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काव्यकण्ठ वासिष्ठ श्री गणपति मुनि विरचितम्

उमासहस्रम्

अष्टाविंशः स्तबकः - वसन्ततिलकावृत्तम्

Uma Sahasram - The 1000 Verses Magnum Opus of Sri Ganapati Muni

“रेणुकादि-वर्णनम्” — अर्थात् “रेणुका देवी और देवी के अन्य रूपों का वर्णन” शीर्षक वाला यह अट्ठाईसवाँ स्तबक परशुराम की माता, पवित्र और उग्रस्वरूपिणी रेणुका देवी से आरम्भ होकर आगे दिव्यमाता के अनेक रूपों की महिमा का व्यापक गान करता है। मुनि रेणुका देवी के शिरच्छेद से सम्बन्धित प्रसिद्ध प्रसंग को पुनः उठाते हैं और अपने विशिष्ट, साहसपूर्ण विवेचन के द्वारा उसके बाह्य आख्यान और अन्तर्निहित आध्यात्मिक संकेतार्थ के बीच भेद स्पष्ट करते हैं। वहाँ से श्लोक अम्बिका, भद्रा, पार्वती आदि देवीरूपों की प्रार्थना की ओर बढ़ते हैं और अन्ततः सुन्दरी, धूमावती, भुवनेश्वरी, काली, तारा, भैरवी, बगलामुखी और कमला जैसे अनेक महाशक्ति-रूपों के साथ उसी एक देवी का ऐक्य स्थापित करते हैं। इसलिए रेणुकादि-वर्णनम् शीर्षक पूर्णतः सार्थक है। यद्यपि रेणुका देवी इस स्तबक का आरम्भबिन्दु हैं, अन्ततः यह जगन्माता के अनेक रूपों, शक्तियों और कार्यों को एक व्यापक समन्वित दृष्टि में समेट लेता है।


आगे के श्लोकों में मुनि की व्यक्तिगत प्रार्थना का स्वर और अधिक गहरा हो जाता है। अन्धकार, दुर्भाग्य, पाप और असहायता से मुक्ति के लिए वे बार-बार जगन्माता के चरणों में शरण ग्रहण करते हैं। यह प्रार्थना केवल अपने लिए नहीं, बल्कि अपने परिवार और देश के कल्याण तक विस्तृत होती है। देवी के चरण यहाँ परम संरक्षण और आश्रय के मुख्य प्रतीक बन जाते हैं। उनके अनेक रूप यह प्रकट करते हैं कि वही एक पराशक्ति अपने कार्य के अनुरूप कभी उग्र, कभी सौम्य, कभी स्वर्णवर्णा, कभी चन्द्रमा के समान श्वेत, कभी कृष्णवर्णा, कभी रक्तवर्णा, कभी मातृस्वरूपिणी और कभी भयङ्कर रूप में प्रकट होती हैं। 


इस प्रकार यह स्तबक पौराणिक आख्यान, शाक्ततत्त्व, व्यक्तिगत शरणागति और विश्वकल्याण की प्रार्थना को एक ही प्रवाह में संयोजित करता है। इसी के माध्यम से उमा सहस्रम् की दृष्टि पुनः उस जगन्माता की ओर लौटती है, जो समस्त प्राणियों के उद्धार की परम आश्रयशक्ति और भक्ति का मूल केन्द्र हैं।


इस स्तबक में श्री गणपति मुनि का पुराण-परम्परा, शाक्ततन्त्र, सांकेतिक व्याख्या, मन्त्रदेवता-परम्पराओं और गहन भक्तिकाव्य पर व्यापक अधिकार स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। गम्भीर वसन्ततिलका छन्द इस स्तबक को लालित्य के साथ महनीय गाम्भीर्य भी प्रदान करता है। कथात्मक विश्लेषण से देवतत्त्व की ओर और वहाँ से प्रत्यक्ष प्रार्थना की ओर श्लोक अत्यन्त सहजता से प्रवाहित होते हैं।


अन्त में मुनि देवी के अनेक रूपों को एक व्यापक दिव्यदृष्टि में समेटते हुए मंगलकामना करते हैं कि ये श्लोक सज्जनों के दुःखों को दूर करें और दुष्कर्मों में आसक्त लोगों की उदासीनता को झकझोर कर उनमें जागृति उत्पन्न करें। इस प्रकार यह स्तबक देवी के बहुरूपी वैभव को केवल वर्णित ही नहीं करता, बल्कि उसे रक्षण, शुद्धि, जागरण और सार्वभौम कल्याण की एक ही परमशक्ति के रूप में प्रतिष्ठित करता है।


अष्टाविंशः स्तबकः - वसन्ततिलकावृत्तम्

रेणुकादिवर्णनम्


अन्तर्वलक्षपरिधिभ्रममादधानो वक्त्रस्य पूर्णतुहिनद्युतिमण्डलस्य ।

हासः करोतु भवतां परमं प्रमोदं शुद्धान्तपङ्कजदृशः प्रमथेश्वरस्य ।। ६७६ ।।


सम्मोहनानि तुहिनांशुकलाधरस्य सञ्जीवनानि सरसीरुहसायकस्य ।

सन्दीपनानि विनतेषु जनेषु शक्तेः संहर्षणानि मम सन्तु शिवास्मितानि ।। ६७७ ।।


पापानि मे हरतु काचन कृत्तशीर्षा माता पदाम्बुजभुजिष्यवितीर्णहर्षा ।

या भक्तलोकवरदानविधौ विनिद्रा वासं कमण्डलुधुनीपुलिने करोति ।। ६७८ ।।


षष्ठावतारजननावनिरेकवीरा भीमा धुनोतु दुरितानि गणाधिपस्य ।

या भक्तरक्षणविधावतिजागरूका पुण्ये कमण्डलुधुनीपुलिने चकास्ति ।। ६७९ ।।


छेदाय चेद् गतरजा मुनिरादिदेश चिच्छेद चेद्बहुगुणस्तनयः सवित्रीम् ।

दाह्यं शरीरमखिलप्रभुरीशशक्तिः यद्याविवेश च कथा परमाद्भुतेयम् ।। ६८०।।


पुत्रः प्रियस्तव शिरः सहसा चकर्त कृत्ता च हर्षभरिता भवती ननर्त ।

नो तस्य पापमपि नो तव काऽपि हानिः नाशोऽस्य हा भुजभुवामभवद्विपाकः ।। ६८१।।


अम्बैव सा सुरभिरर्जुनभूपतिर्यां वीर्याज्जहार स च भार्गव आजहार ।

तस्या हतेः परगृहस्थितिरेव हेतुः गन्धर्वदर्शनकथा रिपुकल्पितैव ।। ६८२।।


छिन्नानि नो कति शरीरभृतां शिरांसि तत्पूज्यते जगति रैणुकमेव शीर्षम् ।

कृत्ताः कलेवरवतां कति नाभयो न चेतो धिनोति सुरभिर्मृगनाभिरेकः ।। ६८३।।


प्राणा वसन्ति शिरसा रहिते शरीरे लीलासरोजति शिरस्तु करेऽस्य कृत्तम् ।

तन्निघ्नमेतदखिलं च धियैव धीराः पश्यन्तु नन्दनगरे तदिदं विचित्रम् ।। ६८४ ।।


प्राणेश्वरी विधिपुरे लसतः पुरारेरङ्गीकरोतु शरणागतिमम्बिका मे ।

लब्धं निपीय यदुरोरुहकुम्भदुग्धं सम्बन्धमूर्तिरभवत्कविचक्रवर्ती ।। ६८५।।


अप्राप्य लोकरचनावनपातनेषु यस्यास्त्रयोऽपि पुरुषाः करुणाकटाक्षम् ।

नैवेशते किमपि सा जगदेकमाता भद्रा परा प्रकृतिरस्त्वघनाशिनी नः ।। ६८६ ।।


राका प्रबोधशशिनो हृदयोदयस्य नौका विपज्लनिधौ पततां जनानाम् ।

वेदध्वजस्य ललिता त्रिरुचिः पताका काचिन्ममास्तु शरणं शिवमूलटीका ।। ६८७।।


मौलौ महेन्द्रसुदृशस्सुमनोनिकायसंशोभिते सदसि मान्य इवाभिजातः ।

रेणुश्च यच्चरणभूर्लभतेऽग्रपीठं त्राणाय सा भवतु भूतपतेर्वधूर्नः ।। ६८८।।


अम्बावृणोति परितोऽप्ययमन्धकारो नात्मानमेव मम किं तु कुलं च देशम् ।

शीघ्रं मदीयहृदयोदयपर्वताग्रे श्रीमानुदेतु तव पादमयूखमाली ।। ६८९ ।।


कष्टं धुनोतु मम पर्वतपुत्रिकायाः प्रत्यग्रपङ्करुहबान्धवकान्तिकान्तम् । अम्भोरुहासनमुखामरमौलिरत्नज्योतिर्विशेषितगुणं चरणारविन्दम् ।। ६९० ।।


ज्याशिञ्जितानि समरे गिरिशं जिगीषोः कामस्य हंसनिवहस्य निमन्त्रणानि ।

धुन्वन्तु मे विपदमद्रिकुमारिकायाः पादारविन्दकटकक्वणितानि तानि ।। ६९१ ।।


यः सर्वलोकमथनं महिषं जिगाय यस्यैव कर्म दमनं च तदन्तकस्य ।

नारीनराकृतिभृतो महसस्तमङ्घ्रिं मञ्जीरनादमधुरं शरणं व्रजामि ।। ६९२ ।।


आपन्महोग्रविषराशिनिमग्नमेतं दीनं त्वदीयचरणं शरणं प्रपन्नम् ।

उद्धर्तुमम्ब करुणापरिपूर्णचित्ते वित्तेशमित्रकुलनारि तवैव भारः ।। ६९३।।


लोकाधिराज्ञि पतितं विपदन्धकूपे संरुद्धदृष्टिमभितस्तिमिरच्छटाभिः ।

मातः समुद्धर कृपाकलिते मृडानि पुत्रं करेण जगतामभयङ्करेण ।। ६९४।।


अस्य त्वदीयपदपङ्क‌जकिङ्करस्य दुर्भाग्यपाकविफलीकृतपौरुषस्य ।

प्राणेश्वरि प्रमथलोकपतेरुपायं वीक्षस्व तारणविधौ निपुणे त्वमेव ।। ६९५।।


मृत्युञ्जयोरुमणिपीठतटे निषण्णे ताटङ्ककान्तिबहुलीकृतगण्डशोभे । माणिक्यकङ्कणलसत्करवारिजाते जाते कुलाचलपतेर्जहि पातकं नः ।। ६९६ ।।


किं ते वपुर्जननि तप्तसुवर्णगौरं कामारिमोहिनि किमिन्दुकलावलक्षम् । पाकारिनीलमणिमेचककान्त्युताहो बन्धूकपुष्पकलिकारुचि वा स्मरामि ।। ६९७।।


त्वं सुन्दरी नृपतिजातिजितस्त्वमम्बा धूमावती त्वमजरे भुवनेश्वरी त्वम् ।

काली त्वमीश्वरि शुकार्भकधारिणी त्वं तारा त्वमाश्रितविपद्दलनासिधारा ।। ६९८ ।।


त्वं भैरवी भगवती बगलामुखी त्वं रामा च सा कमलकाननचारिणी त्वम् । कैलासवासिनयनामृतभानुरेखे को वेद ते जननि जन्मवतां विभूतीः ।। ६९९ ।।


धुन्वन्तु सर्वविपदः सुकृतप्रियाणां धुन्वन्तु चाखिलसुखान्यघलालसानाम् ।

आवर्ज्य भूरिकरुणं पुरजित्तरुण्याश्चित्तं वसन्ततिलकाः कविभर्तुरेताः ।। ७०० ।।


।। समाप्तं च सप्तमं शतकम् ।।

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