमताम्।
अनुभवस्तु ते करुणया सताम् ।। ५६२ ।।
अचलया धिया हृदि गवेषणम् ।
वृषहयप्रियानगरशोधनम् ।। ५६३।।
न विजहामि ते चरणनीरजम् ।
अवनि धीमतामव न वा निजम् ।। ५६४ ।।
पदमुमेऽम्ब ते हृदि विचिन्वते ।
पलितमस्तकाः परमदेवते ।। ५६५।।
स्वयमनामये सकलधात्र्यसि ।
निजमहिम्नि सा त्वमयि तिष्ठसि ।। ५६६ ।।
स्थितिमसाधयँस्तव पदाम्बुजे ।
विधिमधिक्षिपत्यलसधीरजे ।। ५६७ ।।
स्यतु मदापदं शिववधूपदम् ।
यदृषयो विदुस्त्रिभुवनास्पदम् ।। ५६८ ।।.
गुणगणं गृणैस्तव शिवे शिवम् ।
गतभयोऽभवं मदमितो नवम् ।। ५६९ ।।
तव कृपावशात् तदिदमव्यये ।
जननि नः प्लुतिस्तव यदङ्घ्रये ।। ५७०।।
नयनदृश्ययोरयि यदन्तरम् ।
तदमरस्तुते तव वपुः परम् ।। ५७१।।
अहमिति स्मृतिः क्व नु विभासते ।
इति विचोदयन् महति लीयते ।। ५७२।।
अमृतसंज्ञके सुखचिदात्मके ।
मतिमदर्थिते जननि धाम्नि ते ।। ५७३।।
अयि मुदास्पदं स्पृशति ते पदम् ।
श्वसितयात्रया सततदृष्टया ।। ५७४।।
दधतु सत्कवेर्गणपतेरिमाः ।
नगभुवो मुदं नरमनोरमाः ।। ५७५।।
