काव्यकण्ठ वासिष्ठ श्री गणपति मुनि विरचितम्
उमासहस्रम्
षड्विंशः स्तबकः - दोधकवृत्तम्

“अपीतकुचाम्बा” शीर्षक वाला यह छब्बीसवाँ स्तबक अरुणाचल की दिव्यमाता पर श्री गणपति मुनि द्वारा अत्यन्त आत्मीय भाव से रचित एक भक्तिगीत है। शोनगिरि में विराजमान देवी को मुनि केवल किसी स्थानीय मन्दिर-देवी के रूप में नहीं, बल्कि उसी परम उमा देवी के रूप में देखते हैं जिन्हें वेद खोजते हैं और योगी ध्यान में अनुभव करते हैं। आगे के श्लोकों में इस शीर्षक का अर्थ और भी गम्भीर हो जाता है। वहाँ अपीतकुचाम्बा को गुहस्वरूप भगवान रमण महर्षि को ज्ञानरूपी दुग्ध से पोषित करने वाली जगन्माता के रूप में चित्रित किया गया है। उनका स्तन्य ज्ञानरस बन जाता है और उसी ज्ञानसार से महर्षि पूर्ण परिपक्वता प्राप्त करते हैं। मुनि अत्यन्त प्रेमपूर्ण आत्मीयता से देवी से प्रार्थना करते हैं कि इस ज्ञानपोषण में अपने लिए भी कुछ अंश सुरक्षित रखें।
यह स्तबक अरुणाचल-क्षेत्र, श्रीचक्र-संकेत, शिव-शक्ति अभेद और रमण महर्षि–गुह तत्त्व की समानता का अत्यन्त सुन्दर समन्वय प्रस्तुत करता है। अरुणाचल को ही मानो देवी के शरीर का एक अंश माना गया है और यह संकेत किया गया है कि शिव का अग्निलिङ्ग भी उनकी शक्ति से पृथक् होकर प्रकाशित नहीं होता। श्लोक मन्दिर की देवमूर्ति, पवित्र पर्वत और जीवित गुरु — इन तीनों स्तरों के बीच अत्यन्त स्वाभाविक रूप से प्रवाहित होते हैं। यहाँ जगन्माता के साथ मुनि का सम्बन्ध लगभग बालभाव का रूप ले लेता है। वे प्रेमपूर्ण हल्की शिकायत के साथ कहते हैं कि माता रमण को तो अपनी गोद में रखती हैं, पर गणपति को बार-बार बाहर भेज देती हैं। साथ ही वे अपने दैवी कार्य को पूरा करने के लिए उनसे पोषण, अनुग्रह और शक्ति की याचना करते हैं। इस कारण यह स्तबक अत्यन्त व्यक्तिगत और आत्मकथात्मक स्वर ग्रहण करता है।
इस स्तबक में श्री गणपति मुनि का क्षेत्र-माहात्म्य का ज्ञान, तन्त्र-पाण्डित्य, गुरुतत्त्व की दृष्टि, सांकेतिक व्याख्या और भक्तिरस से युक्त विनोदपूर्ण काव्यकौशल विशेष रूप से प्रकट होता है। संक्षिप्त दोधक छन्द दार्शनिक गाम्भीर्य और जगन्माता के साथ प्रेमपूर्ण संवाद — दोनों को समान सहजता से वहन करता है। पौराणिक गुह, ऐतिहासिक रमण महर्षि, अग्निलिङ्गस्वरूप अरुणाचल और पोषणदायिनी जगन्माता अपीतकुचाम्बा — ये सब एक ही समग्र आध्यात्मिक दृष्टि में एकाकार हो जाते हैं।
इसलिए यह स्तबक केवल अरुणाचल की देवी पर रचित एक भक्तिस्तोत्र नहीं है; यह जगन्माता, भगवान रमण महर्षि, ज्ञानप्रवाह और मुनि के अपने आध्यात्मिक जीवन के बीच विद्यमान अन्तरंग सम्बन्ध का हृदयस्पर्शी साक्ष्य भी है।
षड्विंशः स्तबकः - दोधकवृत्तम्
अपीतकुचाम्बा
आगमविन्मतिकैरविणीनां बोधमजस्रमसौ विदधानः ।
पातु महेशवधूवदनांशो हासशशी सकलानि कुलानि ।। ६२६ ।।
आयतलोचनचुम्बितकर्णा दानयशोजिततोयदक र्णा ।
शोणनगेशमनः प्रियवर्णा नाशयताज्जगदार्तिमपर्णा ।। ६२७।।
वेदतुरङ्गविलोचनभाग्यं वेदशिरोनिचयैरपि मृग्यम् ।
शोकविदारिसुधाकिरणास्यं शोणगिरौ समलोकि रहस्यम् ।। ६२८।।
मुञ्च समस्तमनोरथलाभे संशयमद्य करामलकाभे ।
दृक्पथमाप नगेन्द्रतनूजा सोऽहमितः परमन्तरंराजा ।। ६२९ ।।
शिल्पविदः प्रतिमां प्रविशन्ती स्वल्पविदां तरणाय चकास्ति ।
शोणधराभृति सम्प्रति लब्धा हन्त चिरादियमेव ममाम्बा ।। ६३०।।
भारतभूवलयेऽत्र विशाले सन्त्वनघानि बहूनि गृहाणि ।
आस्यविगीतसुधाकरबिम्बा शोणगिरौ रमतेऽत्र मदम्बा ।। ६३१ ।।
वारितसंश्रितपातकजाला वारिधिवीचिनिरङ्कुशलीला ।
वारिजपत्रविडम्बननेत्रा वारणराजमुखेन सपुत्रा ।। ६३२।।
आयतवक्रघनासितकेशी तोयजबाणरिपो र्हदयेशी ।
काशसुमाच्छयशाः परमैषा पाशभिदस्तु तवेन्दुविभूषा ।। ६३३।।
पङ्कजसम्भवपूजितपादा पङ्कविनाशनपावननामा ।
किङ्करकल्पलता परमेयं शङ्करनेत्रसुधा शरणं नः ।। ६३४ ।।
चञ्चलदृग्विनतामरवल्ली पञ्चपृषत्कशरासनझिल्ली ।
काञ्चनगर्भमुखप्रणुतेयं पञ्चमुखप्रमदा शरणं नः ।। ६३५।।
अम्ब विधूय भटान्मदनादीन् नूपुरनादबिभीषिकयैष ः ।
हन्त जहार बलेन मनो मे शोणनगाङ्घ्रिनिवासिनि तेऽङ्घ्रिः ।। ६३६ ।।
कर्णपुटे कुरु मुग्ध ममोक्तिं मुञ्च धनादिषु मानससक्तिम् ।
शोणगिरीन्द्रवधूपदभक्तिं शीलय शीलय यास्यसि मुक्तिम् ।। ६३७।।
जीर्णतरे जरयाऽखिलदेहे बुद्धिबलं च विलुम्पति मोहे ।
हन्त सवित्रि तपन्मतिरन्ते सेवितुमिच्छति ना चरणं ते ।। ६३८ ।।
तन्त्रविदो नवयोनि तु चक्रं शोणधराधररूपमुशन्ति ।
अर्धममुष्य वपुर्मदनारेरर्धमगेन्द्रसुते तव गात्रम् ।। ६३९ ।।
अस्तु नगेश्वरनन्दिनि लिङ्ग तैजसमेतदिहापि तवांशः ।
वीतगुणस्य विना तव योगं देवि शिवस्य कुतः खलु तेजः ।। ६४० ।।
स्थापितमूर्तिरियं तव नम्या पूजयितुं जगदीश्वरि रम्या ।
शोणनगार्धमिदं तव रूपं कीर्तयितुं नगजे धुतपापम् ।। ६४१।।
शोणनगार्धतनोऽनिशमङ्के धारयसेऽयि गुहं रमणाख्यम् ।
आगतमप्ययि हा मुहुरम्बोच्चाटयसे गणपं ननु कस्मात् ।। ६४२ ।।
अङ्कजुषे रमणाय नु दातुं मानववेषधराय गुहाय ।
शोणनगार्धतनो बहु दुग्धं मातरपीतकुचेह विभासि ।। ६४३ ।।
पूर्णसमाधिवशात् स्वपिषि त्वं पीतमपीतकुचेऽम्ब न वेत्सि ।
अङ्कजुषा रमणेन सुतेन प्रेक्ष्य यथेष्टमुरोरुहदुग्धम् ।। ६४४।।
ज्ञानरसाह्वयमम्ब निपीय स्तन्यमसौ रमणो मुनिराट् ते ।
ज्ञानमयोऽभवदीश्वरि सर्वः पुष्यति येन तनुं हि तदात्मा ।। ६४५।।
प्रीतिपदाय पयोधरकुम्भात् पार्वति धीमयदुग्धमपीतात् ।
अस्तु गुहाय शिवे बहु दत्तं किञ्चिदिवेश्वरि धारय मह्यम् ।। ६४६ ।।
प्रौढमिमं यदि वेत्सि तनूजं शैलसुते मदवारि दधानम् ।
मास्तुपयो वितरानघमन्नं येन दधानि महेश्वरि शक्तिम् ।। ६४७ ।।
स्वार्जितमेव मया यदि भोज्यं सम्मद एव ममाखिलमातः ।
आशिषमग्र्यतमामयि दत्त्वा प्रेषय यानि जयानि धरित्रीम् ।। ६४८ ।।
विद्युति विद्युति वीक्ष्यविलासा वीक्षितकर्मणि लक्ष्यरहस्या ।
पार्वणचन्द्रमुखी ललिताङ्गी तैजसलिङ्गसखी शरणं नः ।। ६४९ ।।
मातरपीतकुचेऽरुणशैलाधीश्वरभामिनि भामहनीये ।
साधु विधाय समर्पयते ते दोधकमाल्यमिदं गणनाथः ।। ६५० ।।
