काव्यकण्ठ वासिष्ठ श्री गणपति मुनि विरचितम्
उमासहस्रम्
एकोनत्रिंशः स्तबकः - मदलेखावृत्तम्

“नवविध-भजनम्” — अर्थात् “नौ प्रकार की भक्ति” शीर्षक वाला यह उनतीसवाँ स्तबक उमा देवी की उपासना को अनेक परस्परपूरक रूपों में प्रस्तुत करता है। उनकी दिव्य लीलाओं और चरित्रों को सुनना, उनकी स्तुति करना, उनका स्मरण करना, उनके रूप का ध्यान करना, उनके चरणों की सेवा और पूजा करना, प्रणाम करना, स्वयं को उनके चरणों में समर्पित करना और उनके प्रति अचल प्रेम विकसित करना — ये सभी भक्ति के विविध मार्गों के रूप में प्रतिपादित होते हैं। श्लोक बार-बार जगन्माता के चरणकमलों की ओर लौटते हैं; उन्हें भक्त के लिए सबसे सहज उपलब्ध और सबसे शक्तिशाली आश्रय के रूप में चित्रित किया गया है। उनके चरणों की सेवा पाप का नाश करती है, जीवन को पवित्र बनाती है, बल और ऐश्वर्य प्रदान करती है तथा अन्ततः मुक्ति की ओर ले जाती है। इसलिए नवविध-भजनम् शीर्षक पूर्णतः सार्थक है। मुनि की दृष्टि में भजन कोई एक क्रिया नहीं, बल्कि वाणी, स्मृति, मन, शरीर, भावना और शरणागति — इन सभी को समेटने वाली बहुआयामी साधना है।
इस स्तबक की एक महत्त्वपूर्ण अन्तर्दृष्टि यह है कि भक्ति मन की सामान्य प्रवृत्तियों को केवल दबाती नहीं, बल्कि उन्हें आध्यात्मिक मार्ग में रूपान्तरित करती है। आशा, इच्छा, आसक्ति, अनुराग और प्रेम — इन सबका अनिवार्य रूप से त्याग करना आवश्यक नहीं; जब वे शर्वाणी की ओर मोड़ दिए जाते हैं, तब वही भाव आध्यात्मिक उत्कर्ष की शक्तियाँ बन जाते हैं। मुनि स्पष्ट संकेत करते हैं कि रति नामक एक ही आन्तरिक प्रवृत्ति अपने आश्रय-विषय के अनुसार विभिन्न रूप ग्रहण करती है और अलग-अलग फल देती है। सांसारिक विषयों में आसक्ति सीमित फल देती है, जबकि जगन्माता के चरणों में भक्ति भुक्ति और मुक्ति — जीवन में कल्याण एवं पूर्णता के साथ-साथ परम विमुक्ति — दोनों प्रदान करती है। इस अर्थ में यह स्तबक केवल भक्तिमार्ग का उपदेश नहीं देता, बल्कि यह भी दिखाता है कि मनुष्य के भीतर का प्रेम, इच्छा और आसक्ति किस प्रकार आध्यात्मिक शक्तियों में परिवर्तित हो सकते हैं। इस प्रकार यह एक संक्षिप्त भक्ति-मनोविज्ञान भी प्रस्तुत करता है।
इस स्तबक में मुनि की रचना-शैली सीधी, व्यावहारिक और अनेक स्थानों पर अत्यन्त आत्मीय संवाद जैसी है। वे अपनी जिह्वा, मन, आशा और इच्छा को मानो स्वतन्त्र व्यक्तियों की तरह सम्बोधित करते हुए उन्हें देवी की ओर मुड़ने का आदेश देते हैं। संक्षिप्त मदलेखा छन्द में ये उपदेश सहज स्मरणीय और सूक्तिसदृश लय प्राप्त करते हैं। भक्तिशास्त्र, मनोवैज्ञानिक सूक्ष्मता, नैतिक अनुशासन और आत्मीय भक्तिसंवाद को बिना किसी बोझिलता के एक ही प्रवाह में मिला देना मुनि की विशेष काव्य-कुशलता है।
अन्तिम श्लोक में भक्ति-रस से परिपूर्ण इन मदलेखा श्लोकों को मुनि ऐसे देखते हैं मानो स्वयं हेरम्ब उन्हें जगन्माता की प्रसन्नता के लिए अर्पित कर रहे हों। इस प्रकार यह स्तबक भक्ति को केवल पूजा-कर्म न मानकर, मनुष्य की समस्त आन्तरिक शक्तियों को देवी की ओर मोड़ देने वाली एक पूर्ण जीवन-साधना के रूप में प्रतिष्ठित करता है।
अष्टमं शतकम्
एकोनत्रिंशः स्तबकः - मदलेखावृत्तम्
नवविधभजनम्
आयुष्या भुवनानां चक्षुष्यास्त्रिपुरारेः ।
कुर्वन्तु प्रमदं नः पार्वत्याः स्मितलेशाः ।। ७०१।।
नात्यर्घाणि निरर्थं नेतव्यानि दिनानि ।
अम्बायाश्चरितानि श्रोतव्यान्यनघानि ।। ७०२।।
उद्योगं कुरु जिह्वे संहर्तुं दुरितानि ।
पूतान्यद्रिसुतायाः कीर्त्यन्तां चरितानि ।। ७०३।।
श्रीसक्तिर्विनिवार्या चिन्ता काऽपि न कार्या ।
नित्यं चेतसि धार्या दीनानां गतिरार्या ।। ७०४ ।।
ज्ञातुं या गदितुं य ा श्रोतुं या श्वसितुं या ।
द्रष्टुं याऽन्तरशक्तिस्तिष्ठात्र स्मृतिरेषा ।। ७०५।।
विभ्राजीनशताभं बिभ्राणं शिरसीन्दुम् ।
स्मर्तव्यं जगदम्बारूपं वा धुतपापम् ।। ७०६ ।।
येषां स्यात्परितप्तं प्रायश्चित्तमघेन ।
रुद्राणीपदसेवा प्रायश्चित्तममीषाम् ।। ७०७।।
तद्दीप्तं पदयुग्मं सेवे यत्र भवन्ति ।
अङ्गुल्यो दश भानोर्भानूनां शतकानि ।। ७०८ ।।
नो चेत् कुप्यसि किञ्चिद् याचे वाचमतीते ।
सेवां मातरुरीकुर्विष्टं मे कुरु मा वा ।। ७०९।।
शर्वाणीचरणार्चापीठं पीवरकाणाम् ।
वध्यस्थानमिदं स्यादुग्राणां दुरितानाम् ।। ७१०।।
स्कन्दाम्बापदपीठस्पृष्टं चेद्बलमाप्तम् ।
एकैकं सुममंहस्वेकैकं कुलिशं स्यात ् ।। ७११।।
अम्भोजोपममङ्घ्रिं शम्भोः पट्टमहिष्याः ।
अंहस्संहतिमुग्रां संहर्तुं प्रणमामः ।। ७१२।।
ये कालीपदवेषं नालीकं प्रणमन्ति ।
नैषां किञ्चिदशक्यं नालीकं मम वाक्यम् ।। ७१३।।
वासस्तेऽत्र समाप्तः पङ्केतो व्रज दूरम् ।
कालीं शङ्करनारीं कालेऽस्मिन् प्रणमामः ।। ७१४ ।।
आशा रे तदवस्था भूभागनटतस्ते ।
कामानां क्व नु पारः कामारेर्नम नारीम् ।। ७१५।।
धन्यास्ते तुहिनाद्रेः कन्यां ये प्रणमन्ति ।
अन्यानुन्नतशीर्षान् मन्ये वन्यलुलायान् ।। ७१६ ।।
पादाम्भोजमुमायाः प्राज्ञास्संप्रणमन्तः ।
गृह्णन्ति श्रियमस्मिन् राजन्तीं निजशक्त्या ।। ७१७।।
मन्दाराद्रिसुताङ्घ्री दातारौ सदृशौ स्तः ।
उत्कण्ठैः फलमाद्यादन्यस्मान्नतकण्ठैः ।। ७१८।।
कालस्यापि विजेतुः शर्वाण्याश्चरणस्य ।
एषोऽहं कविलोकक्ष्मापालोऽस्मि भुजिष्यः ।। ७१९।।
रक्ते दर्शय रागं रुद्राणीपदपद्मे ।
चेतः पुष्यति शोभां सारस्सारवतोऽग्रे ।। ७२० ।।
संशोध्यागमजालं सारांशं प्रवदामः ।
स्कन्दाम्बापदभक्तिर्भुक्त्यै चाथ विमुक्त्यै ।। ७२१।।
वात्सल्यं गतिहीनेष्वायुष्यं सुकृतस्य ।
भूयोभिः सह सख्यं श्रीहेतुष्विह मुख्यम् ।। ७२२ ।।
श्लाघ्यं पुष्यति कामं प्रेमा स्वप्रमदायाम् ।
शर्वाणीपदभक्तिर्नित्याय प्रमदाय ।। ७२३ ।।
एकैवं बहुभेदा भिन्नत्वाद्विषयाणाम् ।
रत्याख्या द्रुतिरन्तः सा सूते फलभेदान् ।। ७२४।।
हर्षं कञ्चन मातुर्मत्तो भक्तिभरेण ।
तन्वन्नेष विधत्तां हेरम्बो मदलेखाः ।। ७२५।।
