काव्यकण्ठ वासिष्ठ श्री गणपति मुनि विरचितम्
उमासहस्रम्
चतुर्विंशः स्तबकः - सुप्रतिष्ठावृत्तम्

“प्रकीर्णकम्” — अर्थात् “विविध विषयों का समाहार” शीर्षक वाला यह चौबीसवाँ स्तबक भक्ति, धर्म, योग, आचरण और तत्त्वचिन्तन से जुड़े अनेक गम्भीर भावों को एक स्थान पर एकत्र करता है। श्री गणपति मुनि देवी को सज्जनों की रक्षिका, विरोधी शक्तियों की संहारिणी, वाणी की मूलशक्ति, योगियों की मार्गदर्शिका और आध्यात्मिक साधना के परम फल प्रदान करने वाली जगन्माता के रूप में स्तुत करते हैं। वे दान, धैर्य, सद्गुण, सत्य, यज्ञ, इन्द्रियनिग्रह और योग जैसी साधनाओं से प्राप्त होने वाले फलों का भी विचार करते हैं और अन्ततः यह बताते हैं कि देवी के चरणों की आराधना इन सभी साधनाफलों का सार प्रदान करने में समर्थ है। इसलिए प्रकीर्णकम् शीर्षक इस स्तबक के लिए पूर्णतः उपयुक्त है। यद्यपि श्लोक अनेक विषयों का स्पर्श करते हैं, फिर भी उन्हें एक सूत्र में बाँधने वाला मूल भाव यही है कि समस्त मंगलकारी शक्तियाँ, साधनामार्ग और सिद्धियाँ अन्ततः दिव्यमाता के अनुग्रह पर ही आश्रित हैं।
स्तबक का उत्तरार्ध और अधिक अन्तर्मुख तथा दार्शनिक हो जाता है। मुनि आकाशतत्त्व पर एकाग्रता, प्राणनियन्त्रण, हृदयगुहा की शुद्धि और सूक्ष्म अहं-मति पर ध्यान जैसी साधनाओं का संकेत करते हैं। वहाँ से वे एक अत्यन्त शक्तिशाली अद्वैतबोध की ओर ले जाते हैं। जब चेतना बाहर की ओर प्रवृत्त होती है, तब जगन्माता अनेकता से युक्त, विविध रूपों वाले विश्व के रूप में अनुभूत होती हैं; वही चेतना जब अन्तर्मुख होकर उनके वास्तविक स्वरूप का साक्षात्कार करती है, तब ज्ञात होता है कि वे अविभाज्य चेतनास्वरूप ही हैं। यह विचार एक अत्यन्त गम्भीर निष्कर्ष तक पहुँचाता है: देवी को भिन्न-भिन्न रूपों में पृथक् अनुभव करना बन्धन है, जबकि उनके अविभाज्य स्वरूप का साक्षात्कार ही मुक्ति है।
इस स्तबक में मुनि की विशिष्ट प्रतिभा धर्म, भक्ति, योग, सूक्ष्मशरीर-साधना और अद्वैतज्ञान को संक्षिप्त और सुदृढ़ सुप्रतिष्ठा छन्द में समाहित करने में दिखाई देती है। अनेक श्लोकों में सूक्ति-सदृश संक्षिप्तता और प्रभाव है। व्यावहारिक धर्मबोध से ध्यानसाधना तक और वहाँ से परतत्त्व-साक्षात्कार तक भावप्रवाह तीव्र किन्तु स्वाभाविक रूप से आगे बढ़ता है।
षष्ठ शतक के समापन स्तबक के रूप में यह एक अत्यन्त सार्थक समन्वय प्रस्तुत करता है। जगन्माता यहाँ केवल लौकिक और आध्यात्मिक कल्याण प्रदान करने वाली देवी के रूप में ही नहीं, बल्कि प्रत्येक साधना में अन्तर्निहित शक्ति और अन्ततः अखण्डचित् — अविभाज्य चेतनास्वरूपिणी, जिनका साक्षात्कार ही मुक्ति है — के रूप में प्रतिष्ठित होती हैं।
चतुर्विंशः स्तबकः - सुप्रतिष्ठावृत्तम्
प्रकीर्णकम्
चन्द्रिकासितं चण्डिकास्मितम् ।
भूतले सतां भातु भूतये ।। ५७६।।
भालचक्षुषश्चक्षुषां धनम् ।
किञ्चिदस्तु मे शस्तवर्धनम् ।। ५७७।।
साधुसन्ततिक्षेमकारिणी ।
घोरदानवानीकदारिणी ।। ५७८ ।।
योगयुक्तसच्चित्तचारिणी ।
पादसेवकप्राज्ञतारिणी ।। ५७९।।
पुष्पबाणजिन्नेत्रहारिणी ।
पातु मां जगच्चक्रधारिणी ।। ५८० ।।
द्वादशान्तभूजातशारिका ।
सर्ववाङ्मयस्यैककारिका ।। ५८१।।
पुण्यकर्मसु स्वच्छमस्तका ।
योगशालिषु छिन्नमस्तका ।। ५८२।।
आत्मनि स्थितेः सम्प्रदायिका ।
सर्वजन्मिनां सम्प्रवर्तिका ।। ५८३।।
मां पुनातु सत्पूज्यपादुका ।
भाललोचनप्राणनायिका ।।५८४।॥
दानतो यशः पौरुषाद्रमा ।
सम्पदो मदः शीलतः क्षमा ।। ५८५।।
सत्यतो जगत्यत्र गौरवम् ।
यज्ञतो दिवि स्थानमुज्ज्वलम् ।। ५८६।।
संयमादघव्रातवीतता ।
योगतो महासिद्धिशालिता ।। ५८७।।
शर्वनारि ते पादसेवया ।
सर्वसत्फलावाप्तिरग्र्यया ।। ५८८।।
नोद्यमेन या सिद्धिरुत्तमा ।
विश्वनायिकावीक्षितेन सा ।। ५८९।।
सम्पदां रमा भारती गिराम् ।
त्वं शिवे प्रभुः प्राणसंविदाम् ।। ५९० ।।
चक्षुषा नभोलक्ष्यधारिणा ।
सिद्ध्यतीव ते देवि धारणा ।। ५९१ ।।
आशिरो दधन्नाभितोऽनिलम् ।
देवि विन्दति त्वन्मुनिर्बलम् ।। ५९२ ।।
हृद्गुहान्तरे यद्विशोधनम् ।
तत्सवित्रि ते स्यादुपासनम् ।। ५९३ ।।
काऽप्यहम्मतिर्गोचरं विना ।
लोकधात्रि ते रूपभावना ।। ५९४।।
अस्यमण्डनं कोऽपि विद्यया ।
खण्डनं परः प्राह ना यया ।। ५९५।।
मातरेतया जीयते त्वया ।
एकया तनूभिन्नया धिया ।। ५९६ ।।
बाह्यदर्शने विश्वपङ्किला ।
अन्यथा भवस्यम्ब केवला ।। ५९७ ।।
खण्डवन्नृणां भासि भोगिनाम् ।
अस्यभिन्नचित् काऽपि योगिनाम् ।। ५९८ ।।
बन्ध एष यद्भासि खण्डिता ।
मोक्ष एष यद्भास्यखंण्डिता ।। ५९९ ।।
एतदीशितुः पत्नि हृन्मुदे ।
सौप्रतिष्ठसद्गीतमस्तु ते ।। ६०० ।।
।। समाप्तं च षष्ठं शतकम् ।।
